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हरिद्वार: पतंजलि विश्वविद्यालय में दो दिवसीय चिंतन शिविर का शुभारंभ, जनजातीय विकास और ‘विकसित भारत 2047’ पर मंथन

The Hill India News
Last updated: April 30, 2026 3:19 pm
The Hill India News
Published: April 30, 2026
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हरिद्वार, उत्तराखंड: उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित बहादराबाद के पतंजलि विश्वविद्यालय में जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से एक महत्वपूर्ण दो दिवसीय ‘चिंतन शिविर’ का आयोजन किया गया है। गुरुवार को इस शिविर का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसमें देश के आदिवासी और जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास, उनकी समस्याओं के समाधान और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन को लेकर गहन विचार-विमर्श किया गया।

Contents
चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य: संभाग, संवाद और समाधानसांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हुए विकास की ओर: स्वामी रामदेवपतंजलि परिवार की सहभागिताआदिवासी उत्थान और योजनाओं का क्रियान्वयन

इस आयोजन के पहले दिन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम, योगगुरु स्वामी रामदेव और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण सहित आदिवासी और जनजातीय समुदाय से जुड़े कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।


चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य: संभाग, संवाद और समाधान

इस दो दिवसीय चिंतन शिविर के दौरान ‘संभाग, संवाद और समाधान’ के मूल मंत्र को लेकर विस्तृत मंथन किया गया। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि इस प्रकार के चिंतन शिविरों का नेतृत्व और मार्गदर्शन स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। उन्होंने कहा:

“प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि आजादी के बाद से अब तक जो आदिवासी समुदाय विकास की मुख्यधारा से दूर रह गए हैं, उन तक योजनाओं का लाभ पहुंचे। इसके साथ ही दलित, शोषित और पिछड़े वर्ग का भी सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जाए ताकि समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को इन जनकल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिल सके।”

केंद्रीय मंत्री ने आगे बताया कि इस शिविर के माध्यम से उन कमियों और चुनौतियों की समीक्षा की जा रही है, जो आदिवासी समाज तक योजनाओं के पहुंचने में बाधक बनती हैं। इन कमियों को दूर करके आदिवासी समुदाय को देश की प्रगति का अहम भागीदार बनाया जाएगा, ताकि वे वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण में अपना पूर्ण योगदान दे सकें।


सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हुए विकास की ओर: स्वामी रामदेव

योगगुरु स्वामी रामदेव ने अपने संबोधन में कहा कि देश के आदिवासी, जनजाति और वनवासी समाज को उनकी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जोड़े रखना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विकास की अंधी दौड़ में हमें अपनी विरासत को नहीं भूलना चाहिए।

स्वामी रामदेव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन की सराहना करते हुए कहा कि देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सशक्त और सक्षम बनाना ही इस चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस मंथन के पश्चात अंतिम पंक्ति में बैठा व्यक्ति भी राष्ट्र निर्माण के शिखर पर खड़ा दिखाई देगा और अंत्योदय का सपना साकार होगा।


पतंजलि परिवार की सहभागिता

पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने कार्यक्रम की मेजबानी करते हुए कहा कि आदिवासी और जनजाति समाज के उत्थान के लिए पतंजलि योगपीठ को इस सेवा कार्य का अवसर मिला है, जो अत्यंत गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि पतंजलि विश्वविद्यालय इस दो दिवसीय आयोजन का केंद्र बना है और उन्हें पूर्ण विश्वास है कि यहां होने वाला मंथन देश के विकास को एक नई गति प्रदान करेगा।


आदिवासी उत्थान और योजनाओं का क्रियान्वयन

चिंतन शिविर के पहले दिन विभिन्न सत्रों में यह चर्चा की गई कि कैसे सरकारी योजनाओं को बिना किसी बाधा के आदिवासी क्षेत्रों के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए। शिविर के दौरान विभिन्न विशेषज्ञों और आदिवासी प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। अधिकारियों का मानना है कि इस दो दिवसीय चिंतन शिविर में निकलने वाले निष्कर्षों के आधार पर भविष्य की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

यह चिंतन शिविर इस बात का प्रतीक है कि सरकार आदिवासी समुदायों के विकास के प्रति कितनी गंभीर है। हरिद्वार में आयोजित इस शिविर के बाद देश भर के आदिवासी और जनजातीय इलाकों में नई नीतियों और योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आने की उम्मीद है, जो ‘विकसित भारत’ के निर्माण में एक मील का पत्थर साबित होगा।

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