13 साल से खाली है लोकायुक्त का पद, सरकार ने मांगा एक महीने का समय; हाईकोर्ट ने दो हफ्ते में प्रगति रिपोर्ट देने को कहा
नैनीताल: उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र और प्रभावी व्यवस्था की मांग के बीच लोकायुक्त की नियुक्ति का मामला एक बार फिर नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचा। लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर वर्ष 2021 में दायर जनहित याचिका पर गुरुवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि लोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए नियमावली तैयार की जानी है। इसके बाद नियमों के तहत नियुक्ति करने वाली सर्च कमेटी को प्रक्रिया के लिए आगे बढ़ाया जाएगा और इसी के आधार पर लोकायुक्त तथा अन्य सदस्यों का चयन किया जा सकेगा।
सरकार की ओर से अदालत से इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक महीने का समय मांगा गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार को एक महीने की मोहलत देने के बजाय दो सप्ताह के भीतर अब तक हुई प्रगति की स्थिति अदालत के सामने रखने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई अब दो सप्ताह बाद होगी।
यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई। अदालत के रुख से साफ है कि लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर अब सरकार से प्रक्रिया में ठोस प्रगति की उम्मीद की जा रही है।
नियमावली के बिना नियुक्ति में आ रही अड़चन
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि लोकायुक्त और उसके सदस्यों की नियुक्ति के लिए पहले आवश्यक नियमावली तैयार करना जरूरी है। सरकार के मुताबिक नियमावली तैयार होने के बाद ही नियुक्ति के लिए सर्च कमेटी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी। सर्च कमेटी द्वारा सुझाए गए नामों के आधार पर लोकायुक्त और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होगी।
सरकार ने इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा था, लेकिन हाईकोर्ट ने दो सप्ताह के भीतर प्रगति रिपोर्ट देने को कहा है। ऐसे में अब अगली सुनवाई में सरकार को यह बताना होगा कि नियमावली तैयार करने और नियुक्ति की दिशा में उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं।
2013 से खाली पड़ा है लोकायुक्त का पद
उत्तराखंड में लोकायुक्त का पद लंबे समय से खाली पड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2013 से लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई है। यानी राज्य गठन के बाद भ्रष्टाचार के मामलों की स्वतंत्र जांच और शिकायतों के निस्तारण के लिए जिस संस्था को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी, वह लंबे समय से प्रभावी तरीके से काम नहीं कर पा रही है।
यही वजह है कि लोकायुक्त की नियुक्ति का मामला समय-समय पर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बनता रहा है। अब यह मामला हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है और अदालत की निगाह सरकार की ओर से की जा रही प्रक्रिया पर है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, हल्द्वानी के गौलापार निवासी रवि शंकर जोशी ने वर्ष 2021 में नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया कि राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति लंबे समय से नहीं हुई है, जबकि लोकायुक्त संस्थान के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि जब लोकायुक्त की संस्था भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच और शिकायतों के निस्तारण के लिए बनाई गई है, तो लंबे समय तक उसका प्रभावी संचालन क्यों नहीं हो पा रहा है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि देश के कुछ राज्यों में लोकायुक्त संस्थाएं भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई कर रही हैं, जबकि उत्तराखंड में ऐसी व्यवस्था का अभाव महसूस किया जा रहा है।
जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर भी उठे सवाल
जनहित याचिका में राज्य की मौजूदा जांच व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका के मुताबिक राज्य की अधिकांश जांच एजेंसियां सरकार के अधीन आती हैं और राजनीतिक एवं प्रशासनिक नियंत्रण की वजह से उनकी स्वतंत्रता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।
याचिका में यह दावा भी किया गया कि वर्तमान व्यवस्था में ऐसी कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं है, जिसके पास बिना शासन की अनुमति के किसी राजपत्रित अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज करने का अधिकार हो। याचिका में विजिलेंस विभाग की कार्यप्रणाली का भी उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि विजिलेंस राज्य पुलिस का ही हिस्सा है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जांच व्यवस्था तभी प्रभावी मानी जा सकती है, जब जांच करने वाली संस्था राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर काम कर सके। इसी आधार पर उत्तराखंड में स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकायुक्त व्यवस्था को जरूरी बताया गया है।
छोटे मामलों से लेकर बड़े घोटालों तक पर नजर की उम्मीद
लोकायुक्त संस्था का उद्देश्य सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र मंच उपलब्ध कराना है। जनहित याचिका में कहा गया है कि यदि लोकायुक्त संस्था प्रभावी ढंग से काम करे तो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की प्रारंभिक जांच और सुनवाई के लिए नागरिकों को एक अलग मंच मिल सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि राज्य में होने वाली तमाम अनियमितताओं और कथित घोटालों से जुड़े मामलों को हर बार हाईकोर्ट तक पहुंचाने की आवश्यकता न पड़े, इसके लिए एक प्रभावी लोकायुक्त व्यवस्था जरूरी है। इससे एक ओर जहां आम लोगों को शिकायतों के निस्तारण का वैकल्पिक मंच मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर न्यायालयों पर पड़ने वाले मामलों के बोझ को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
अब अगली सुनवाई पर टिकी नजर
हाईकोर्ट द्वारा सरकार को एक महीने के बजाय दो सप्ताह का समय दिए जाने के बाद अब सबकी नजर अगली सुनवाई पर है। अगली सुनवाई में राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि लोकायुक्त नियुक्ति के लिए नियमावली तैयार करने की दिशा में कितनी प्रगति हुई है और आगे की प्रक्रिया किस स्तर तक पहुंची है।
लंबे समय से खाली पड़े इस पद की नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना होगा कि अगले दो सप्ताह में सरकार नियमावली और सर्च कमेटी से जुड़ी प्रक्रिया को कितना आगे बढ़ा पाती है।
उत्तराखंड जैसे तेजी से विकास कर रहे राज्य में पारदर्शी शासन और भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए लोकायुक्त की भूमिका अहम मानी जाती है। ऐसे में वर्षों से लंबित नियुक्ति का मामला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सुशासन, जवाबदेही और आम नागरिकों के भरोसे से जुड़ा मुद्दा भी बन गया है। अब हाईकोर्ट की अगली सुनवाई में सरकार की ओर से पेश की जाने वाली प्रगति रिपोर्ट इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
