
देहरादून: शासन और प्रशासन जब केवल फाइलों के अंबार से बाहर निकलकर मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर काम करने लगे, तो दम तोड़ती उम्मीदों को भी नया जीवन मिल जाता है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। सूबे के मुख्यमंत्री के विजन और जिलाधिकारी सविन बंसल के कुशल नेतृत्व में देहरादून जिला प्रशासन मानवीय पहल के जरिए समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े असहाय, वंचित और संकटग्रस्त परिवारों के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव ला रहा है।
प्रशासनिक दायित्वों से आगे बढ़कर किए जा रहे इन कार्यों की ताजा मिसाल डोईवाला की रहने वाली कैंसर पीड़ित एकल (विधवा) महिला सुनीता कलवार के मामले में देखने को मिली है। गंभीर बीमारी और घोर आर्थिक तंगी के दोहरे थपेड़ों से टूट चुकीं सुनीता के लिए जिला प्रशासन न केवल एक मजबूत संबल बनकर उभरा है, बल्कि उनके बच्चों के अंधकारमय हो रहे भविष्य को भी शिक्षा की रोशनी से जगमगा दिया है।
जब आंसुओं के साथ सुनीता ने बयां की अपनी बेबसी
डोईवाला की निवासी सुनीता कलवार पिछले कुछ समय से जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। एक तरफ जहां उनके सिर से पति का साया उठ चुका है, वहीं दूसरी तरफ वह कैंसर जैसी जानलेवा और अत्यधिक खर्चीली बीमारी से जंग लड़ रही हैं। सुनीता का 11 जुलाई 2024 को जौलीग्रांट स्थित हिमालयन अस्पताल में कैंसर का एक बड़ा ऑपरेशन हुआ था और वर्तमान में भी उनका कीमोथेरेपी व अन्य उपचार निरंतर जारी है।
दवाइयों के भारी खर्च और घर में कोई कमाऊ सदस्य न होने के कारण सुनीता के सामने दो वक्त की रोटी के साथ-साथ अपने दोनों मासूम बच्चों की पढ़ाई जारी रखना पूरी तरह असंभव हो गया था। हताशा के बीच, सुनीता ने हिम्मत जुटाकर जिलाधिकारी सविन बंसल के समक्ष उपस्थित होकर अपनी व्यथा साझा की। उन्होंने रुंधे गले से जिलाधिकारी को बताया कि वह अपने इलाज के खर्च के कारण बच्चों की स्कूल की फीस भरने में असमर्थ हैं और उनके बच्चों की पढ़ाई छूटने के कगार पर है।
त्वरित एक्शन: रायफल क्लब फंड से आर्थिक मदद और स्कूल में दाखिला
सुनीता की इस मार्मिक दास्तान को जिलाधिकारी सविन बंसल ने न केवल बेहद गंभीरता से सुना, बल्कि उनकी आंखों के आंसुओं को पोंछने के लिए तत्काल प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय किया। देहरादून जिला प्रशासन मानवीय पहल के तहत त्वरित निर्णय लेते हुए जिलाधिकारी ने रायफल क्लब फंड से सुनीता कलवार के लिए तत्काल ₹50,000 (पचास हजार रुपये) की आर्थिक सहायता राशि स्वीकृत की और उसे तत्काल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
प्रशासन की राहत यहीं नहीं रुकी। सुनीता की सबसे बड़ी चिंता उनके बच्चों का भविष्य था। इसे देखते हुए जिला प्रशासन ने तत्काल हस्तक्षेप कर उनके पुत्र का एक प्रतिष्ठित विद्यालय में दाखिला (एडमिशन) सुनिश्चित कराया, ताकि उसकी पढ़ाई बिना किसी बाधा के जारी रह सके।
‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ ने बेटी के सपनों को दिए नए पंख
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील और सराहनीय पहलू सुनीता की बेटी की शिक्षा को लेकर रहा। आर्थिक तंगी के कारण बेटी की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो चुकी थी। जिला प्रशासन ने इस मेधावी बेटी को मुख्यधारा में वापस लाने के लिए देहरादून प्रशासन की अपनी महत्वाकांक्षी और अनूठी पहल ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ का सहारा लिया।
“प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा का उद्देश्य ही यही है कि जिले की कोई भी असहाय, अनाथ या जरूरतमंद बालिका संसाधनों के अभाव में शिक्षा से वंचित न रहे। सुनीता की बेटी की बाधित हो चुकी शिक्षा को इस प्रोजेक्ट के तहत न केवल पुनर्जीवित किया गया है, बल्कि उसकी आगे की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी भी तय की गई है।”
— सविन बंसल, जिलाधिकारी, देहरादून
सैकड़ों मामलों का मानवीय निस्तारण: बदल रही है असहायों की तस्वीर
सुनीता कलवार का मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। पिछले कुछ समय में देहरादून जिला प्रशासन ने अपनी कार्यशैली से यह साबित किया है कि वह जनता के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। उपचार, शिक्षा, रोजगार से लेकर कर्ज के जाल में फंसे लोगों को राहत देने तक, सैकड़ों ऐसे जटिल प्रकरणों का पूरी तरह मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए प्रभावी निस्तारण किया गया है।
| जिला प्रशासन की प्रमुख राहत श्रेणियां | लाभार्थियों का स्वरूप | दी जाने वाली सहायता / समाधान |
| चिकित्सा सहायता | गंभीर बीमारी (कैंसर, किडनी आदि) से पीड़ित | रायफल क्लब फंड व सरकारी योजनाओं से त्वरित वित्तीय सहायता |
| बालिका शिक्षा | आर्थिक रूप से कमजोर व एकल माताओं की बेटियां | ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ के तहत मुफ्त शिक्षा और पाठ्य सामग्री |
| ऋण एवं वित्तीय राहत | बैंक कर्ज या बकाया से परेशान गरीब परिवार | बकाया जल-विद्युत बिलों का निपटारा और बैंक ऋणों में नियमानुसार राहत |
| आजीविका सहायता | बेरोजगार एवं असहाय महिलाएं | स्वरोजगार के साधन और सरकारी योजनाओं से जुड़ाव |
सुशासन और संवेदनशीलता का अनूठा मॉडल
अमूमन सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों की छवि कड़े नियमों और औपचारिकता में बंधी होती है, लेकिन देहरादून का यह मॉडल देश के अन्य जिलों के लिए भी एक नजीर पेश कर रहा है। विगत वर्षों में भी जिला प्रशासन द्वारा अनेक जरूरतमंद परिवारों को लाखों रुपये की आर्थिक सहायता सीधे तौर पर उपलब्ध कराई जा चुकी है।
विद्युत एवं जल संबंधी पुराने बकाया प्रकरणों के कारण जिन गरीब परिवारों के कनेक्शन कटने की नौबत थी, उन्हें वन-टाइम सेटलमेंट और राहत कोषों के माध्यम से मदद पहुंचाई गई है। इसके अलावा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाओं को सुगम बनाकर बुजुर्गों और विधवा महिलाओं को उनका हक सीधे उनके खातों तक पहुंचाया जा रहा है।
सुनीता कलवार और उनके जैसे सैकड़ों परिवारों को मिला यह सहारा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि प्रशासनिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो, तो सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर सीधे जनता के दिलों में उतर जाती हैं। सुनीता ने प्रशासन के इस कदम पर आभार जताते हुए कहा कि आज उन्हें महसूस हो रहा है कि इस दुनिया में उनका भी कोई रखवाला है।



