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हंता वायरस क्या है? जानिए ‘हंता’ नाम का मतलब, कैसे फैलता है यह खतरनाक वायरस और क्यों दुनिया में मचा है अलर्ट

कोरोना वायरस के बाद अब एक और वायरस ने दुनियाभर के देशों की चिंता बढ़ा दी है. इस वायरस का नाम है Hantavirus यानी हंता वायरस. हाल ही में एक समुद्री जहाज में इसके संक्रमण के मामले सामने आने के बाद कई देशों में अलर्ट जारी कर दिया गया है. जहाज में मौजूद कुछ लोगों की मौत की खबरों ने भी लोगों के बीच डर पैदा कर दिया है. सोशल मीडिया से लेकर गूगल तक लोग यह जानना चाह रहे हैं कि आखिर “हंता” का मतलब क्या होता है, इस वायरस का नाम कैसे पड़ा और यह कितना खतरनाक है.

दरअसल, हंता वायरस का नाम दक्षिण कोरिया की प्रसिद्ध Hantan River यानी हंतान नदी के नाम पर रखा गया है. वैज्ञानिकों ने सबसे पहले इस वायरस की पहचान इसी इलाके के आसपास पाए जाने वाले जंगली चूहों में की थी. साल 1978 में रिसर्च के दौरान पता चला कि कुछ खास तरह के धारीदार चूहे इस वायरस को फैलाते हैं. इसी वजह से इस वायरस को “हंतान वायरस” कहा गया, जो बाद में हंता वायरस नाम से मशहूर हो गया.

इस वायरस का इतिहास कोरियाई युद्ध से भी जुड़ा हुआ माना जाता है. साल 1951 से 1953 के बीच हुए कोरियाई युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र के हजारों सैनिक अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे. सैनिकों में तेज बुखार, सांस लेने में दिक्कत और किडनी फेल होने जैसे लक्षण दिखाई दिए थे. उस समय वैज्ञानिकों को बीमारी की वजह समझ नहीं आ रही थी. कई सालों की रिसर्च के बाद पता चला कि इसके पीछे एक खतरनाक वायरस है, जिसे बाद में हंता वायरस का नाम दिया गया.

विशेषज्ञों के मुताबिक हंता वायरस कोई एक वायरस नहीं है, बल्कि यह वायरसों की पूरी फैमिली है. अलग-अलग देशों में इसके अलग प्रकार पाए जाते हैं. उत्तरी अमेरिका में पाया जाने वाला “सिन नोम्ब्रे वायरस” भी इसी परिवार का हिस्सा माना जाता है. यह वायरस मुख्य रूप से चूहों और दूसरे कुतरने वाले जीवों के जरिए फैलता है. संक्रमित जानवरों के मल, मूत्र और लार के संपर्क में आने से इंसान इसकी चपेट में आ सकता है.

सबसे ज्यादा खतरा उन जगहों पर होता है जहां चूहों की संख्या अधिक होती है या साफ-सफाई की कमी होती है. यदि किसी बंद जगह में संक्रमित चूहों का मल या पेशाब सूख जाए और उसके कण हवा में मिल जाएं, तो सांस के जरिए भी इंसान संक्रमित हो सकता है. यही वजह है कि विशेषज्ञ लोगों को पुराने गोदामों, बंद कमरों और जहाजों जैसी जगहों पर विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.

हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि हंता वायरस कोरोना वायरस की तरह तेजी से हवा में फैलने वाला संक्रमण नहीं है. इसके फैलने के लिए संक्रमित व्यक्ति या संक्रमित वातावरण के लंबे समय तक संपर्क में रहना पड़ता है. फिर भी यह वायरस बेहद खतरनाक माना जाता है क्योंकि इसकी मृत्यु दर काफी ज्यादा हो सकती है. साल 2018 में Argentina में एक संक्रमित व्यक्ति से 34 लोगों में वायरस फैलने की पुष्टि हुई थी, जिनमें 11 लोगों की मौत हो गई थी.

हंता वायरस का असर सबसे ज्यादा फेफड़ों और किडनी पर पड़ता है. संक्रमण होने के बाद मरीज को तेज बुखार, सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द और कंपकंपी महसूस हो सकती है. धीरे-धीरे मरीज को सांस लेने में परेशानी होने लगती है और फेफड़ों में गंभीर संक्रमण हो सकता है. कई मामलों में किडनी फेल होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसके अलावा शरीर के अंदर ब्लीडिंग यानी इंटरनल ब्लीडिंग की समस्या भी देखी गई है.

डॉक्टरों के अनुसार इस वायरस का अभी तक कोई खास इलाज या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. इसलिए बचाव ही सबसे बड़ा उपाय माना जाता है. लोगों को चूहों से दूरी बनाए रखने, घर और आसपास साफ-सफाई रखने और संक्रमित जगहों पर मास्क पहनकर जाने की सलाह दी जाती है. यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार और सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.

दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ फिलहाल इस वायरस पर नजर बनाए हुए हैं. हालांकि अभी इसे कोरोना जैसी वैश्विक महामारी मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सतर्कता बेहद जरूरी है. हंता वायरस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि इंसानों और जंगली जीवों के बीच बढ़ता संपर्क नई बीमारियों का बड़ा कारण बन सकता है.

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