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उत्तराखंड: सचिवालय कर्मियों को कर्मयोगी बनने में क्यों नहीं दिलचस्पी? पीएम मोदी के मिशन पर उठ रहे सवाल

पीएम मोदी  की महत्वाकांक्षी योजना ‘मिशन कर्मयोगी’ का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को आधुनिक प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है। केंद्र सरकार चाहती है कि सरकारी तंत्र केवल पारंपरिक फाइलों और पुराने कार्यशैली तक सीमित न रहे, बल्कि डिजिटल गवर्नेंस, तकनीकी दक्षता और परिणाम आधारित कार्य संस्कृति को अपनाए। इसी सोच के साथ देशभर में iGOT यानी इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग पोर्टल की शुरुआत की गई, ताकि सरकारी कर्मचारी ऑनलाइन माध्यम से नई तकनीकों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और आधुनिक कार्य प्रणाली का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।

लेकिन उत्तराखंड सचिवालय की वर्तमान स्थिति इस मिशन की रफ्तार पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बड़ी संख्या में अधिकारी और कर्मचारी मिशन कर्मयोगी से दूरी बनाए हुए हैं। शासन स्तर पर स्पष्ट निर्देश जारी होने के बावजूद सचिवालय सेवा के अधिकांश कर्मचारी और अधिकारी अब तक अनिवार्य प्रशिक्षण पूरा नहीं कर पाए हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, तो कर्मचारी इस पहल को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहे?

मिशन कर्मयोगी का उद्देश्य क्या है?

केंद्र सरकार ने मिशन कर्मयोगी की शुरुआत सरकारी कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से की थी। बदलते दौर में प्रशासनिक व्यवस्था तेजी से डिजिटल हो रही है। ई-ऑफिस सिस्टम, ऑनलाइन फाइल निस्तारण, डेटा मैनेजमेंट और स्मार्ट गवर्नेंस जैसी व्यवस्थाएं अब सरकारी कामकाज का हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में कर्मचारियों को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

इसी उद्देश्य से iGOT पोर्टल पर सैकड़ों ऑनलाइन कोर्स उपलब्ध कराए गए हैं। इन कोर्सों के जरिए कर्मचारियों को नई तकनीकों, प्रशासनिक सुधारों, डिजिटल प्रक्रियाओं और बेहतर कार्यशैली का प्रशिक्षण दिया जाता है। उत्तराखंड सरकार ने भी इस योजना को लागू करते हुए सचिवालय स्तर पर सभी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए कम से कम एक कोर्स करना अनिवार्य किया था।

इसके लिए शासन की ओर से बाकायदा आदेश जारी किए गए। कर्मचारियों को अपनी e-Office आईडी के जरिए पोर्टल पर लॉगिन करने, प्रोफाइल अपडेट करने और किसी एक कोर्स में नामांकन करने के निर्देश दिए गए। इतना ही नहीं, कोर्स पूरा करने के बाद मूल्यांकन परीक्षा पास करने पर प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था भी की गई। तकनीकी सहायता के लिए सचिवालय प्रशासन और e-Office टीम को जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी।

आदेश जारी हुए, लेकिन प्रगति बेहद धीमी

करीब 2 अप्रैल को सचिवालय स्तर पर मिशन कर्मयोगी को लेकर आदेश जारी किए गए थे। सरकार को उम्मीद थी कि कर्मचारी और अधिकारी इस पहल को उत्साह के साथ अपनाएंगे, लेकिन वास्तविक स्थिति इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है।

जानकारी के मुताबिक सचिवालय सेवा में लगभग 1000 से अधिक अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं, लेकिन इनमें से केवल करीब 231 अधिकारी-कर्मचारी ही अब तक कम से कम एक कोर्स पूरा कर पाए हैं। यानी बड़ी संख्या में कर्मचारी अभी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम से दूर हैं।

स्थिति इतनी चिंताजनक हो गई कि सचिवालय प्रशासन को दोबारा पत्र जारी करना पड़ा। इस पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया कि मिशन कर्मयोगी के तहत अपेक्षित प्रगति नहीं हो पा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि शासन स्तर पर भी माना जा रहा है कि अधिकारी और कर्मचारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।

सवालों के घेरे में कर्मचारी और अधिकारी

सरकार की मंशा साफ है कि प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक बनाया जाए और कर्मचारियों को नई तकनीकों से जोड़ा जाए। इसके बावजूद कर्मचारियों की उदासीनता कई सवाल खड़े कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कर्मचारी और अधिकारी मिशन कर्मयोगी से दूरी क्यों बना रहे हैं? क्या उन्हें इस प्रशिक्षण की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही? या फिर सरकारी कार्यशैली में अभी भी बदलाव को लेकर मानसिक तैयारी नहीं बन पाई है?

