भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से साइबर ठगी का एक बेहद गंभीर और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। कोलार इलाके में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपती को साइबर जालसाजों ने करीब 96 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर अपने नियंत्रण में रखा। आरोपियों ने खुद को कभी दिल्ली पुलिस का अधिकारी, कभी जांच अधिकारी और कभी सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर दंपती को मनी लॉन्ड्रिंग के एक कथित मामले में फंसाने की धमकी दी। लगातार वीडियो कॉल और पूछताछ के जरिए बुजुर्ग दंपती पर इतना दबाव बनाया गया कि उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए और जालसाजों के बताए बैंक खातों में रकम जमा कर दी।
पुलिस के मुताबिक यह पूरा घटनाक्रम 19 मई से 23 अगस्त तक चलता रहा। इस दौरान आरोपियों ने दंपती को किसी से संपर्क करने, बाहर जाने और मामले की जानकारी किसी अन्य व्यक्ति को देने से रोक दिया। कई दिनों तक लगातार निगरानी और डर के माहौल में रहने के बाद जब दंपती को शक हुआ और उन्होंने तथ्यों की पड़ताल की, तब उन्हें पता चला कि जिन अधिकारियों और अदालत के आदेश का हवाला देकर उन्हें डराया जा रहा था, वह पूरा मामला फर्जी था।
19 मई को आया पहला फोन, गिरफ्तारी वारंट का डर दिखाया
पुलिस के अनुसार, साइबर ठगी की शुरुआत 19 मई को हुई। बुजुर्ग महिला सुवर्णा लक्ष्मी के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का पुलिस अधिकारी बताया। उसने दावा किया कि महिला के नाम गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है।
जालसाज ने दंपती पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि दिल्ली के एक बैंक खाते के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े करोड़ों रुपये के लेनदेन हुए हैं और उनका नाम इस मामले में सामने आया है। अचानक पुलिस और मनी लॉन्ड्रिंग केस का नाम सुनकर बुजुर्ग दंपती घबरा गया।
इसके बाद ठगों ने फोन कॉल को वीडियो कॉल में बदल दिया। वीडियो कॉल के दौरान कथित पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ शुरू कर दी और दंपती को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वे एक गंभीर कानूनी मामले में फंस चुके हैं।
वीडियो कॉल पर शुरू हुआ ‘डिजिटल अरेस्ट’
जालसाजों ने दंपती को मानसिक रूप से इस तरह दबाव में लिया कि उन्हें लगा कि अगर उन्होंने आरोपियों की बात नहीं मानी तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। उन्हें वीडियो कॉल पर बने रहने के निर्देश दिए गए और किसी अन्य व्यक्ति से संपर्क करने से रोक दिया गया।
यही साइबर अपराध का वह तरीका है, जिसे आजकल ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। इसमें अपराधी पुलिस, जांच एजेंसी, अदालत या किसी सरकारी विभाग के अधिकारी बनकर पीड़ित को डराते हैं। इसके बाद उसे वीडियो कॉल पर निगरानी में रखने और कथित कानूनी कार्रवाई से बचने के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है।
इस मामले में भी आरोपियों ने कथित तौर पर इसी तरीके का इस्तेमाल किया और बुजुर्ग दंपती को कई सप्ताह तक अपने प्रभाव में रखा।
कभी जांच अधिकारी तो कभी फर्जी जज बनकर किया कॉल
पुलिस के अनुसार, 21 मई को एक अन्य व्यक्ति ने दंपती को फोन किया और खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताया। इसके बाद जालसाजों ने अपनी कहानी को और विश्वसनीय बनाने के लिए अगले ही दिन वीडियो कॉल पर एक कथित जज से दंपती की बातचीत कराई।
फर्जी जज ने दंपती को डराने के लिए उनके आधार कार्ड की जानकारी तक वीडियो कॉल पर दिखाने का दावा किया। इसके बाद उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
मामले को और गंभीर बनाने के लिए 9 जून को फिर एक कथित जज ने वीडियो कॉल की। इस दौरान दंपती को उनकी संपत्ति सीज किए जाने का कथित आदेश सुनाया गया। इसके बाद निशा पटेल नाम की एक महिला ने उनसे संपर्क किया और उन्हें भोपाल वापस आने के लिए कहा।
लगातार बदलते किरदारों और अलग-अलग अधिकारियों के नामों ने दंपती के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया कि वास्तव में उनके खिलाफ किसी बड़ी जांच एजेंसी की कार्रवाई चल रही है।
एफडी तोड़ने और जेवर गिरवी रखने को कहा
जालसाजों ने दंपती को कथित मामले से बाहर निकालने के नाम पर आर्थिक रूप से भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। उन्हें कहा गया कि यदि वे जांच में सहयोग करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति और बैंक खातों की जानकारी देनी होगी।
इसके बाद आरोपियों ने कथित तौर पर दंपती को अपनी एफडी तुड़वाने और जेवर बेचने या गिरवी रखने के लिए मजबूर किया। डर के कारण बुजुर्ग दंपती ने उनकी बात मान ली।
दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से रवाना होकर 11 जून को भोपाल पहुंचे। अगले दिन यानी 12 जून को उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए। इसके बाद आरोपियों के बताए अलग-अलग बैंक खातों में पांच बार में रकम जमा कराई गई।
यह रकम देने के बावजूद ठगों ने दंपती को राहत नहीं दी। उल्टा उनसे लगातार संपर्क बनाए रखा गया और उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता रहा कि कथित जांच अभी जारी है।
सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों से निगरानी
इस पूरे साइबर अपराध में आरोपियों ने दंपती से संपर्क बनाए रखने के लिए सात अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया। अलग-अलग नंबरों और अलग-अलग पहचान के लोगों के जरिए दंपती पर मानसिक दबाव बनाए रखा गया।
22 लाख रुपये की रकम देने के बाद भी दंपती को आरोपियों ने नहीं छोड़ा। वीडियो कॉल के माध्यम से उनकी निगरानी जारी रही। उन्हें लगातार यह डर दिखाया जाता रहा कि यदि उन्होंने जालसाजों के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ गिरफ्तारी या संपत्ति जब्ती जैसी कार्रवाई हो सकती है।
इस तरह करीब तीन महीने से अधिक समय तक दंपती साइबर ठगों के जाल में फंसा रहा।
23 अगस्त तक जारी रहा खौफ
पुलिस के मुताबिक, 23 अगस्त तक वीडियो कॉल के जरिए दंपती की निगरानी की जाती रही। यानी 19 मई से 23 अगस्त तक करीब 96 दिनों तक यह पूरा घटनाक्रम चलता रहा।
लगातार इतने लंबे समय तक किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर निगरानी में रखना और उसे परिवार तथा बाहरी दुनिया से अलग रखना साइबर अपराधियों के बढ़ते दुस्साहस को दर्शाता है। खासतौर पर बुजुर्ग लोगों को निशाना बनाकर उन्हें कानून और गिरफ्तारी का डर दिखाना साइबर अपराधियों का एक खतरनाक तरीका बनता जा रहा है।
फर्जी निकला सुप्रीम कोर्ट का आदेश
कई दिनों तक जालसाजों की बातों पर विश्वास करने के बाद बुजुर्ग दंपती को धीरे-धीरे पूरे मामले पर संदेह होने लगा। उन्होंने कथित कानूनी कार्रवाई और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ी जानकारी के बारे में पड़ताल शुरू की।
जांच करने पर उन्हें पता चला कि जिस आदेश और कानूनी कार्रवाई का हवाला देकर उन्हें डराया जा रहा था, वह फर्जी था। इसके बाद दंपती ने आखिरकार साइबर सेल से संपर्क किया और पूरे मामले की जानकारी दी।
पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच शुरू की। 27 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई और इसके बाद केस डायरी कोलार थाने भेजी गई।
अब बैंक खातों और WhatsApp नंबरों की जांच
पुलिस ने इस मामले में जालसाजों तक पहुंचने के लिए जांच तेज कर दी है। जांच के दौरान आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए सात WhatsApp नंबरों, वीडियो कॉल और उन पांच अलग-अलग बैंक खातों की जानकारी खंगाली जा रही है, जिनमें बुजुर्ग दंपती से रकम जमा कराई गई थी।
पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन बैंक खातों के पीछे कौन लोग हैं और रकम ट्रांसफर होने के बाद उसे कहां-कहां भेजा गया। साथ ही आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों और डिजिटल माध्यमों की भी जांच की जा रही है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ से रहें सावधान
यह मामला एक बार फिर लोगों के लिए बड़ा सबक है। पुलिस या कोई भी वास्तविक सरकारी अधिकारी आम तौर पर किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर घंटों या दिनों तक ‘अरेस्ट’ करके नहीं रखता। किसी भी व्यक्ति को केवल वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तार करने का दावा संदिग्ध माना जाना चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति पुलिस अधिकारी, CBI, ED, सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर फोन करे और गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग या संपत्ति जब्त करने का डर दिखाकर पैसे मांगे, तो घबराने के बजाय तुरंत परिवार के भरोसेमंद सदस्यों और संबंधित साइबर पुलिस से संपर्क करना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी सरकारी कार्रवाई को खत्म कराने, जांच से बचने या गिरफ्तारी रोकने के नाम पर फोन पर पैसे ट्रांसफर न करें।
भोपाल के इस मामले में बुजुर्ग दंपती को 96 दिनों तक डर के साये में रखकर 22 लाख रुपये की ठगी की गई। हालांकि अंततः उन्हें समझ आया कि पूरा मामला फर्जी है और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया। अब जांच एजेंसियों के सामने चुनौती इस साइबर गिरोह के उन सदस्यों तक पहुंचने की है, जिन्होंने कानून और अदालत के नाम का इस्तेमाल करके बुजुर्ग दंपती को निशाना बनाया। यह घटना बताती है कि साइबर ठग अब सिर्फ पैसे ही नहीं, बल्कि डर, फर्जी पहचान और मानसिक दबाव को हथियार बनाकर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं।
