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भारतीय राजनीति के ‘वैचारिक रंगमंच’ का एक अध्याय समाप्त: नहीं रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस के सीनियर नेता केपी उन्नीकृष्णन

The Hill India News
Last updated: March 3, 2026 5:05 am
The Hill India News
Published: March 3, 2026
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Photo: ANI X
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कोझिकोड/तिरुवनंतपुरम: भारतीय राजनीति के उस स्वर्ण युग का एक और सितारा आज ओझल हो गया, जो संसद को केवल ‘संख्या बल’ का अखाड़ा नहीं, बल्कि ‘विचारों का रंगमंच’ मानता था। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता केपी उन्नीकृष्णन (KP Unnikrishnan) का आज कोझिकोड के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 80 के दशक के उत्तरार्ध से ही उम्र संबंधी विभिन्न बीमारियों से जूझ रहे थे।

Contents
कोझिकोड में ली अंतिम सांससंसद के ‘प्रखर वक्ता’ और वैचारिक योद्धास्वतंत्रताोत्तर भारत की वैचारिक उथल-पुथल के गवाहकेरल की राजनीति का अद्वितीय स्थानमुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने दी भावभीनी श्रद्धांजलिकेंद्रीय मंत्री के रूप में उल्लेखनीय कार्यकालअंतिम यात्रा और विदाई

उनके निधन की सूचना मिलते ही केरल सहित देश के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे राज्य की अपूरणीय क्षति बताया है।

कोझिकोड में ली अंतिम सांस

पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, उन्नीकृष्णन पिछले कुछ समय से कोझिकोड के एक निजी अस्पताल में उपचाराधीन थे। बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उनके भीतर का राजनीतिक विश्लेषक हमेशा सक्रिय रहा। उनके निधन के साथ ही केरल ने उस पीढ़ी के अंतिम प्रतिनिधियों में से एक को खो दिया है, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारत की लोकतांत्रिक जड़ों को सींचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

संसद के ‘प्रखर वक्ता’ और वैचारिक योद्धा

केपी उन्नीकृष्णन का नाम उन गिने-चुने नेताओं में शुमार था, जिनकी धाक पक्ष और विपक्ष दोनों में समान रूप से थी। वे छह बार लोकसभा के सदस्य रहे और संसद में उनकी उपस्थिति मात्र से चर्चा का स्तर ऊंचा हो जाता था।

  • वैचारिक दृढ़ता: वे स्वभाव से एक पक्के समाजवादी थे।

  • संसदीय मर्यादा: उनके लिए संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं थी, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर गहन चिंतन करने का एक पवित्र मंच था।

  • अध्ययनशील व्यक्तित्व: उनकी भाषण शैली तथ्यों पर आधारित और तार्किक होती थी, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई।

स्वतंत्रताोत्तर भारत की वैचारिक उथल-पुथल के गवाह

उन्नीकृष्णन की राजनीतिक यात्रा किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं रही। उन्होंने भारतीय राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखे और उनमें सक्रिय भागीदारी निभाई।

  1. कांग्रेस के वफादार सिपाही: उन्होंने लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़कर संगठन को मजबूत किया।

  2. आपातकाल के आलोचक: 1975 के आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद की और तानाशाही प्रवृत्तियों के प्रबल आलोचक बनकर उभरे।

  3. राष्ट्रीय मोर्चा का दौर: जब देश में गठबंधन की राजनीति ने आकार लेना शुरू किया, तो वे राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) के प्रमुख चेहरों में से एक बने और वीपी सिंह सरकार में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

केरल की राजनीति का अद्वितीय स्थान

केरल की राजनीति में उन्नीकृष्णन का स्थान अद्वितीय था। उन्हें किसी एक संकीर्ण श्रेणी में नहीं बांधा जा सकता था। वे एक तरफ उत्तर भारतीय राजनीति की नब्ज पहचानते थे, तो दूसरी तरफ केरल की जमीनी हकीकत से गहराई से जुड़े थे। वे उस ‘समाजवादी विचारधारा’ के वाहक थे, जो गरीब और मध्यम वर्ग के उत्थान की बात करती थी, लेकिन संसदीय लोकतंत्र की सीमाओं का सम्मान भी करती थी।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपने शोक संदेश में कहा कि केपी उन्नीकृष्णन का निधन राज्य की राजनीति में एक ऐसे शून्य को जन्म देता है जिसे भरना असंभव है। मुख्यमंत्री ने कहा, “उन्नीकृष्णन उन दुर्लभ राजनेताओं में से थे जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। उनके पास न केवल एक स्पष्ट राजनीतिक दृष्टि थी, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी भंडार था।” राज्य के अन्य प्रमुख नेताओं, जिनमें विपक्ष के नेता और विभिन्न दलों के अध्यक्ष शामिल हैं, ने भी उन्हें याद करते हुए उनके योगदान को सराहा है।

केंद्रीय मंत्री के रूप में उल्लेखनीय कार्यकाल

केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते हुए उन्नीकृष्णन ने कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। उनके कार्यकाल को प्रशासनिक कुशलता और नीतिगत स्पष्टता के लिए याद किया जाता है। उन्होंने बुनियादी ढांचे और संचार के क्षेत्र में कई ऐसे सुधारों की नींव रखी, जिसका लाभ आने वाले वर्षों में देश को मिला। उनके लिए पद कभी अहंकार का विषय नहीं रहा, बल्कि सेवा का एक माध्यम बना रहा।

अंतिम यात्रा और विदाई

कोझिकोड प्रशासन और परिवार के सदस्यों के अनुसार, उन्नीकृष्णन का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा, ताकि उनके प्रशंसक और अनुयायी उन्हें विदाई दे सकें। उनके अंतिम संस्कार में कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं के शामिल होने की संभावना है।

केपी उन्नीकृष्णन का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का अवसान है जहाँ संवाद और वैचारिक मतभेदों के बावजूद आपसी सम्मान बना रहता था। उन्होंने सिखाया कि राजनीति केवल सत्ता पाने का जरिया नहीं, बल्कि समाज की चेतना को जागृत करने का संकल्प है। आज पूरा देश उन्हें एक निष्पक्ष, निर्भीक और विद्वान राजनेता के रूप में नमन कर रहा है।

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