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सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश: ‘पत्नी जीवन संगिनी है, घरेलू सहायिका नहीं’; घर के कामकाज में पतियों को भी निभानी होगी बराबर की जिम्मेदारी

नई दिल्ली: वैवाहिक संबंधों में पुरुष प्रधान मानसिकता और ‘घरेलू काम केवल महिलाओं का है’ वाली धारणा पर देश की शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रगतिशील टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पति को खाना पकाने, घर की साफ-सफाई करने और कपड़े धोने जैसे घरेलू कार्यों में अपनी पत्नी के साथ समान रूप से हाथ बंटाना चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि एक पुरुष ने किसी ‘घरेलू सहायिका’ (Domestic Help) से नहीं, बल्कि अपनी ‘जीवन संगिनी’ से विवाह किया है।

‘समय बदल चुका है, मानसिकता बदलें’

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ कर्नाटक हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान जब पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी खाना नहीं पकाती और अनुचित व्यवहार करती है, तो पीठ ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।

न्यायमूर्ति नाथ ने आधुनिक समाज के बदलते स्वरूप का हवाला देते हुए कहा, “आपको इन सभी चीजों में समान रूप से हाथ बंटाना होगा। चाहे वह खाना पकाना हो, घर की सफाई हो या कपड़े धोना। समय बदल चुका है और अब पुरानी धारणाएं काम नहीं करेंगी।”

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद कर्नाटक के एक दंपति से जुड़ा है, जिनका विवाह मई 2017 में हुआ था। वैवाहिक कलह के चलते दोनों साल 2019 से अलग रह रहे हैं।

  • निचली अदालत का फैसला: शुरुआत में अधीनस्थ अदालत ने पति द्वारा लगाए गए ‘क्रूरता’ के आरोपों को स्वीकार करते हुए तलाक को मंजूरी दे दी थी।

  • हाई कोर्ट का रुख: बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और तलाक की डिक्री रद्द कर दी। इसी आदेश को पति ने अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुनवाई के दौरान पति के वकील ने दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता (Mediation) की कोशिशें भी विफल रही हैं और अब साथ रहना संभव नहीं है।

सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं दोनों पक्ष

मामले में एक दिलचस्प पहलू यह सामने आया कि पति और पत्नी दोनों ही एक ही सरकारी स्कूल में कार्यरत हैं। इस तथ्य पर गौर करते हुए न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने टिप्पणी की, “जब दोनों काम कर रहे हैं, तो घर की जिम्मेदारी केवल एक पर कैसे हो सकती है? आपने किसी घरेलू सहायिका से शादी नहीं की है। वह आपकी जीवन संगिनी है।”

अदालत की इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञ पितृसत्तात्मक सोच पर एक कड़ा प्रहार मान रहे हैं, जहाँ अक्सर कामकाजी महिलाओं से भी घर के सारे काम अकेले करने की अपेक्षा की जाती है।

क्रूरता की परिभाषा पर सवाल

अदालत ने पति के पक्ष से पूछा कि आखिर उनके मामले में ‘क्रूरता’ (Cruelty) का आधार क्या है? जब वकील ने ‘खाना न पकाने’ को आधार बनाया, तो पीठ ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की घरेलू कामकाज पर टिप्पणी यह स्पष्ट करती है कि घर के काम न करना या खाना न बनाना अब तलाक के लिए ‘क्रूरता’ का वैध आधार नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब पति स्वयं उन कार्यों में सहयोग न कर रहा हो।

अदालत ने दंपति को किया तलब

कानूनी दलीलों और मध्यस्थता की विफलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अब स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया है। पीठ ने कहा, “हम दोनों पक्षों से सीधे बात करना चाहते हैं।” अदालत ने निर्देश दिया है कि पति और पत्नी दोनों को अगली सुनवाई के दिन व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना होगा।

मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 के लिए निर्धारित की गई है। शीर्ष अदालत यह समझने का प्रयास करेगी कि क्या इस वैवाहिक संबंध को बचाने की कोई गुंजाइश शेष है या नहीं।

सामाजिक प्रभाव और ऐतिहासिक संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों परिवारों के लिए एक सामाजिक संदेश है। भारत में अक्सर ‘अनपेड लेबर’ (अवैतनिक श्रम) का बोझ महिलाओं पर ही होता है।

  • समानता का अधिकार: यह टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) को घर की चारदीवारी के भीतर लागू करने की दिशा में एक कदम है।

  • मानसिकता में बदलाव: शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि वैवाहिक जीवन एक ‘साझेदारी’ है, न कि ‘मालिक और नौकर’ का संबंध।

सुप्रीम कोर्ट की घरेलू कामकाज पर टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है। यह फैसला उन पुरुषों के लिए एक सबक है जो घर के कामों को केवल महिलाओं की जिम्मेदारी समझते हैं। 27 अप्रैल को होने वाली सुनवाई न केवल इस दंपति का भविष्य तय करेगी, बल्कि वैवाहिक क्रूरता और घरेलू जिम्मेदारियों के कानूनी मानकों को भी नई परिभाषा दे सकती है।

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