देहरादून: उत्तराखंड का चमोली जिला एक बार फिर वैज्ञानिकों की गंभीर चिंता के केंद्र में है। हिमालयी क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे भूस्खलनों के बीच वैज्ञानिकों की हालिया स्टडी ने ऐसे कई संकेत सामने रखे हैं, जो आने वाले समय के लिए चेतावनी माने जा सकते हैं। अध्ययन में चमोली जिले के भूस्खलन पैटर्न का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है और अलग-अलग प्राकृतिक तथा मानवजनित कारकों को एक साथ रखकर यह समझने की कोशिश की गई है कि आखिर किन परिस्थितियों में पहाड़ सबसे ज्यादा अस्थिर होते हैं।
7 सितंबर 2026 को International Journal of Geo-Engineering में प्रकाशित अध्ययन “Comparative assessment of landslide susceptibility using heuristic and statistical models in Chamoli Uttarakhand” में चमोली जिले के भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन में सामने आया कि जिले का एक बड़ा हिस्सा हाई और वेरी हाई लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी यानी भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्र में आता है।
सबसे अहम बात यह है कि वैज्ञानिकों ने भूस्खलन को केवल बारिश या किसी एक प्राकृतिक घटना का परिणाम मानने के बजाय भूगर्भीय संरचना, ढलान, नदी कटाव, सड़क नेटवर्क, वनक्षरण, भूमि उपयोग, बारिश, मिट्टी और अन्य कई कारकों के संयुक्त प्रभाव को खतरे से जोड़कर देखा है। यही वजह है कि यह अध्ययन सिर्फ चमोली के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में विकास और आपदा प्रबंधन की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
चमोली के 452.85 वर्ग किमी क्षेत्र को ‘वेरी हाई’ संवेदनशीलता
अध्ययन के अनुसार चमोली जिले को भूस्खलन की संवेदनशीलता के आधार पर पांच अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया। वैज्ञानिकों ने कुल 7,794 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विश्लेषण किया।
इसमें—
- 556.57 वर्ग किमी यानी 7.14 प्रतिशत क्षेत्र वेरी लो संवेदनशीलता में आया।
- 2,054.64 वर्ग किमी यानी 26.36 प्रतिशत क्षेत्र लो संवेदनशीलता में पाया गया।
- 2,552.05 वर्ग किमी यानी 32.74 प्रतिशत क्षेत्र मॉडरेट संवेदनशीलता में रहा।
- 2,178.40 वर्ग किमी यानी 27.95 प्रतिशत क्षेत्र हाई संवेदनशीलता में पाया गया।
- जबकि 452.85 वर्ग किमी यानी 5.81 प्रतिशत क्षेत्र वेरी हाई संवेदनशीलता वाली श्रेणी में रखा गया।
यानी हाई और वेरी हाई श्रेणी को जोड़ें तो करीब 2,631 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ऐसा सामने आया, जहां भूस्खलन का खतरा काफी अधिक है। यह जिले के कुल क्षेत्रफल का लगभग 33.76 प्रतिशत बैठता है।
आसान भाषा में समझें तो चमोली के लगभग हर तीन वर्ग किलोमीटर में से एक वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र ऐसा है, जहां भूस्खलन की संवेदनशीलता हाई या वेरी हाई श्रेणी में पाई गई है।
पहले 1,821 भूस्खलन स्थलों को किया गया चिन्हित
वैज्ञानिकों ने अध्ययन की शुरुआत चमोली जिले में मौजूद भूस्खलन स्थलों की पहचान से की। अध्ययन के दौरान कुल 1,821 लैंडस्लाइड लोकेशन चिन्हित किए गए। इसके बाद इन भूस्खलनों और उनके आसपास मौजूद परिस्थितियों का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में बेहद छोटे यानी 0.001 वर्ग किलोमीटर से कम क्षेत्रफल वाले भूस्खलनों को विश्लेषण से बाहर रखा गया। इसके बाद अलग-अलग मॉडल और पैरामीटर के माध्यम से यह समझने की कोशिश की गई कि किन क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावना अधिक है और इसके पीछे कौन-कौन से कारण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस तरह वैज्ञानिकों ने सिर्फ यह नहीं देखा कि भूस्खलन कहां हुआ, बल्कि यह भी समझने का प्रयास किया कि वहां ऐसा क्यों हुआ और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा किन परिस्थितियों में हो सकती है।
