अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 22 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA के 81वें सत्र को संबोधित किया। करीब 37 मिनट के भाषण में ट्रंप ने अमेरिका की विदेश नीति, ईरान युद्ध, गाजा, रूस-यूक्रेन संघर्ष, भारत-पाकिस्तान तनाव, वेनेजुएला के तेल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जलवायु परिवर्तन समेत कई मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने अपनी सरकार की नीतियों और उपलब्धियों को गिनाते हुए अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत पर भी जोर दिया।
लेकिन भाषण खत्म होने के बाद ट्रंप के कई दावों की तथ्य-जांच शुरू हुई। CNN के फैक्ट-चेक और PolitiFact की समीक्षा में उनके कई दावों को गलत, भ्रामक या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया गया। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा उनके इस दावे की रही कि राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने दुनिया के आठ युद्ध खत्म कराए हैं। इसके अलावा AI, जलवायु परिवर्तन, अमेरिकी हथियारों के भंडार और दुनिया के तेल भंडार में अमेरिका-वेनेजुएला की हिस्सेदारी को लेकर भी सवाल उठे।
‘मैंने 8 युद्ध खत्म किए’… ट्रंप के सबसे बड़े दावे पर सवाल
UN के मंच से ट्रंप ने कहा कि राष्ट्रपति पद संभालने के बाद उनके लिए आठ युद्धों को खत्म करना बड़े सम्मान की बात रही है। उन्होंने इनमें कंबोडिया-थाईलैंड, कोसोवो-सर्बिया, रवांडा-डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, भारत-पाकिस्तान, आर्मेनिया-अजरबैजान और गाजा का नाम लिया। इससे पहले वह 2025 में इजरायल और ईरान के बीच हुए संघर्ष तथा मिस्र और इथियोपिया के बीच कथित संघर्ष को भी अपने खाते में गिनते रहे हैं।
लेकिन CNN के फैक्ट-चेक के मुताबिक, आठ युद्ध खत्म कराने का यह आंकड़ा काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। फैक्ट-चेक में कहा गया कि मिस्र और इथियोपिया के बीच जिस संघर्ष को ट्रंप युद्ध के रूप में पेश कर रहे हैं, वह वास्तव में बांध परियोजना को लेकर कूटनीतिक विवाद था। इसी तरह ट्रंप द्वारा बताए गए कोसोवो-सर्बिया मामले को भी उस अवधि में युद्ध के रूप में नहीं माना जा सकता।
रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के मामले में भी फैक्ट-चेक के मुताबिक संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने दोनों पक्षों के बीच एक शांति समझौते की दिशा में भूमिका निभाई थी, लेकिन इसे पूरी तरह युद्ध समाप्त होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
गाजा को लेकर भी ट्रंप ने अपने प्रयासों का उल्लेख किया, लेकिन फैक्ट-चेक में कहा गया कि युद्ध और हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी तथा इजरायली हमले जारी रहने की रिपोर्टें थीं। ऐसे में “आठ युद्ध खत्म” वाला दावा एक सीधी और निर्विवाद उपलब्धि के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही तस्वीर नहीं देता।
भारत-पाकिस्तान संघर्ष को लेकर फिर किया दावा
ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच 2025 में हुए सैन्य संघर्ष का भी उल्लेख किया और इसे अपने द्वारा रोके गए युद्धों में शामिल किया। यह दावा वह पहले भी कई बार कर चुके हैं। UN भाषण में भी उन्होंने भारत-पाकिस्तान के साथ-साथ अन्य संघर्षों को रोकने में अपने हस्तक्षेप का श्रेय लिया।
भारत की ओर से इस मुद्दे पर पहले यह स्पष्ट किया गया है कि मई 2025 में सैन्य कार्रवाई रोकने के संबंध में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया गया था और संघर्ष के बाद बातचीत के जरिए स्थिति शांत हुई थी। इसलिए ट्रंप का इसे अपनी मध्यस्थता की उपलब्धि के रूप में पेश करना भारत के आधिकारिक रुख से अलग है।
यही वजह है कि भारत-पाकिस्तान का उल्लेख ट्रंप के आठ युद्धों वाले दावे का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जा रहा है। यहां अमेरिकी राष्ट्रपति का दावा और भारत का आधिकारिक पक्ष अलग-अलग हैं।
AI को लेकर ट्रंप ने जलवायु चेतावनियों का उड़ाया मजाक
