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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बनभूलपुरा हिंसा मामले में दो आरोपियों की डिफॉल्ट बेल रद्द, दो हफ्ते में सरेंडर के निर्देश

देहरादून: उत्तराखंड के बहुचर्चित हल्द्वानी बनभूलपुरा हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने नैनीताल हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें हिंसा के दो मुख्य आरोपियों को डिफॉल्ट बेल (Default Bail) दे दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत को खारिज करते हुए उन्हें दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने के सख्त निर्देश दिए हैं।

अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि नैनीताल हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान तथ्यों और कानून के दृष्टिकोण से गंभीर भूल की थी।


सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ का महत्वपूर्ण फैसला

यह पूरा मामला 4 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के समक्ष सुना गया, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे। पीठ ने उत्तराखंड सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर विस्तृत सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।

गौरतलब है कि 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान भीषण हिंसा भड़की थी। उपद्रवियों ने पुलिस पर जानलेवा हमला किया, जमकर पत्थरबाजी की और पेट्रोल बम फेंके। इसके साथ ही, पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया और महिला पुलिस कर्मियों को थाने में बंद कर उन्हें भी जलाने का प्रयास किया गया। इस घटना ने देश भर में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।


जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब की डिफॉल्ट बेल पर सवाल

हिंसा के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कई लोगों को नामजद किया था। इस मामले में जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को मुख्य आरोपी बनाया गया था। बाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने इन दोनों आरोपियों को डिफॉल्ट बेल दे दी थी, जिसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर की गई टिप्पणियां तथ्यात्मक रूप से गलत और निराधार थीं। अदालत ने कहा कि 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर पुलिस और जांच एजेंसी ने कुल 65 गवाहों के बयान दर्ज किए थे, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जांच पूरी तत्परता और गंभीरता से की जा रही थी।


आरोपियों ने गंवाया डिफॉल्ट बेल का अधिकार

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में एक और अहम कानूनी बिंदु पर जोर दिया। कोर्ट ने पाया कि आरोपियों ने जांच अवधि बढ़ाने के आदेश को समय रहते चुनौती नहीं दी। इसके अलावा, जमानत खारिज होने के फैसले के बाद भी उन्होंने तुरंत हाईकोर्ट का रुख नहीं किया।

आरोपियों ने लगभग दो महीने बाद अपील दायर की, तब तक जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी थी। अदालत ने माना कि इस देरी के कारण आरोपियों ने डिफॉल्ट बेल मांगने का अपना कानूनी अधिकार स्वतः ही खो दिया।


अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार:

  • आरोपियों को दो हफ्ते के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण (सरेंडर) करना होगा।

  • यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो ट्रायल कोर्ट को उनके खिलाफ सख्त कदम उठाने की छूट दी गई है।

  • हालांकि, आरोपियों के पास यह विकल्प खुला रहेगा कि वे नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए आवेदन कर सकें, जिस पर ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार निष्पक्ष विचार करेगा।


राज्य सरकार के लिए बड़ी कानूनी जीत

इस फैसले को उत्तराखंड सरकार और पुलिस विभाग के लिए एक बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है। सरकारी पक्ष का मानना है कि इस फैसले से पुलिस और जांच एजेंसियों का मनोबल बढ़ेगा, जो कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले असामाजिक तत्वों के खिलाफ निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम कर रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी भविष्य के ऐसे मामलों के लिए एक कड़ा संदेश है।

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