24 फैक्टर्स से तलाशे गए भूस्खलन के कारण
अध्ययन की खास बात यह है कि इसमें भूस्खलन की संवेदनशीलता को समझने के लिए 24 अलग-अलग प्राकृतिक और मानवजनित फैक्टर्स को शामिल किया गया।
इनमें जमीन की ढलान, ऊंचाई, भूगर्भीय संरचना, वर्षा, नदी और नालों से दूरी, सड़क से दूरी, फॉल्ट, लाइनामेंट से दूरी, ड्रेनेज डेंसिटी, भूमि उपयोग, NDVI, जंगलों में बदलाव, मिट्टी, भूकंपीय गतिविधि और टेरेन रग्डनेस जैसे कारक शामिल रहे।
यानी पहाड़ की प्राकृतिक बनावट से लेकर इंसानी गतिविधियों तक को एक ही वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में रखकर भूस्खलन का जोखिम समझने की कोशिश की गई।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालय में कोई भी बड़ा भूस्खलन आमतौर पर केवल एक वजह से नहीं होता। कमजोर चट्टान, खड़ी ढलान, लगातार बारिश, नदी का कटाव और सड़क निर्माण जैसी परिस्थितियां एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं।
तीन वैज्ञानिक मॉडल की हुई तुलना
अध्ययन में भूस्खलन संवेदनशीलता का आकलन करने के लिए तीन प्रमुख मॉडल इस्तेमाल किए गए—
Frequency Ratio (FR), Shannon Entropy और Analytical Hierarchy Process (AHP)।
इन तीनों मॉडलों के परिणामों की तुलना की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि चमोली जैसे जटिल हिमालयी इलाके में कौन सा मॉडल भूस्खलन संवेदनशीलता की बेहतर तस्वीर प्रस्तुत करता है।
अध्ययन में Frequency Ratio मॉडल सबसे प्रभावी पाया गया। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने 1,821 चिन्हित भूस्खलन स्थलों में से लगभग 70 प्रतिशत यानी 1,260 स्थलों के आधार पर मुख्य विश्लेषण किया। शेष करीब 30 प्रतिशत यानी 561 भूस्खलन स्थलों को अलग-अलग पैरामीटर के जरिए जांचा गया।
इस विश्लेषण से तैयार संवेदनशीलता मैप भविष्य में आपदा प्रबंधन और विकास योजनाओं के लिए उपयोगी हो सकता है।
वन कटे तो बढ़ा भूस्खलन का खतरा
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वन आवरण में बदलाव से जुड़ा है। वैज्ञानिकों ने 2008 और 2024 के वन आवरण की तुलना करते हुए यह समझने की कोशिश की कि जिन क्षेत्रों में जंगलों में कमी आई, वहां भूस्खलन का व्यवहार कैसा रहा।
अध्ययन में डिफोरेस्टेशन वाले क्षेत्रों का Frequency Ratio 5.340 पाया गया, जबकि स्थिर वन क्षेत्रों में यह अनुपात काफी कम रहा।
सैटेलाइट विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कुल लैंडस्लाइड क्षेत्र के करीब 3.13 प्रतिशत हिस्से में डिफोरेस्टेशन काफी अधिक था, लेकिन इसी क्षेत्र में लैंडस्लाइड का हिस्सा करीब 16.70 प्रतिशत पाया गया।
यह आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है। इसका सीधा संकेत है कि जहां वन आवरण में बड़ी कमी आई, वहां भूस्खलन की घटनाओं की मौजूदगी अनुपातहीन रूप से अधिक देखी गई।
पेड़ों की जड़ें मिट्टी और ढलान को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में वनक्षरण के साथ जमीन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है और बारिश या पानी के दबाव में ढलान के खिसकने का जोखिम बढ़ सकता है।
