देहरादून: उत्तराखंड में NEET-UG के जरिए MBBS दाखिलों में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल का मामला लगातार गहराता जा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने वाले कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों पर सवाल उठने के बाद अब जांच का दायरा देहरादून से आगे बढ़कर हरिद्वार तक पहुंच गया है। मामले की जांच कर रही विशेष जांच टीम यानी SIT प्रमाणपत्रों के साथ-साथ उनके तैयार होने, सत्यापन और दाखिले की प्रक्रिया में शामिल सभी स्तरों की पड़ताल कर रही है।
एसपी देहात जया बलूनी के नेतृत्व में गठित SIT ने इस मामले में दस्तावेजों की जांच तेज कर दी है। टीम यह पता लगाने में जुटी है कि कथित तौर पर संदिग्ध प्रमाणपत्र किस स्तर पर तैयार हुए, उनके सत्यापन में किन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही और इन प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला किस तरह हासिल किया गया। जांच का एक अहम हिस्सा यह भी है कि यदि प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाते हैं तो उन्हें तैयार कराने और इस्तेमाल करने के पीछे कौन-कौन लोग शामिल थे।
हरिद्वार में भी SIT ने शुरू की पूछताछ
मामले की जांच अब हरिद्वार तक पहुंच चुकी है। SIT ने हरिद्वार में प्रकरण से जुड़े लोगों से पूछताछ करने के साथ-साथ उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड की पड़ताल शुरू की है। जांच टीम अलग-अलग स्तर से सामने आ रहे तथ्यों को आपस में जोड़कर पूरे मामले की कड़ियां तलाश रही है।
जांच अधिकारियों के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि जिन अभ्यर्थियों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे का लाभ लिया, उनके प्रमाणपत्रों की वैधता का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। सरकारी प्रक्रिया के अनुसार ऐसे प्रमाणपत्रों के लिए स्वतंत्रता सेनानी से संबंधित मूल दस्तावेज, पेंशन या संबंधित रिकॉर्ड, निवास प्रमाण और आवेदक का स्वतंत्रता सेनानी से संबंध दर्शाने वाले दस्तावेज आवश्यक होते हैं। SIT अब यह भी देख रही है कि संबंधित आवेदनों में लगाए गए दस्तावेज वास्तव में कहां से आए और उनका सत्यापन किस तरह किया गया।
370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची से बढ़ी जांच
मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को करीब 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सौंपी गई। इस सूची में ऐसे अभ्यर्थियों के नाम शामिल बताए गए हैं, जिनके स्थायी निवास, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र अथवा अन्य दस्तावेजों की जांच की मांग की गई है। इसके बाद राज्य सरकार ने संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन का दायरा बढ़ाने के निर्देश दिए।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती जांच में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से जुड़े कुछ प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए हैं। सरकार ने अब केवल इसी श्रेणी तक जांच सीमित न रखते हुए अन्य आरक्षित श्रेणियों के प्रमाणपत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया भी शुरू की है। इससे जांच का दायरा काफी व्यापक हो गया है।
8 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र और प्रवेश निरस्त
फर्जी या संदिग्ध प्रमाणपत्रों की जांच के बीच अब तक 8 अभ्यर्थियों के प्रवेश/प्रमाणपत्र निरस्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों के अनुसार दस्तावेजों की जांच अभी जारी है और सत्यापन पूरा होने के बाद अन्य मामलों में भी कार्रवाई हो सकती है।
कुछ मामलों में एक ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम और पहचान से जुड़े प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल के आरोप सामने आए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों में अलग-अलग पते दर्ज होने से भी जांच एजेंसियों को संदेह हुआ। SIT अब इन पतों और पारिवारिक संबंधों का जमीनी स्तर पर सत्यापन करा रही है।
एक ही स्वतंत्रता सेनानी के नाम से जुड़े प्रमाणपत्रों पर सवाल
जांच के दौरान स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा से जुड़े प्रमाणपत्र भी जांच के केंद्र में आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों ने खुद को धर्मवीर वर्मा का रिश्तेदार या वंशज बताते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे का लाभ लेने का दावा किया। SIT ने मामले की पुष्टि के लिए धर्मवीर वर्मा के परिजनों से संपर्क किया और उनके पुत्र तथा पौत्र के बयान दर्ज किए हैं। संबंधित राजस्व अधिकारियों से भी पूछताछ की गई है।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, कुछ संदिग्ध प्रमाणपत्रों में धर्मवीर वर्मा की तस्वीर के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठे हैं और SIT इस पहलू की जांच कर रही है। हालांकि, इन सभी तथ्यों की अंतिम पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।
