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बंगाल में बीजेपी की जीत से बांग्लादेश में बढ़ी उम्मीदें, तीस्ता समझौते पर फिर तेज हुई चर्चा

The Hill India News
Last updated: May 6, 2026 4:45 am
The Hill India News
Published: May 6, 2026
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए बड़े बदलाव का असर अब भारत की सीमाओं से बाहर भी दिखाई देने लगा है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद बांग्लादेश की राजनीति और कूटनीतिक हलकों में नई हलचल शुरू हो गई है। खासतौर पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने इस राजनीतिक परिवर्तन का स्वागत करते हुए उम्मीद जताई है कि भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से लंबित तीस्ता जल बंटवारा समझौता अब आगे बढ़ सकता है। BNP नेताओं का मानना है कि पहले पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार के बीच तालमेल की कमी के कारण यह समझौता अटका हुआ था, लेकिन अब परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं।

बांग्लादेश में इस घटनाक्रम को सिर्फ एक राज्य के चुनावी परिणाम के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे दक्षिण एशियाई राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ढाका के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनता है, तो तीस्ता समझौते समेत कई लंबित द्विपक्षीय मुद्दों पर तेजी से प्रगति हो सकती है।

BNP के सूचना सचिव अज़ीजुल बारी हेलाल ने बयान देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन दोनों देशों के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि पूर्व की सरकार ने कई बार तीस्ता समझौते को लेकर आपत्तियां उठाईं, जिसकी वजह से यह मामला आगे नहीं बढ़ पाया। अब नई सरकार और केंद्र के बीच बेहतर तालमेल बनने की संभावना है, जिससे इस महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति बनने का रास्ता खुल सकता है।

दरअसल, तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश के बीच सबसे संवेदनशील जल विवादों में से एक रही है। यह नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां के उत्तरी हिस्से की कृषि व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के पानी में अपने हिस्से की मांग करता रहा है। दोनों देशों के बीच इस पर कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है।

साल 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे को लेकर एक प्रस्तावित समझौता लगभग तैयार हो गया था। उस समय प्रस्ताव था कि नदी के पानी का 37.5 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेश को और 42.5 प्रतिशत हिस्सा भारत को दिया जाएगा। हालांकि, पश्चिम बंगाल सरकार की आपत्तियों के बाद यह समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के किसानों और स्थानीय जरूरतों का हवाला देते हुए इस समझौते का विरोध किया था।

अब पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद बांग्लादेश में उम्मीद जताई जा रही है कि नई सरकार केंद्र के साथ मिलकर इस मुद्दे का समाधान निकाल सकती है। ढाका में कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दिल्ली और कोलकाता के बीच सहयोग मजबूत होता है तो तीस्ता विवाद को सुलझाना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 साझा नदियां हैं। हालांकि अब तक दोनों देशों के बीच केवल गंगा और कुशियारा नदी को लेकर औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता समझौता लंबे समय से दोनों देशों के रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिना जाता रहा है। बांग्लादेश लगातार यह कहता रहा है कि इस समझौते के बिना सीमावर्ती इलाकों में कृषि और सिंचाई संबंधी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि तीस्ता मुद्दा सिर्फ जल बंटवारे का मामला नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक और राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद अहम है। भारत और बांग्लादेश के संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। व्यापार, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ा है। ऐसे में अगर तीस्ता समझौता सफल होता है तो यह दोनों देशों के रिश्तों में एक नया अध्याय जोड़ सकता है।

हालांकि, कई जानकार यह भी मानते हैं कि सिर्फ सरकार बदलने से समझौता तुरंत संभव नहीं हो जाएगा। पश्चिम बंगाल के उत्तरी जिलों में खेती और सिंचाई की जरूरतें भी एक बड़ा मुद्दा हैं। स्थानीय किसानों और जल विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य की जरूरतों को नजरअंदाज करके किसी भी समझौते को लागू करना आसान नहीं होगा। इसलिए केंद्र और राज्य सरकार को स्थानीय हितों, कृषि आवश्यकताओं और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनानी होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि नई परिस्थितियों में भारत और बांग्लादेश इस मुद्दे पर कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं। अगर केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच मजबूत तालमेल बनता है तो तीस्ता समझौता दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है। फिलहाल बांग्लादेश में इस बदलाव को उम्मीद और सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि भारत में भी इस मुद्दे को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं।

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