
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में आयोजित जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) की बैठक उस समय सुर्खियों में आ गई, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता और एमएलसी देवेंद्र सिंह ने आजमगढ़ के पुलिस अधीक्षक डॉ. अनिल कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें “अपराधी” तक बता दिया। इस बयान के बाद न सिर्फ राजनीतिक माहौल गरमा गया है, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
मंगलवार दोपहर मऊ में आयोजित बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए एमएलसी देवेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि आजमगढ़ के एसपी द्वारा ‘गुडवर्क’ दिखाने के नाम पर फर्जी मामलों को अंजाम दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे अधिकारी की जगह जेल में होनी चाहिए और तत्काल कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर गिरफ्तार किया जाना चाहिए। एमएलसी के इस तीखे बयान ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
देवेंद्र सिंह ने एक मामले का उदाहरण देते हुए दावा किया कि एक व्यक्ति ने अपनी एफआईआर में स्पष्ट रूप से लिखा था कि उसके साथ कोई लूट या छिनैती नहीं हुई, बल्कि उसका बैग गिर गया था। इसके बावजूद पुलिस ने कथित तौर पर मामला दर्ज कर उसे लूट का केस बना दिया। एमएलसी के अनुसार यह पूरी कार्रवाई ‘फर्जी गुडवर्क’ दिखाने के उद्देश्य से की गई।
सबसे गंभीर आरोप लगाते हुए एमएलसी ने कहा कि एक भाजपा बूथ अध्यक्ष को फंसाने के लिए पुलिस ने उसकी आंख पर पट्टी बांधकर गोली मारी और फिर उसे मुठभेड़ का रूप दे दिया। उन्होंने इस घटना को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि यदि यह सच है तो यह कानून व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बताया जा रहा है कि यह मामला अभिषेक उर्फ धर्मेंद्र सिंह से जुड़ा है, जिसे उत्तर प्रदेश पुलिस की एसओजी और कोतवाली टीम ने जियो कंपनी के एक मैनेजर से लूट के आरोप में ‘हाफ एनकाउंटर’ के बाद गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा है कि आरोपी के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और वह जीयनपुर कोतवाली क्षेत्र के चकलाल चंद गांव का निवासी है। हालांकि एमएलसी के आरोपों ने इस पूरी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस विवाद के बीच बैठक में अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई। एमएलसी देवेंद्र सिंह ने निजी स्कूलों में किताब और ड्रेस की खरीद को लेकर हो रही अनियमितताओं पर नाराजगी जताई। उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक को निर्देश देने की बात कही कि किसी भी छात्र को एक ही दुकान से किताब या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य न किया जाए। उन्होंने कहा कि बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहनी चाहिए ताकि अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है। एक ओर जहां सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही प्रशासन के खिलाफ आवाज उठ रही है, वहीं विपक्ष को भी सरकार पर हमला करने का एक बड़ा मुद्दा मिल सकता है। विपक्षी दल इस मामले को कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली से जोड़कर सरकार को घेरने की तैयारी कर सकते हैं।
फिलहाल इस मामले में पुलिस या प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन जिस तरह के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उससे यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में इस मामले की जांच और संभावित कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। यदि जांच में आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह मामला प्रदेश की कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।



