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जम्मू-कश्मीर: कभी हिंदू राजाओं का गढ़ रहा पहलगाम, 800 साल पुराना ममलेश्वर मंदिर आज भी इतिहास का साक्षी

The Hill India News
Last updated: April 22, 2026 7:16 am
The Hill India News
Published: April 22, 2026
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जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों में बसा पहलगाम सिर्फ एक पर्यटन स्थल ही नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास, आस्था और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। आज यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और अमरनाथ यात्रा के बेस कैंप के रूप में प्रसिद्ध है, लेकिन इसके अतीत में झांकें तो यह हिंदू राजाओं के शासन, कश्मीरी शैव दर्शन और प्राचीन मंदिरों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार, पहलगाम को कभी “पुराना गांव” या “प्राचीन ग्राम” के रूप में जाना जाता था। इसका संबंध भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि जब भगवान शिव माता पार्वती को अमरत्व की कथा सुनाने के लिए अमरनाथ गुफा की ओर जा रहे थे, तब उन्होंने अपने वाहन नंदी को इसी स्थान पर छोड़ दिया था। यही कारण है कि पहलगाम को “चरवाहों का गांव” भी कहा जाता है।

इस क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व राजतरंगिणी में भी मिलता है, जिसे महान इतिहासकार कल्हण ने लिखा था। इसमें लिद्दर घाटी के इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जो प्राचीन काल में सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था। उस समय यह क्षेत्र कश्मीरी शैव दर्शन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, जहां विद्वान ध्यान, साधना और शास्त्रों का अध्ययन करते थे।

पहलगाम का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल ममलेश्वर मंदिर है, जो लगभग 800 साल पुराना माना जाता है। 12वीं शताब्दी में निर्मित यह शिव मंदिर पूरी तरह पत्थरों से बना है और आज भी अपनी मूल संरचना में खड़ा है। माना जाता है कि इसका निर्माण राजा जयसिंह के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि प्राचीन वास्तुकला और इतिहास का भी अद्भुत उदाहरण है।

इसके अलावा, पहलगाम के पास स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर भी इस क्षेत्र में हिंदू राजाओं के प्रभाव और उनकी स्थापत्य कला की झलक पेश करता है। स्थानीय कश्मीरी पंडितों के पास सदियों पुराने वंशावली रजिस्टर आज भी सुरक्षित हैं, जिनमें देशभर से आने वाले हिंदू परिवारों के पूर्वजों का विवरण दर्ज है।

मध्यकाल में, खासकर 14वीं से 16वीं सदी के बीच, जब कश्मीर में सुल्तानों का शासन था, तब पहलगाम खानाबदोश समुदायों—गुज्जर और बकरवाल—के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया। बाद में मुगल काल में यह क्षेत्र शाही परिवारों के लिए विश्राम स्थल और शिकारगाह के रूप में इस्तेमाल होने लगा। लिद्दर नदी के किनारे बसा यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण हमेशा आकर्षण का केंद्र रहा।

डोगरा शासकों के काल में पहलगाम को एक नए रूप में पहचान मिली। महाराजा रणबीर सिंह और महाराजा प्रताप सिंह के शासन में अमरनाथ यात्रा को व्यवस्थित किया गया और पहलगाम को इसका प्रमुख पड़ाव बनाया गया। इसके बाद महाराजा गुलाब सिंह और महाराजा हरि सिंह के समय में मंदिरों का जीर्णोद्धार और यात्रियों के लिए सुविधाएं विकसित की गईं।

ब्रिटिश काल में पहलगाम को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। अंग्रेज पर्यटक और पर्वतारोही इसे दुनिया के सबसे खूबसूरत “चरवाहा गांव” के रूप में वर्णित करते थे। आजादी के बाद, खासकर 1970 और 1980 के दशक में, यह स्थान बॉलीवुड की पसंदीदा शूटिंग लोकेशन बन गया। 1983 में रिलीज हुई फिल्म बेताब की शूटिंग के बाद यहां की एक घाटी का नाम ही “बेताब वैली” पड़ गया।

आज पहलगाम जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो श्रीनगर से लगभग 95 किलोमीटर दूर है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी करीब 10 हजार है, जिसमें लगभग 80 प्रतिशत मुस्लिम और करीब 18 प्रतिशत हिंदू समुदाय के लोग रहते हैं। इसके अलावा सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म के लोग भी यहां निवास करते हैं।

इतिहास, आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का अनूठा संगम पहलगाम आज भी अपने गौरवशाली अतीत की गवाही देता है। 800 साल पुराना ममलेश्वर मंदिर और इससे जुड़ी परंपराएं यह साबित करती हैं कि यह स्थान केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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