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मिडिल ईस्ट में फिर से महायुद्ध की आहट: होर्मुज में अमेरिकी सेना ने ईरानी टैंकरों को किया निष्क्रिय, यूएई पर भी बरसाईं मिसाइलें

दुबई/वॉशिंगटन: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा नजर आ रहा है। सामरिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में अमेरिकी सेना और ईरानी बलों के बीच हुए भीषण सैन्य टकराव ने दुनिया भर की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी नौसेना ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के दो तेल टैंकरों को निशाना बनाकर उन्हें निष्क्रिय कर दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब मिडिल ईस्ट तनाव 2026 अपने चरम पर पहुंच गया है और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।

होर्मुज में आधी रात को चलीं गोलियां

एपी (AP) की रिपोर्ट के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रात भर दोनों पक्षों के बीच भारी गोलीबारी हुई। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने पुष्टि की है कि ये टैंकर उस ‘ब्लॉकेड’ (नाकाबंदी) को तोड़ने का प्रयास कर रहे थे, जिसे अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर लगाया है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, ईरानी जहाज बार-बार चेतावनी के बावजूद प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे। स्थिति तब और बिगड़ गई जब ईरानी सेना ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी नौसेना के तीन जहाजों पर हमला करने की कोशिश की, जिसे अमेरिकी रक्षा प्रणाली ने विफल कर दिया। इसके बाद जवाबी कार्रवाई में होर्मुज में स्थित ईरानी सैन्य ठिकानों पर भी स्ट्राइक की गई।

UAE पर हवाई हमले: नया मोर्च खुला

इस संघर्ष की आंच अब पड़ोसी देशों तक भी पहुंच गई है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि उसके भूभाग को निशाना बनाकर ईरानी मिसाइलें और ड्रोन दागे गए हैं। हालांकि, यूएई की एयर डिफेंस प्रणाली ने अधिकांश खतरों को हवा में ही नष्ट करने का दावा किया है, लेकिन इस हमले ने खाड़ी देशों के बीच एक बड़े युद्ध की आशंका पैदा कर दी है। राजनयिकों का मानना है कि ईरान अब अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों पर दबाव बनाकर नाकाबंदी हटवाने की रणनीति अपना रहा है।

क्यों बंद है दुनिया का सबसे अहम जलमार्ग?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की कुल तेल आपूर्ति के लगभग पांचवें हिस्से का मार्ग है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल द्वारा सैन्य अभियान शुरू किए जाने के बाद से ईरान ने इस जलमार्ग को बंद कर रखा है। अप्रैल में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता के विफल होने के बाद तनाव और गहरा गया। जवाब में अमेरिका ने ईरानी तेल निर्यात को पूरी तरह ठप करने के लिए ‘नेवल ब्लॉकेड’ लगा दिया। इस गतिरोध के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता देखी जा रही है, जिसका सीधा असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।

विदेश मंत्रियों के बीच तीखी बयानबाजी

इस सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है।

  • मार्को रूबियो (अमेरिकी विदेश मंत्री): “ईरान को यह समझना होगा कि अमेरिकी हितों और हमारे सहयोगियों को दी जाने वाली किसी भी चुनौती का जवाब इसी कठोरता के साथ दिया जाएगा। हम अपनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

  • अब्बास अराघची (ईरानी विदेश मंत्री): “ईरानी जहाजों पर हमला न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि यह संघर्षविराम की शर्तों को भी तोड़ता है। अमेरिका की यह उकसाने वाली कार्रवाई एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को जन्म देगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी वॉशिंगटन की होगी।”

पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें

क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने शांति की अपील की है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान, दोनों देशों के नेतृत्व के साथ निरंतर संपर्क में है। इस्लामाबाद की कोशिश है कि किसी तरह सीज़फ़ायर की अवधि को बढ़ाया जाए और एक नया शांति समझौता तैयार किया जाए। हालांकि, ईरान ने अमेरिका द्वारा दिए गए हालिया प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, क्योंकि इसमें उसके परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज में सैन्य आवाजाही पर कड़ी शर्तें लगाई गई हैं।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ‘ब्लैकआउट’ का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट तनाव 2026 इसी तरह बढ़ता रहा, तो दुनिया को ‘एनर्जी ब्लैकआउट’ का सामना करना पड़ सकता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का लंबे समय तक बंद रहना न केवल ईंधन की कीमतों को $150 प्रति बैरल के पार ले जा सकता है, बल्कि इससे वैश्विक सप्लाई चेन भी पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आगामी आपातकालीन बैठक पर टिकी हैं, जहां इस मुद्दे पर चर्चा होने की संभावना है।

होर्मुज के पानी में ईरान और अमेरिका की यह रस्साकशी अब केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि एक वैश्विक संकट बन चुकी है। आने वाले कुछ घंटे यह तय करेंगे कि दुनिया एक और विनाशकारी युद्ध की ओर बढ़ेगी या कूटनीति के जरिए शांति का कोई रास्ता निकलेगा।

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