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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > उत्तराखंड वन विभाग में पुनर्गठन के प्रस्ताव से मचा हड़कंप, 10 डिवीजन खत्म होने की आशंका, अब कर्मियों ने उठाई ये मांग
उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड वन विभाग में पुनर्गठन के प्रस्ताव से मचा हड़कंप, 10 डिवीजन खत्म होने की आशंका, अब कर्मियों ने उठाई ये मांग

The Hill India News
Last updated: January 13, 2026 2:12 am
The Hill India News
Published: January 13, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड के विशाल वन संपदा और वन्यजीवों के संरक्षण की धुरी माना जाने वाला ‘वन विभाग’ इन दिनों एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल की दहलीज पर खड़ा है। राज्य सरकार और शासन स्तर पर विभाग के पुनर्गठन (Restructuring) को लेकर चल रही कवायद ने विभागीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है। फाइलों में तैयार हो रहे इस नए खाके ने जहाँ प्रशासनिक सुधारों की उम्मीद जगाई है, वहीं निचले स्तर से लेकर अधिकारी वर्ग तक में भविष्य को लेकर असुरक्षा और आशंकाओं का माहौल पैदा कर दिया है।

Contents
क्या है पुनर्गठन का नया खाका?कैबिनेट की मुहर का इंतजार, फाइलों में दौड़ रहा प्रस्तावकर्मचारियों ने खोला मोर्चा: ‘संवादहीनता’ पर उठाए सवालSDO और रेंजर्स के बीच ‘पद’ छिनने का डरपर्यावरण बनाम प्रशासनिक ढांचा: एक बड़ी चुनौतीसरकार के पाले में गेंद

क्या है पुनर्गठन का नया खाका?

शासन स्तर पर चल रही समीक्षा के अनुसार, प्रस्तावित पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य विभाग की कार्यक्षमता को बढ़ाना और अनावश्यक प्रशासनिक बोझ को कम करना है। सूत्रों की मानें तो इस नए प्रस्ताव के तहत राज्य में वन विभाग के डिवीजनों की संख्या में लगभग 10 तक की कटौती की जा सकती है।

सबसे बड़ा बदलाव ‘टेरिटोरियल’ (प्रादेशिक) और ‘नॉन-टेरिटोरियल’ (गैर-प्रादेशिक) डिवीजनों के वर्गीकरण को लेकर है। वर्तमान में मौजूद इन दोनों श्रेणियों को समाप्त कर सभी डिवीजनों को एक समान ‘टेरिटोरियल’ स्वरूप में स्थापित करने की योजना है। शासन का तर्क है कि इससे वन प्रबंधन और वन्यजीवों की सुरक्षा अधिक प्रभावी होगी, लेकिन कर्मचारियों के लिए यह गणित उनके करियर की प्रगति में बाधक नजर आ रहा है।


कैबिनेट की मुहर का इंतजार, फाइलों में दौड़ रहा प्रस्ताव

फिलहाल यह पूरा मामला प्रस्ताव के प्रारंभिक स्तर पर है। शासन इसके हर तकनीकी और व्यावहारिक पहलू की गहन समीक्षा कर रहा है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह देखा जा रहा है कि इस बदलाव से पर्यावरण संरक्षण और वनों की आग जैसी चुनौतियों से निपटने में कितनी मदद मिलेगी।

“समीक्षा के बाद यह प्रस्ताव कार्मिक विभाग को भेजा जाएगा और वहां से हरी झंडी मिलने के बाद इसे अंतिम निर्णय के लिए कैबिनेट के समक्ष रखा जाएगा।”


कर्मचारियों ने खोला मोर्चा: ‘संवादहीनता’ पर उठाए सवाल

जैसे ही पुनर्गठन की खबरें सार्वजनिक हुईं, वन विभाग के विभिन्न संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। कर्मचारियों का सबसे बड़ा तर्क यह है कि इतने महत्वपूर्ण निर्णय में उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया।

सहायक वन कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष स्वरूप चंद रमोला ने इस मुद्दे पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि पुनर्गठन का सीधा असर कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र, पदोन्नति (Promotion) और तैनाती पर पड़ेगा। रमोला के अनुसार, “बिना संवाद के लिया गया कोई भी निर्णय उचित नहीं होगा। यह हमारे करियर के अवसरों को सीमित करने जैसा है।”

SDO और रेंजर्स के बीच ‘पद’ छिनने का डर

प्रस्तावित बदलाव से सबसे अधिक चिंतित SDO (उप प्रभागीय वनाधिकारी) स्तर के अधिकारी हैं। वर्तमान में नॉन-टेरिटोरियल डिवीजनों में उन्हें DFO या प्रभारी DFO बनने का अवसर मिलता है। यदि ये डिवीजन खत्म होते हैं, तो प्रमोशन और स्वतंत्र प्रभार के रास्ते लगभग बंद हो जाएंगे।

यही स्थिति डिप्टी रेंजर्स और रेंजर्स की भी है। कर्मचारियों की आशंकाएं निम्नलिखित बिंदुओं पर केंद्रित हैं:

  • रेंज की संख्या में कमी: यदि डिवीजनों की संख्या घटेगी, तो स्वाभाविक रूप से रेंज (परिक्षेत्र) भी कम होंगे।

  • फील्ड पोस्टिंग का संकट: रेंज कम होने से वरिष्ठ रेंजर्स को फील्ड पोस्टिंग मिलना कठिन हो जाएगा।

  • अनुभव की कमी: नई व्यवस्था में पद कम होने से युवा अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य अनुभव पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।


पर्यावरण बनाम प्रशासनिक ढांचा: एक बड़ी चुनौती

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए वन विभाग केवल एक सरकारी महकमा नहीं है, बल्कि यह राज्य के 70% से अधिक भूभाग का संरक्षक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुनर्गठन से मानव-वन्यजीव संघर्ष कम होता है और वनों की कटाई पर लगाम लगती है, तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन यदि कर्मचारियों का मनोबल गिरता है, तो इसका सीधा असर ग्रास-रूट लेवल के वन संरक्षण कार्यों पर पड़ सकता है।

सरकार के पाले में गेंद

उत्तराखंड वन विभाग के पुनर्गठन की यह फाइल अब सियासत और प्रशासन के बीच झूल रही है। एक ओर सरकार इसे आधुनिक प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम मान रही है, तो दूसरी ओर कर्मचारी इसे अपने भविष्य के साथ खिलवाड़ बता रहे हैं। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री और वन मंत्री के रुख पर टिकी हैं—क्या वे कर्मचारियों के सुझावों को शामिल करेंगे या इस ‘प्रशासनिक सर्जरी’ को बिना किसी बदलाव के लागू करेंगे?

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