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चीन की ओर बढ़ता बांग्लादेश: तीस्ता प्रोजेक्ट समेत 17 समझौतों की तैयारी, भारत की बढ़ सकती है रणनीतिक चिंता

The Hill India News
Last updated: June 20, 2026 9:48 am
The Hill India News
Published: June 20, 2026
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दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिल सकता है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख तारिक रहमान की आगामी चीन यात्रा को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस यात्रा के दौरान बांग्लादेश और चीन के बीच करीब 15 से 17 महत्वपूर्ण समझौतों और समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। इन समझौतों में बुनियादी ढांचा, तकनीक, निवेश, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और जल संसाधन प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। सबसे अधिक चर्चा तीस्ता नदी परियोजना को लेकर हो रही है, जिसे भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा संवेदनशील विषय माना जाता है।

Contents
चीन के साथ बढ़ती नजदीकियांतीस्ता परियोजना पर विशेष फोकसभारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है तीस्ता?छोटा प्रतिनिधिमंडल, बड़ा एजेंडाशी जिनपिंग और ली कियांग से मुलाकातमलेशिया और चीन यात्रा के अलग-अलग उद्देश्यआर्थिक जरूरत या रणनीतिक बदलाव?भारत के सामने नई चुनौती

चीन के साथ बढ़ती नजदीकियां

बीते कुछ वर्षों में चीन ने दक्षिण एशिया में अपने आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव का लगातार विस्तार किया है। पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और मालदीव के बाद अब बांग्लादेश भी चीन के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। ढाका और बीजिंग के बीच प्रस्तावित समझौतों की संख्या और उनका दायरा इस बात का संकेत देते हैं कि बांग्लादेश केवल व्यापारिक सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह चीन को अपने विकास और बुनियादी ढांचे के प्रमुख साझेदार के रूप में देख रहा है।

बांग्लादेश के विदेश सचिव असद आलम सियाम ने प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इनमें एमओयू, द्विपक्षीय समझौते, एक्शन प्लान और सहयोग से जुड़े अन्य दस्तावेज शामिल हैं। माना जा रहा है कि इन समझौतों से दोनों देशों के आर्थिक संबंध और अधिक मजबूत होंगे।

तीस्ता परियोजना पर विशेष फोकस

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू तीस्ता नदी परियोजना है। तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है। नदी का उद्गम भारत के सिक्किम में होता है और यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। वर्षों से दोनों देशों के बीच तीस्ता जल बंटवारे को लेकर बातचीत चल रही है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

भारत में पश्चिम बंगाल सरकार ने कई बार जल बंटवारे को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। इसी वजह से तीस्ता समझौता लंबे समय से लंबित है। अब यदि बांग्लादेश इस परियोजना के विकास, पुनरुद्धार या प्रबंधन के लिए चीन को बड़ी भूमिका देता है, तो यह भारत के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन को तीस्ता नदी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम करने का अवसर मिलता है, तो भारतीय सीमा के निकट चीनी इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और निर्माण एजेंसियों की मौजूदगी बढ़ सकती है। सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार यह स्थिति भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील हो सकती है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है तीस्ता?

तीस्ता नदी केवल जल संसाधन का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत-बांग्लादेश संबंधों का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दा भी है। भारत लंबे समय से इस विषय पर संतुलित रुख अपनाता रहा है। एक ओर उसे बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने हैं, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की चिंताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

यदि बांग्लादेश चीन के सहयोग से तीस्ता परियोजना को आगे बढ़ाता है, तो भारत को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। इससे न केवल जल संसाधन प्रबंधन बल्कि सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

छोटा प्रतिनिधिमंडल, बड़ा एजेंडा

बांग्लादेश सरकार ने इस यात्रा के लिए अपेक्षाकृत छोटा प्रतिनिधिमंडल चुना है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मलेशिया और चीन की यात्रा में केवल 27 से 28 सदस्य शामिल होंगे। सरकार का कहना है कि वह खर्चों को नियंत्रित रखते हुए अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुखी कूटनीति पर ध्यान देना चाहती है।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रतिनिधिमंडल का आकार भले छोटा हो, लेकिन यात्रा का एजेंडा बेहद व्यापक और महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से चीन के साथ होने वाले समझौते भविष्य में बांग्लादेश की विदेश नीति और आर्थिक दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

शी जिनपिंग और ली कियांग से मुलाकात

यात्रा कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री तारिक रहमान 25 जून को चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग के साथ औपचारिक द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इस बैठक के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है। इसके बाद 26 जून को उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होगी।

इन बैठकों को केवल औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा है, बल्कि इन्हें दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती भूमिका और बांग्लादेश की नई विदेश नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि चीन बांग्लादेश को निवेश, ऋण और तकनीकी सहयोग के माध्यम से अपने प्रभाव क्षेत्र में और मजबूती से शामिल करना चाहता है।

मलेशिया और चीन यात्रा के अलग-अलग उद्देश्य

तारिक रहमान की विदेश यात्रा का पहला पड़ाव मलेशिया होगा। वहां बांग्लादेश का मुख्य ध्यान श्रम बाजार, रोजगार के अवसर, व्यापार और निवेश बढ़ाने पर रहेगा। मलेशिया में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी कामगार कार्यरत हैं और वहां से मिलने वाला विदेशी मुद्रा प्रवाह बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

दूसरी ओर चीन यात्रा का केंद्र बिंदु बुनियादी ढांचा विकास, तकनीकी सहयोग और रणनीतिक निवेश होगा। बांग्लादेश वर्तमान में आर्थिक दबाव, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधनों की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में चीन उसके लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय साझेदार बनकर उभर सकता है।

आर्थिक जरूरत या रणनीतिक बदलाव?

विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर बहस जारी है कि बांग्लादेश का चीन की ओर झुकाव केवल आर्थिक जरूरतों का परिणाम है या फिर यह उसकी विदेश नीति में किसी बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही ढाका सरकार निवेश और आसान ऋण की तलाश में चीन के साथ संबंध मजबूत कर रही है।

वहीं दूसरी ओर कुछ जानकार इसे दक्षिण एशिया में बदलते शक्ति संतुलन का हिस्सा मानते हैं। उनका कहना है कि बांग्लादेश अब अपने कूटनीतिक विकल्पों का विस्तार करना चाहता है और किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर रहने से बचना चाहता है।

भारत के सामने नई चुनौती

भारत और बांग्लादेश के संबंध पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। सीमा विवादों के समाधान, कनेक्टिविटी परियोजनाओं, व्यापार और सुरक्षा सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन यदि चीन को बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर रणनीतिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भूमिका मिलती है, तो नई दिल्ली को अपने पड़ोसी देश के साथ संबंधों को और अधिक सक्रियता से संभालना होगा।

विशेष रूप से तीस्ता परियोजना पर चीन की संभावित भागीदारी भारत के लिए एक संवेदनशील विषय बन सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश चीन के साथ अपने संबंधों को किस सीमा तक ले जाता है और भारत इस बदलते समीकरण का जवाब किस प्रकार देता है।

दक्षिण एशिया की राजनीति में यह घटनाक्रम केवल एक विदेश यात्रा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, आर्थिक हितों और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नए अध्याय की शुरुआत भी साबित हो सकता है।

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