सड़कें विकास की जरूरत, लेकिन पहाड़ के लिए जोखिम भी
चमोली जैसे पहाड़ी जिले में सड़कें जीवनरेखा हैं। सड़कें गांवों, बाजारों, पर्यटन स्थलों और सीमावर्ती क्षेत्रों को जोड़ती हैं। लेकिन अध्ययन में सड़क नेटवर्क और भूस्खलन के बीच भी महत्वपूर्ण संबंध दिखाई दिया है।
वैज्ञानिकों के spatial analysis में हाई और वेरी हाई संवेदनशीलता वाले क्षेत्र विशेष रूप से रोड कॉरिडोर और रिवर बैंक के आसपास दिखाई दिए।
इसका मतलब यह नहीं कि हर सड़क भूस्खलन का कारण है, लेकिन पहाड़ की ढलान काटकर बनाई गई सड़कें, प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव और कमजोर भूगर्भीय क्षेत्रों में निर्माण ढलान की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
चमोली में सड़कें अक्सर गहरी घाटियों और खड़ी ढलानों से होकर गुजरती हैं। इसके आसपास आबादी, पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाएं और परिवहन गतिविधियां भी होती हैं। ऐसे में यदि सड़क कटिंग, नदी कटाव, भारी बारिश और कमजोर चट्टान एक साथ मौजूद हों तो जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।
नदी किनारे के इलाके भी संवेदनशील
अध्ययन में नदी और नालों से दूरी को भी भूस्खलन संवेदनशीलता के प्रमुख फैक्टर्स में शामिल किया गया। हिमालयी नदियां लगातार पहाड़ों और घाटियों की संरचना को प्रभावित करती हैं। तेज बहाव के दौरान नदी किनारों का कटाव ढलानों के निचले हिस्से को कमजोर कर सकता है।
जब नदी कटाव के साथ भारी बारिश और ऊपर से कमजोर चट्टान या सड़क कटिंग जुड़ जाए तो ढलान के अस्थिर होने की संभावना और बढ़ जाती है।
यही वजह है कि अध्ययन में हाई और वेरी हाई संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में नदी घाटियों और सड़क कॉरिडोर की मौजूदगी विशेष रूप से महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
ऋषिगंगा जैसी आपदा को सिर्फ ‘प्राकृतिक’ मानना पर्याप्त नहीं
अध्ययन में वर्ष 2021 की ऋषिगंगा आपदा का भी संदर्भ दिया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार चमोली का यह क्षेत्र पहले से ही कई तरह की भूगर्भीय और भौगोलिक चुनौतियों से प्रभावित है।
इनमें टेक्टोनिक एक्टिविटी, फ्रैक्चर्ड जियोलॉजी, तीव्र ढलान, भारी बारिश और कमजोर भूगर्भीय परिस्थितियां शामिल हैं।
टेक्टोनिक एक्टिविटी का संबंध पृथ्वी की स्थलमंडलीय प्लेटों की गति और उनके बीच होने वाली भूगर्भीय प्रक्रियाओं से है। वहीं fractured geology का मतलब ऐसी भूगर्भीय संरचना से है जिसमें चट्टानों में दरारें, joints और faults मौजूद हों।
ऐसे क्षेत्र में यदि भारी बारिश होती है और साथ ही नदी कटाव, सड़क कटिंग तथा वनक्षरण जैसी गतिविधियां मौजूद हों, तो खतरा और बढ़ सकता है।
इसलिए वैज्ञानिकों का संकेत है कि भविष्य में होने वाली किसी बड़ी आपदा को केवल ‘भारी बारिश से आई प्राकृतिक आपदा’ कहकर समझना पर्याप्त नहीं होगा। आपदा के पीछे कई जोखिम कारक एक साथ काम कर सकते हैं।
जब कई खतरे एक साथ मिलते हैं, तब बढ़ता है बड़ा जोखिम
चमोली के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति तब बन सकती है जब कई जोखिम कारक एक साथ मौजूद हों।
मसलन—
भारी बारिश + खड़ी ढलान + कमजोर चट्टान + नदी कटाव + सड़क कटिंग + वनक्षरण।
इन परिस्थितियों का मेल पहाड़ की स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने अलग-अलग कारकों का अध्ययन करने के बजाय इन्हें एक साथ जोड़कर संवेदनशीलता मैप तैयार किया है। यह मैप प्रशासन को यह समझने में मदद कर सकता है कि किसी क्षेत्र में सड़क, भवन, पर्यटन या अन्य निर्माण की योजना बनाते समय कितनी सावधानी बरतने की जरूरत है।