ट्रंप के भाषण का एक और चर्चित हिस्सा Artificial Intelligence यानी AI को लेकर था। उन्होंने AI के संभावित खतरों को लेकर चेतावनी देने वालों की तुलना उन लोगों से की, जिनके बारे में उनका कहना था कि उन्होंने कभी दावा किया था कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण 12 साल में पूरी मानवता खत्म हो जाएगी।
ट्रंप ने कहा कि यही लोग अब AI को लेकर भी बड़े खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन की शब्दावली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पृथ्वी गर्म होने के बजाय ठंडी हो रही थी।
लेकिन फैक्ट-चेक में इस दावे को भी गलत बताया गया। CNN के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने यह नहीं कहा था कि “12 साल में पूरी दुनिया खत्म हो जाएगी।” 2018 में जिस चेतावनी का अक्सर उल्लेख किया जाता है, वह उत्सर्जन कम करने और ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए उपलब्ध समय तथा गंभीर जलवायु जोखिमों से संबंधित थी।
इसका अर्थ यह है कि ट्रंप ने एक जटिल वैज्ञानिक चेतावनी को “12 साल में सब मर जाएंगे” के रूप में पेश किया, जबकि मूल वैज्ञानिक चर्चा इससे काफी अलग थी।
‘धरती ठंडी हो रही थी’ वाले दावे पर भी तथ्य अलग
ट्रंप ने यह भी कहा कि ग्लोबल वार्मिंग शब्द को बाद में क्लाइमेट चेंज इसलिए कहा गया क्योंकि धरती गर्म नहीं हो रही थी बल्कि ठंडी हो रही थी।
फैक्ट-चेक के मुताबिक यह दावा भी वास्तविक वैज्ञानिक आंकड़ों से मेल नहीं खाता। वैज्ञानिक समुदाय आज भी global warming और climate change दोनों शब्दों का इस्तेमाल करता है। साथ ही हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तरों के आसपास रहा है। इसलिए यह कहना कि वैज्ञानिकों ने गर्म होती धरती की जगह ठंडी होती धरती के कारण शब्द बदल दिया, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
अमेरिका के हथियारों का भंडार: ट्रंप बोले ‘कमी नहीं’, रिपोर्टों में अलग तस्वीर
ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप ने अमेरिका की सैन्य क्षमता का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका के पास इतने गोला-बारूद हैं कि जितने वह इस्तेमाल करने की कल्पना भी नहीं कर सकता और उनका उत्पादन अभूतपूर्व स्तर पर हो रहा है।
लेकिन PolitiFact की फैक्ट-चेक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी हथियारों के भंडार को लेकर उपलब्ध विश्लेषण इस दावे से मेल नहीं खाते। रिपोर्ट में Center for Strategic and International Studies के मई के विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा गया कि ईरान युद्ध में इस्तेमाल किए जा रहे कुछ महत्वपूर्ण हथियारों—जिनमें Tomahawk मिसाइलें, Patriot और THAAD इंटरसेप्टर शामिल हैं—के भंडार को दोबारा भरने में कई साल लग सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिकी सैन्य भंडार पर पहले से मौजूद दबाव और यूक्रेन को दी गई सैन्य सहायता का भी प्रभाव पड़ा है। हालांकि अमेरिका ने हथियारों का उत्पादन बढ़ाने और स्टॉक दोबारा भरने की प्रक्रिया तेज करने के कदम उठाए हैं।
इसलिए यहां भी तस्वीर सीधी नहीं है। अमेरिका बड़े पैमाने पर हथियार बना रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके भंडार पर किसी प्रकार का दबाव नहीं है।
तेल पर ट्रंप का 60 प्रतिशत वाला दावा कितना सही?
ट्रंप के भाषण का एक और बड़ा दावा अमेरिका और वेनेजुएला के तेल भंडार से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि अमेरिका और वेनेजुएला को जोड़ दिया जाए तो दोनों के पास दुनिया के 60 प्रतिशत से ज्यादा तेल है।
ट्रंप ने वेनेजुएला के साथ 65 अरब बैरल तेल से जुड़ी एक बड़ी डील का भी जिक्र किया और इसे ऐतिहासिक समझौते के रूप में पेश किया। भाषण के रिकॉर्ड में उनका 60 प्रतिशत से अधिक तेल वाला दावा दर्ज है।
लेकिन PolitiFact के फैक्ट-चेक के अनुसार यह आंकड़ा सही नहीं है। सिद्ध तेल भंडार (proven reserves) के आधार पर अमेरिका और वेनेजुएला को मिलाकर दुनिया के लगभग 21.9 प्रतिशत भंडार होते हैं। मौजूदा तेल उत्पादन को आधार बनाया जाए तो दोनों देशों की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 23.2 प्रतिशत बताई गई है।
यानी 60 प्रतिशत का दावा उपलब्ध तेल भंडार या मौजूदा उत्पादन के आंकड़ों से काफी अलग है।
65 अरब बैरल वाली डील का क्या मतलब है?
