नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल जिले से आने वाले बहुचर्चित भवाली नरेश पांडे कांड में शुक्रवार को एक ऐसा नाटकीय और अभूतपूर्व घटनाक्रम सामने आया, जिसने इस पूरे मामले की कानूनी दिशा को बदल कर रख दिया है। भवाली व्यापार मंडल के अध्यक्ष नरेश पांडे के खिलाफ जिस युवती की शिकायत पर यौन शोषण, जबरन गर्भपात और धमकी देने जैसी गंभीर धाराओं में मुख्य मुकदमा दर्ज हुआ था, पुलिस ने तफ्तीश के बाद उसी युवती को इस मामले में सह-आरोपी बना डाला। पुलिस द्वारा युवती को गिरफ्तार कर जिला न्यायालय में पेश किया गया और गहन पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड की मांग की गई। हालांकि, अदालत ने मामले के कानूनी पहलुओं और उपलब्ध तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पुलिस की रिमांड अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया और युवती को 30 हजार रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दे दी।
12 घंटे की मैराथन पूछताछ और मेडिकल टेस्ट
इस हाई-प्रोफाइल मामले में पुलिस की कार्रवाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अदालत में पेश करने से पहले पुलिस ने संबंधित युवती को मल्लीताल कोतवाली में रखकर करीब 12 घंटे तक कड़ी पूछताछ की। इस लंबी पूछताछ के दौरान पुलिस ने मामले से जुड़े विभिन्न कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया। पूछताछ की प्रक्रिया पूरी होने के बाद देर रात युवती को बीडी पांडे जिला चिकित्सालय ले जाया गया, जहां उसका अनिवार्य मेडिकल परीक्षण कराया गया। इसके बाद शुक्रवार को पुलिस ने पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के बीच उसे जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया, जहां दोनों पक्षों के बीच जोरदार कानूनी बहस हुई।
अदालत ने क्यों खारिज की पुलिस की रिमांड अर्जी?
सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले के प्राथमिक कानूनी पहलुओं और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तकनीकी प्रावधानों पर विशेष ध्यान दिया। न्यायालय ने पुलिस की दलीलों को अपर्याप्त पाते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
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BNS की धारा-64 की व्याख्या: अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-64 की परिभाषा का संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया कि इस विशिष्ट धारा के तहत जिस अपराध (दुष्कर्म) की व्याख्या की गई है, वह कानूनी रूप से किसी पुरुष द्वारा किए गए कृत्य के संदर्भ में ही परिभाषित है। ऐसे में केवल एक महिला द्वारा इस तरह का अपराध कारित होना प्रथम दृष्टया संभव नहीं माना गया है।
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सत्येंद्र कुमार अंतिल फैसले का हवाला: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन मामलों में सजा 7 वर्ष या उससे कम है, उनमें गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए। बिना किसी ठोस, अपरिहार्य और आवश्यक कारण के किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
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जांच में सहयोग: अदालत ने इस तथ्य को भी रिकॉर्ड पर लिया कि संबंधित युवती स्थानीय निवासी है और उसके देश छोड़कर भागने या जांच से बचने की कोई आशंका नहीं है। पुलिस अदालत के समक्ष ऐसा कोई तथ्य नहीं रख सकी जिससे यह साबित हो कि युवती ने जांच में सहयोग करने से इनकार किया हो।
“पुलिस रिमांड की मांग के समर्थन में कोई भी ठोस या प्रत्यक्ष साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने में पूरी तरह नाकाम रही। अदालत ने पुलिस के सतही तर्कों को दरकिनार कर कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत जमानत का आदेश दिया।” – पीड़ित युवती के अधिवक्ता
क्या हैं पुलिस के आरोप और बचाव पक्ष का दावा?
इस पूरे भवाली नरेश पांडे कांड में पुलिस की थ्योरी अब एक अलग दिशा में मुड़ चुकी है। पुलिस का आरोप है कि मूल शिकायतकर्ता युवती केवल पीड़ित नहीं है, बल्कि उसने मुख्य आरोपी नरेश पांडे के साथ मिलकर एक सुनियोजित नेटवर्क की तरह काम किया। पुलिस के मुताबिक, उक्त युवती अन्य महिलाओं और छात्राओं को प्रलोभन या दबाव में लेकर नरेश पांडे के संपर्क में लाती थी और उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित कराने में बिचौलिये की भूमिका निभाती थी। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई मामले में सामने आई एक अन्य महिला के बयानों और साक्ष्यों के आधार पर की गई है।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष और युवती के वकीलों ने इन आरोपों को पूरी तरह मनगढ़ंत और मुख्य आरोपी को बचाने या मामले को कमजोर करने की साजिश करार दिया है। उनका दावा है कि जो युवती इस पूरे गंदे खेल का पर्दाफाश करने वाली पहली शिकायतकर्ता है, उसे ही आरोपी बनाकर पुलिस असली दोषियों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। इन आरोपों की वास्तविक सच्चाई क्या है, यह तो अब विस्तृत न्यायिक प्रक्रिया और पुलिस की अंतिम चार्जशीट के बाद ही साफ हो पाएगा।
अग्रिम जमानत खारिज होने से लेकर गिरफ्तारी तक का सफर
उल्लेखनीय है कि इस मामले की शुरुआत तब हुई थी जब नैनीताल के एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाली एक छात्रा ने भवाली व्यापार मंडल अध्यक्ष नरेश पांडे के खिलाफ मल्लीताल कोतवाली में तहरीर दी थी। तहरीर में यौन शोषण, डरा-धमकाकर जबरन गर्भपात कराने और जान से मारने की धमकी देने जैसे रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोप लगाए गए थे। मामला दर्ज होते ही आरोपी नरेश पांडे फरार हो गया था।
गिरफ्तारी के डर से नरेश पांडे ने कानूनी ढाल तलाशने की कोशिश की। उसने पहले नैनीताल जिला न्यायालय और उसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए याचिकाएं दायर कीं। हालांकि, अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों ही उच्च अदालतों ने उसकी याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके बाद भी वह कुछ समय तक पुलिस को छकाती रहा। इसी बीच, एक और युवती ने सामने आकर नरेश पांडे पर इसी तरह के संगीन आरोप लगाते हुए दूसरी शिकायत दर्ज कराई। बढ़ते सामाजिक और कानूनी दबाव के बीच पुलिस ने आखिरकार नरेश पांडे को दबोच लिया, जिसे बाद में अदालत ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
कानूनी पचड़े में उलझा मामला
मुख्य आरोपी नरेश पांडे के सलाखों के पीछे पहुंचने और अब पहली शिकायतकर्ता युवती को ही पुलिस द्वारा सह-आरोपी बनाए जाने के बाद यह भवाली नरेश पांडे कांड पूरी तरह से एक पेचीदा कानूनी चक्रव्यूह में तब्दील हो चुका है। कोर्ट द्वारा पुलिस की रिमांड अर्जी को खारिज करना और युवती को तुरंत जमानत देना पुलिस की शुरुआती तफ्तीश और साक्ष्यों की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। देवभूमि के इस चर्चित मामले पर अब पूरे राज्य की निगाहें टिकी हैं कि आने वाले दिनों में निष्पक्ष जांच के जरिए न्याय किस करवट बैठता है।
