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उत्तराखंडफीचर्ड

हल्द्वानी बनभूलपुरा कांड: मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की मुश्किलें बरकरार, हाईकोर्ट की नई पीठ करेगी जमानत पर फैसला

The Hill India News
Last updated: March 11, 2026 2:20 pm
The Hill India News
Published: March 11, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड के चर्चित हल्द्वानी बनभूलपुरा हिंसा मामले में मुख्य साजिशकर्ता माने जा रहे अब्दुल मलिक को फिलहाल राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। बुधवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में मलिक की जमानत याचिका पर सुनवाई होनी थी, लेकिन तकनीकी कारणों और न्यायिक नैतिकता के चलते मामला एक बार फिर दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया गया है। न्यायालय के इस रुख के बाद मुख्य आरोपी की सलाखों के पीछे रहने की अवधि और बढ़ गई है।

Contents
न्यायिक पीठ में बदलाव: क्यों टली सुनवाई?क्या है बनभूलपुरा हिंसा और मलिक की भूमिका?बचाव पक्ष की दलील: ‘राजनीतिक साजिश का शिकार’हिंसा का वो खौफनाक मंजरअब आगे क्या?

न्यायिक पीठ में बदलाव: क्यों टली सुनवाई?

मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ के समक्ष पेश की गई थी। हालांकि, सुनवाई शुरू होते ही न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह ने इस मामले को सुनने से स्वयं को अलग कर लिया। इसका कारण यह है कि न्यायाधीश बनने से पूर्व न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह इस प्रकरण से जुड़े विषयों में अधिवक्ता के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके थे।

न्यायिक परंपराओं का पालन करते हुए खंडपीठ ने मामले को सुनवाई के लिए दूसरी पीठ को संदर्भित करने के निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की पीठ ने भी इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर दूसरी पीठ को भेज दिया था।

क्या है बनभूलपुरा हिंसा और मलिक की भूमिका?

8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने के दौरान भीषण हिंसा भड़क गई थी। पुलिस और जिला प्रशासन की टीम जब अवैध मदरसे और नमाज स्थल के नाम पर किए गए कब्जे को हटाने पहुंची, तो उन पर सुनियोजित तरीके से पथराव और पेट्रोल बम से हमला किया गया।

अब्दुल मलिक पर लगे मुख्य आरोप:

  1. साजिश का मास्टरमाइंड: पुलिस जांच के अनुसार, मलिक ने ही भीड़ को भड़काने और हमले की पूरी रूपरेखा तैयार की थी।

  2. राजकीय भूमि का गबन: आरोप है कि मलिक ने कूटरचित दस्तावेजों और झूठे शपथ पत्रों के आधार पर सरकारी भूमि को अपनी संपत्ति बताकर हड़पने का प्रयास किया।

  3. नजूल भूमि पर अवैध प्लॉटिंग: जांच में सामने आया कि आरोपी ने नजूल भूमि पर अवैध कब्जा कर वहां न केवल निर्माण किया, बल्कि उसे अवैध तरीके से बेचा भी।

  4. चार गंभीर मुकदमे: मलिक के खिलाफ दंगा भड़काने, हत्या के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा डालने और जालसाजी सहित चार अलग-अलग प्राथमिकियां दर्ज हैं।

बचाव पक्ष की दलील: ‘राजनीतिक साजिश का शिकार’

दूसरी ओर, अब्दुल मलिक के अधिवक्ताओं ने अदालत में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष का कहना है कि मूल एफआईआर (FIR) में मलिक का नाम दर्ज नहीं था और पुलिस ने बाद में पूरक जांच के नाम पर उन्हें जबरन आरोपी बनाया है।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि बनभूलपुरा कांड से जुड़े कई अन्य सह-आरोपियों को पूर्व में ही न्यायालय से जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता (Parity) के आधार पर मलिक को भी रिहा किया जाना चाहिए। हालांकि, अभियोजन पक्ष (Sarkar) ने इन दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए मलिक को पूरी घटना का सूत्रधार बताया है।

हिंसा का वो खौफनाक मंजर

बनभूलपुरा में हुई उस हिंसा ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। भीड़ के हमले में कई पुलिसकर्मी, निगम कर्मचारी और स्थानीय नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए थे, जबकि कुछ लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी थी। उपद्रवियों ने बनभूलपुरा थाने को घेरकर आग लगा दी थी और दर्जनों वाहनों को फूंक दिया था। प्रशासन का मानना है कि यदि अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई के दौरान मलिक और उसके सहयोगियों ने बाधा न डाली होती, तो यह त्रासदी रोकी जा सकती थी।

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा मामले को दूसरी बेंच को भेजे जाने के बाद अब मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) तय करेंगे कि इस संवेदनशील मामले की सुनवाई किस पीठ के समक्ष होगी। कानून के जानकारों का मानना है कि जालसाजी और दंगे जैसे गंभीर आरोपों के साथ-साथ ‘कूटरचित शपथ पत्र’ का मामला मलिक की जमानत में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

अब्दुल मलिक पर दर्ज चार मुकदमों में से एक मामला सीधे तौर पर राजकीय भूमि को हड़पने से जुड़ा है, जिसमें पुलिस के पास पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई पीठ इन दलीलों और सबूतों के आधार पर क्या रुख अपनाती है।

हल्द्वानी बनभूलपुरा कांड केवल एक अतिक्रमण का मामला नहीं था, बल्कि इसने राज्य की कानून व्यवस्था और सरकारी भूमि के संरक्षण पर बड़े सवाल खड़े किए थे। मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत याचिका पर हो रही देरी और अदालती कार्यवाही पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं। फिलहाल, मलिक को राहत न मिलना प्रशासन के सख्त रुख और न्यायालय की सतर्कता को दर्शाता है।

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