ट्रंप ने वेनेजुएला के साथ हुए तेल समझौते को 65 अरब बैरल तेल से जोड़ते हुए कहा कि इससे ऊर्जा की कीमतें कम करने में मदद मिलेगी।
लेकिन किसी देश के पास मौजूद तेल भंडार और दुनिया के तेल बाजार में तत्काल उपलब्ध होने वाला तेल एक ही चीज नहीं है। किसी बड़े भंडार को उत्पादन में बदलने के लिए बुनियादी ढांचे, निवेश, तकनीक और राजनीतिक स्थिरता की जरूरत होती है।
PolitiFact के मुताबिक, विशेषज्ञों का अनुमान है कि वेनेजुएला की तेल उत्पादन क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाने में कई वर्ष लग सकते हैं। इसलिए 65 अरब बैरल की डील का होना अपने आप में दुनिया की तेल आपूर्ति में तत्काल 65 अरब बैरल जुड़ जाने के बराबर नहीं है।
AI को ‘Super Intelligence’ कहने की बात
ट्रंप ने भाषण में AI को लेकर अपनी अलग शब्दावली भी पेश की। उन्होंने कहा कि आगे से Artificial Intelligence को अधिक सटीक रूप से “Super Intelligence” या SI कहा जाना चाहिए। उनका तर्क था कि “artificial” शब्द से इसकी वास्तविक क्षमता कमतर दिखाई देती है।
हालांकि AI के क्षेत्र में Artificial Superintelligence (ASI) एक विशिष्ट तकनीकी अवधारणा है। इसका अर्थ ऐसे AI सिस्टम से है जो लगभग सभी संज्ञानात्मक कार्यों में इंसानों से कहीं अधिक सक्षम हों। PolitiFact के मुताबिक, वर्तमान AI सिस्टम को इस स्तर की superintelligence कहना तकनीकी रूप से उचित नहीं है।
यानी ट्रंप का “Super Intelligence” शब्द इस्तेमाल करना राजनीतिक और भाषणात्मक तौर पर अलग बात है, लेकिन तकनीकी क्षेत्र में इसका एक विशिष्ट अर्थ है।
ईरान पर ट्रंप का सख्त संदेश
भाषण का सबसे आक्रामक हिस्सा ईरान को लेकर था। ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका बेहद कठोर सैन्य कार्रवाई कर सकता है। Reuters के मुताबिक, उन्होंने ईरान को “annihilate” करने तक की चेतावनी दी और कहा कि उनका मुख्य लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है।
ईरान का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष कई महीनों से जारी है। ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराया और इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ा। ईरानी प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों के भाषण के दौरान बाहर निकलने की भी रिपोर्ट सामने आई।
UNGA में ट्रंप का भाषण और उसके बाद उठे सवाल
कुल मिलाकर ट्रंप का 37 मिनट का भाषण अमेरिकी ताकत, सैन्य क्षमता, आर्थिक हितों और उनकी विदेश नीति के बचाव पर केंद्रित रहा। उन्होंने खुद को कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में पेश किया और भारत-पाकिस्तान समेत कई मामलों का श्रेय लिया।
लेकिन भाषण के बाद सामने आए फैक्ट-चेक ने उनके कई दावों की तस्वीर अलग दिखाई। आठ युद्ध खत्म कराने का दावा कई मामलों में वास्तविक परिस्थितियों को सरल बनाकर पेश करता है। AI और जलवायु परिवर्तन को लेकर उनका तर्क वैज्ञानिक चेतावनियों की वास्तविक प्रकृति से मेल नहीं खाता। हथियारों के भंडार पर उनका दावा उपलब्ध विश्लेषणों से पूरी तरह समर्थित नहीं है और अमेरिका-वेनेजुएला के पास दुनिया के 60 प्रतिशत से ज्यादा तेल होने का आंकड़ा भी उपलब्ध रिजर्व और उत्पादन आंकड़ों से मेल नहीं खाता।
इसलिए ट्रंप के UN भाषण की सबसे महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि उन्होंने क्या कहा, बल्कि यह भी है कि उनके दावों को वास्तविक आंकड़ों और स्वतंत्र फैक्ट-चेक के सामने रखने पर तस्वीर कितनी अलग दिखाई देती है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिए गए ऐसे बयानों में राजनीतिक दावे, उपलब्धियां, अनुमान और तथ्य—इन सभी को अलग-अलग देखना जरूरी है।
UNGA का यह भाषण एक बार फिर दिखाता है कि दुनिया के सबसे बड़े मंचों में से एक पर किसी नेता के दावों को समझने के लिए केवल भाषण सुनना पर्याप्त नहीं होता; उन दावों की स्वतंत्र तथ्य-जांच और मूल आंकड़ों से तुलना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