अब सिर्फ अभ्यर्थी नहीं, पूरी प्रक्रिया जांच के घेरे में
इस मामले में SIT की जांच अब केवल उन अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है, जिन्होंने कथित तौर पर संदिग्ध प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया। टीम यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि प्रमाणपत्र जारी होने की पूरी सरकारी प्रक्रिया में कौन-कौन से अधिकारी और कर्मचारी शामिल थे।
जांच का फोकस आवेदन से लेकर प्रमाणपत्र जारी होने तक की पूरी प्रक्रिया पर है। SIT यह देख रही है कि आवेदन किसने किया, दस्तावेज किसने उपलब्ध कराए, राजस्व स्तर पर सत्यापन किस अधिकारी या कर्मचारी ने किया, रिपोर्ट किसने तैयार की और अंतिम स्तर पर प्रमाणपत्र किस प्रक्रिया के तहत जारी हुआ।
यही वजह है कि एसडीएम और एडीएम कार्यालयों से संबंधित पत्रावलियां भी जांच के दायरे में लाई गई हैं। SIT ने संबंधित रिकॉर्ड अपने कब्जे में लेकर उनकी जांच शुरू की है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कथित फर्जी दस्तावेज सरकारी रिकॉर्ड में किस तरह आगे बढ़े।
मेडिकल कॉलेजों से भी जुटाए जा रहे दस्तावेज
SIT ने मामले की जांच के दौरान मेडिकल कॉलेजों का भी रुख किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, श्रीनगर और हल्द्वानी स्थित मेडिकल कॉलेजों से संबंधित अभ्यर्थियों के दाखिले के समय जमा किए गए दस्तावेज भी जुटाए गए हैं। टीम इन दस्तावेजों का मिलान संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड से कर रही है।
जांच टीम यह भी देख रही है कि अभ्यर्थियों ने NEET-UG काउंसलिंग के दौरान कौन-कौन से दस्तावेज ऑनलाइन अपलोड किए थे। चूंकि प्रवेश प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा ऑनलाइन हुआ है, इसलिए आवेदन से लेकर दस्तावेज अपलोड और सत्यापन तक का डिजिटल रिकॉर्ड जांच में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
778 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का भी सत्यापन
राज्य में MBBS और BDS दाखिलों को लेकर अब व्यापक स्तर पर दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राज्य कोटे के तहत दाखिला लेने वाले सैकड़ों अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र संबंधित जिलों को भेजकर सत्यापन कराया जा रहा है। इनमें विभिन्न आरक्षित श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्र शामिल हैं।
इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि दाखिले के दौरान जिन अभ्यर्थियों ने आरक्षण या अन्य श्रेणीगत लाभ लिया, उनके दस्तावेज वास्तविक और वैध हैं या नहीं। इससे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से सामने आए मामलों के अलावा अन्य संभावित अनियमितताओं की भी पहचान हो सकती है।
फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुंचने की कोशिश
SIT के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती कथित फर्जी प्रमाणपत्रों की पूरी श्रृंखला का पता लगाना है। यदि जांच में यह साबित होता है कि प्रमाणपत्र जानबूझकर तैयार किए गए और उनका इस्तेमाल मेडिकल कॉलेज में दाखिला हासिल करने के लिए किया गया, तो पुलिस उन सभी लोगों की भूमिका की जांच करेगी जो इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहे होंगे।
पुलिस पहले ही संबंधित मामलों में FIR दर्ज कर चुकी है और नामजद आरोपितों की तलाश भी जारी है। जांच एजेंसी यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या अलग-अलग मामलों में एक जैसी प्रक्रिया अपनाई गई थी और क्या इसके पीछे किसी व्यक्ति या समूह की भूमिका थी।
फिलहाल SIT दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड, मेडिकल कॉलेजों में जमा प्रमाणपत्रों, राजस्व अधिकारियों के बयानों और डिजिटल आवेदन रिकॉर्ड को आपस में मिलाकर जांच आगे बढ़ा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने प्रमाणपत्र वास्तव में फर्जी थे, कितने दाखिले प्रभावित हुए और इस पूरी प्रक्रिया में किस-किस की भूमिका सामने आती है।
उत्तराखंड के MBBS दाखिला फर्जी प्रमाणपत्र मामले में जांच अब लगातार विस्तृत होती जा रही है। देहरादून से शुरू हुई पड़ताल हरिद्वार तक पहुंच चुकी है और करीब 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सामने आने के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी प्रमाणपत्रों के व्यापक सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब निगाह SIT की जांच पर है कि वह कथित फर्जीवाड़े की पूरी कड़ी और जिम्मेदार लोगों तक किस तरह पहुंचती है।