वैज्ञानिकों ने प्रशासन को दिए कई अहम सुझाव
अध्ययन सिर्फ खतरे की पहचान तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने भूस्खलन जोखिम को कम करने के लिए कई सुझाव भी दिए हैं।
उनका कहना है कि तैयार किए गए लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप को जिला आपदा प्रबंधन, सड़क योजना, स्लोप स्टेबलाइजेशन, निर्माण नियंत्रण और वनीकरण की नीतियों में शामिल किया जाना चाहिए।
इसके अलावा खड़ी ढलानों, कमजोर भूगर्भीय संरचना, भारी बारिश वाले क्षेत्रों, नदी घाटियों, सड़क कॉरिडोर और वनक्षरण वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी की जरूरत है।
सड़क और निर्माण परियोजनाओं की प्लानिंग में बदले रणनीति
यदि संवेदनशीलता मैप को विकास योजनाओं में शामिल किया जाता है तो भविष्य की सड़क और अन्य निर्माण परियोजनाओं की योजना ज्यादा वैज्ञानिक तरीके से बनाई जा सकती है।
किसी क्षेत्र में सड़क बनाने से पहले यह देखा जा सकता है कि वहां की ढलान कितनी स्थिर है, भूगर्भीय संरचना कैसी है, आसपास नदी या नाला कितना करीब है और वहां पहले कितने भूस्खलन हो चुके हैं।
इसी तरह हाई रिस्क क्षेत्र में निर्माण को नियंत्रित किया जा सकता है और जरूरी होने पर slope stabilization तथा bio-engineering जैसे उपायों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
चमोली के लिए चेतावनी भी और योजना का रास्ता भी
चमोली की यह स्टडी एक तरफ हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को लेकर गंभीर चेतावनी देती है, तो दूसरी तरफ प्रशासन और नीति निर्माताओं को वैज्ञानिक आधार पर योजना बनाने का रास्ता भी दिखाती है।
जिले का 452.85 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वेरी हाई संवेदनशीलता में और कुल 2,631 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हाई या वेरी हाई संवेदनशीलता में पाया जाना अपने आप में बड़ा संकेत है।
सबसे अहम बात यह है कि अध्ययन भूस्खलन को केवल प्राकृतिक घटनाओं से नहीं जोड़ता, बल्कि मानवीय गतिविधियों और प्राकृतिक परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव पर जोर देता है।
सड़कें जरूरी हैं, विकास जरूरी है, पर्यटन और कनेक्टिविटी भी जरूरी है, लेकिन हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर किया गया विकास भविष्य में भारी पड़ सकता है। इसलिए जरूरत ऐसी विकास नीति की है जिसमें सड़क और निर्माण परियोजनाओं के साथ पहाड़ की वहन क्षमता, भूगर्भीय स्थिति, वन आवरण और जल निकासी को भी बराबर महत्व मिले।
चमोली की यह वैज्ञानिक स्टडी मूल रूप से एक सवाल सामने रखती है—क्या हम हर भूस्खलन के बाद सिर्फ मलबा हटाने की तैयारी करेंगे, या उससे पहले उन पहाड़ों को पहचानेंगे जो पहले से ही खतरे की सीमा पर खड़े हैं?
यदि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार संवेदनशीलता मैप को समय रहते सड़क निर्माण, निर्माण नियंत्रण, वन संरक्षण, ढलान स्थिरीकरण और आपदा प्रबंधन की योजनाओं का हिस्सा बनाया जाता है, तो भविष्य में नुकसान को कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है। हिमालय को रोका नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक समझ, बेहतर योजना और समय रहते चेतावनी के जरिए आपदा के असर को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है।