दिलचस्प बात यह है कि कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने मिशन कर्मयोगी के तहत कोर्स पूरे किए हैं। इनमें Anand Swaroop, Ranjeet Sinha, C Ravishankar, Vinod Kumar Suman, Sachin Kurve और Umesh Narayan Pandey जैसे अधिकारियों के नाम शामिल हैं।

इन वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कोर्स पूरा करना यह दिखाता है कि यदि इच्छा हो तो व्यस्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच भी प्रशिक्षण के लिए समय निकाला जा सकता है। ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब शीर्ष अधिकारी इस पहल का हिस्सा बन सकते हैं तो बड़ी संख्या में कर्मचारी और अन्य अधिकारी इससे दूरी क्यों बनाए हुए हैं?

डिजिटल दौर में स्किल डेवलपमेंट क्यों जरूरी?

आज सरकारी कामकाज तेजी से डिजिटल हो रहा है। फाइलों का संचालन अब ई-ऑफिस सिस्टम के जरिए किया जा रहा है। डेटा आधारित निर्णय, ऑनलाइन मॉनिटरिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें धीरे-धीरे प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा बन रही हैं।

ऐसे में यदि सरकारी कर्मचारी खुद को समय के साथ अपडेट नहीं करेंगे तो प्रशासनिक व्यवस्था की गति प्रभावित हो सकती है। मिशन कर्मयोगी का मूल उद्देश्य भी यही है कि कर्मचारी केवल पारंपरिक तरीके से काम करने तक सीमित न रहें, बल्कि तकनीकी रूप से दक्ष बनें और परिणाम आधारित कार्य संस्कृति विकसित करें।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सरकारी कामकाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और स्मार्ट गवर्नेंस की भूमिका और बढ़ेगी। इसलिए कर्मचारियों के लिए स्किल डेवलपमेंट अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

क्या केवल आदेश से बदलेगी कार्यसंस्कृति?

सरकारी विभागों में अक्सर यह देखा जाता है कि किसी नई व्यवस्था को लागू करने के लिए आदेश तो जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन कर्मचारियों के बीच उसके प्रति जागरूकता और रुचि पैदा करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। संभव है कि मिशन कर्मयोगी के मामले में भी यही स्थिति सामने आ रही हो।

कई कर्मचारियों का मानना है कि उन पर पहले से ही काम का दबाव अधिक है। ऐसे में अतिरिक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। वहीं कुछ कर्मचारी तकनीकी प्रक्रियाओं से सहज नहीं हैं, जिसके कारण वे ऑनलाइन प्रशिक्षण से दूरी बना रहे हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशिक्षण को केवल औपचारिकता के रूप में देखा जाएगा तो इसका उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा। कर्मचारियों को यह समझना होगा कि डिजिटल प्रशासन भविष्य की आवश्यकता है और समय के साथ खुद को बदलना ही होगा।

सरकार के सामने चुनौती

उत्तराखंड सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब मिशन कर्मयोगी को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करना है। केवल आदेश जारी करने से लक्ष्य हासिल नहीं होगा। इसके लिए कर्मचारियों को प्रेरित करना, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना और प्रशिक्षण को कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाना जरूरी होगा।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कर्मचारी इस कार्यक्रम को बोझ न समझें, बल्कि इसे अपने करियर और कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो मिशन कर्मयोगी केवल सरकारी फाइलों और आदेशों तक सीमित होकर रह जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि विभागीय स्तर पर नियमित मॉनिटरिंग, प्रोत्साहन और जवाबदेही तय किए बिना इस तरह की योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पातीं। इसलिए सचिवालय प्रशासन को अब अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

आने वाले समय में क्या होगा?

फिलहाल उत्तराखंड सचिवालय में मिशन कर्मयोगी की प्रगति बेहद धीमी नजर आ रही है। एक महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी जिस स्तर की भागीदारी की उम्मीद थी, वह दिखाई नहीं दे रही।

अब देखने वाली बात यह होगी कि सचिवालय प्रशासन इस अभियान को गति देने के लिए आगे क्या कदम उठाता है। क्या कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए सख्ती बढ़ाई जाएगी? क्या प्रशिक्षण को प्रदर्शन मूल्यांकन से जोड़ा जाएगा? या फिर जागरूकता और प्रोत्साहन के जरिए भागीदारी बढ़ाने की कोशिश होगी?

इतना जरूर है कि आने वाला दौर पूरी तरह डिजिटल प्रशासन का होने वाला है। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों के लिए तकनीकी रूप से दक्ष बनना अब मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। मिशन कर्मयोगी केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रशासनिक बदलाव की बड़ी पहल है। यदि कर्मचारी और अधिकारी इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं तो सरकार की आधुनिक और तेज प्रशासनिक व्यवस्था का सपना अधूरा रह सकता है।

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