देहरादून: उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था के लोकतंत्रीकरण और आधुनिकीकरण की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है। मदरसा बोर्ड को भंग किए जाने के बाद अब राज्य सरकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मुख्यधारा की शैक्षणिक व्यवस्था से जोड़ने के लिए अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण उत्तराखंड के गठन को अंतिम रूप दे रही है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य न केवल पारदर्शिता लाना है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को आधुनिक और क्षेत्रीय ज्ञान से लैस करना भी है।
अनियमितताओं पर लगाम और पारदर्शिता की चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों से मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों में अनियमितताओं की खबरें लगातार सुर्खियां बनी थीं। कहीं बिना किसी मानक के संस्थान संचालित हो रहे थे, तो कहीं कागजों पर छात्रों की संख्या बढ़ाकर सरकारी अनुदान का दुरुपयोग किया जा रहा था। इन शिकायतों और जांच रिपोर्टों के आधार पर सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। शासन का स्पष्ट मानना है कि जब तक एक केंद्रीकृत निगरानी तंत्र नहीं होगा, तब तक सरकारी सहायता का सही लाभ पात्र छात्रों तक नहीं पहुंच पाएगा। इसी शून्य को भरने के लिए अब नई व्यवस्था के तहत जवाबदेही तय की जा रही है।
मिशन मोड में विभाग: मई में ड्राफ्ट, जून में रजिस्ट्रेशन
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के पास समय की कमी है, लेकिन तैयारियों की गति काफी तेज है। विभाग का लक्ष्य आगामी जुलाई सत्र से पूरी तरह से नई व्यवस्था को लागू करना है। इस महत्वपूर्ण बदलाव का नेतृत्व कर रहे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते के अनुसार, विभाग फिलहाल दो मुख्य मोर्चों पर काम कर रहा है।
प्रथम चरण में, धार्मिक शिक्षा के लिए एक नया और संतुलित सिलेबस तैयार किया जा रहा है। दूसरे चरण में, प्राधिकरण के कानूनी स्वरूप, इसके अधिकार क्षेत्र और संस्थानों के अनिवार्य पंजीकरण की नियमावली को अंतिम रूप दिया जा रहा है। विभाग की योजना है कि मई के अंत तक सभी कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं, ताकि जून के प्रथम सप्ताह से प्रदेशभर के मदरसों का नए नियमों के तहत पंजीकरण (Registration) शुरू किया जा सके।
सिलेबस में दिखेगी ‘देवभूमि’ की झलक
नई व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता इसका पाठ्यक्रम है। अब तक मदरसों में मुख्य रूप से पारंपरिक धार्मिक शिक्षा पर ही जोर दिया जाता था। लेकिन अब, प्रस्तावित पाठ्यक्रम में धार्मिक विषयों के साथ-साथ उत्तराखंड का इतिहास, यहां की समृद्ध संस्कृति और विरासत को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि इससे अल्पसंख्यक छात्र अपनी धार्मिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ उस माटी के इतिहास को भी जान सकेंगे, जहां वे रहते हैं। इसके अलावा, विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे आधुनिक विषयों को भी इस ढांचे में प्रमुखता दी जाएगी। यह कदम छात्रों को भविष्य की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और रोजगार के अवसरों के लिए तैयार करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
प्राधिकरण के गठन से बदलेंगे नियम
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के बाद संस्थानों के संचालन का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा। प्राधिकरण के पास निम्नलिखित शक्तियां और जिम्मेदारियां होंगी:
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शिक्षकों की नियुक्ति: शिक्षकों की योग्यता के लिए अब मानक तय होंगे।
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छात्र सत्यापन: आधार कार्ड और डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए छात्रों की संख्या का भौतिक सत्यापन किया जाएगा।
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आर्थिक ऑडिट: संस्थानों को मिलने वाले सरकारी और निजी चंदे का हिसाब-किताब पारदर्शी रखना होगा।
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बुनियादी ढांचा: संस्थान चलाने के लिए आवश्यक भवन, खेल के मैदान और सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य होगा।
प्रशासनिक चुनौतियां और सामाजिक संवाद
यद्यपि सरकार के इरादे स्पष्ट हैं, लेकिन धरातल पर चुनौतियां कम नहीं हैं। उत्तराखंड के कई मदरसे दशकों से अपने पारंपरिक ढर्रे पर चल रहे हैं। ऐसे में उन्हें अचानक नए नियमों और डिजिटल पंजीकरण की प्रक्रिया में ढालना एक जटिल कार्य है। कुछ संगठनों और धार्मिक संस्थाओं की ओर से नई व्यवस्था पर आपत्तियां भी दर्ज कराई गई हैं।
इन चिंताओं को दूर करने के लिए अल्पसंख्यक कल्याण विभाग लगातार विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद कर रहा है। विभाग का प्रयास है कि नियमों को इतना व्यवहारिक बनाया जाए कि छोटे संस्थानों को भी पंजीकरण में कठिनाई न हो, लेकिन गुणवत्ता और पारदर्शिता से कोई समझौता न किया जाए।
भविष्य की ओर एक बड़ा कदम
उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की यह नई दिशा दूरगामी परिणाम लेकर आ सकती है। यदि सरकार जून-जुलाई की अपनी समयसीमा के भीतर इस व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू कर देती है, तो यह न केवल उत्तराखंड के लिए बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है। अब सभी की नजरें जून में शुरू होने वाली पंजीकरण प्रक्रिया पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि प्रदेश के अल्पसंख्यक संस्थान इस बदलाव को कितनी सहजता से स्वीकार करते हैं।
सरकार का अटूट संकल्प है कि ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के मंत्र को शिक्षा के क्षेत्र में भी चरितार्थ किया जाए, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय का हर छात्र आधुनिक भारत की प्रगति में समान रूप से भागीदार बन सके।



