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The Hill India > Blog > उत्तर प्रदेश > UP: “नेहरू जीवित होते तो कांशीराम होते कांग्रेस के CM”, लखनऊ में राहुल गाँधी का दलित-पिछड़ा कार्ड
उत्तर प्रदेशफीचर्ड

UP: “नेहरू जीवित होते तो कांशीराम होते कांग्रेस के CM”, लखनऊ में राहुल गाँधी का दलित-पिछड़ा कार्ड

The Hill India News
Last updated: March 13, 2026 2:11 pm
The Hill India News
Published: March 13, 2026
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘दलित और पिछड़ा’ वोट बैंक को साधने की जद्दोजहद अब एक नए मोड़ पर आ गई है। शुक्रवार को लखनऊ में आयोजित कांशीराम जयंती कार्यक्रम में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने न केवल बसपा के पारंपरिक वोट बैंक में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि राज्य की भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय कर दी है। राहुल गांधी ने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को याद करते हुए कहा, “अगर आज जवाहरलाल नेहरू जीवित होते, तो कांशीराम कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते।”

Contents
आत्ममंथन और स्वीकारोक्ति: ‘कांग्रेस की कमियों से कांशीराम सफल हुए’पेन और ढक्कन का उदाहरण: बीजेपी की घेराबंदीविचारधारा और संविधान की रक्षा का संकल्पडेटा और ऊर्जा सुरक्षा पर उठाए सवालनिष्कर्ष: 2027 की तैयारी या विचारधारा का विस्तार?

आत्ममंथन और स्वीकारोक्ति: ‘कांग्रेस की कमियों से कांशीराम सफल हुए’

राहुल गांधी का यह संबोधन केवल एक चुनावी भाषण नहीं, बल्कि कांग्रेस की ऐतिहासिक गलतियों की स्वीकारोक्ति भी नजर आया। उन्होंने खुले मन से स्वीकार किया कि जिस रास्ते पर कांग्रेस पूर्व में चल रही थी, उसमें कुछ बुनियादी कमियां थीं। राहुल ने कहा, “अगर कांग्रेस पार्टी अपना काम सही ढंग से करती, तो शायद कांशीराम को अलग रास्ता चुनने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी सफलता कांग्रेस की उन्हीं कमियों का परिणाम थी।”

विशेषज्ञों का मानना है कि राहुल का यह बयान यूपी के उस दलित समाज को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश है, जो वर्तमान में बसपा के कमजोर पड़ने के बाद एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में है।

आज हम कांशीराम जी के संघर्ष, उनके विजन और भारत की राजनीति पर उनके प्रभाव को याद करते हैं और दिल से उनका धन्यवाद करते हैं।

: नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi

📍 लखनऊ, उत्तर प्रदेश pic.twitter.com/39lEMvy4zW

— Congress (@INCIndia) March 13, 2026


पेन और ढक्कन का उदाहरण: बीजेपी की घेराबंदी

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने एक रोचक उदाहरण के जरिए भाजपा की ‘जातिगत राजनीति’ पर निशाना साधा। उन्होंने पेन और उसके ढक्कन की मिसाल देते हुए कहा कि बाबा साहेब आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम हमेशा समाज के सर्वांगीण विकास की बात करते थे।

राहुल के संबोधन के मुख्य बिंदु:

  • 85 बनाम 15 का समीकरण: राहुल ने कहा कि कांशीराम का मानना था कि समाज के 15% लोगों को लाभ मिले, यह ठीक है, लेकिन बाकी 85% बहुसंख्यक समाज को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

  • बीजेपी पर प्रहार: उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने नई व्यवस्था के तहत ‘पेन को उसके ढक्कन से अलग’ कर दिया है, यानी सत्ता और संसाधनों का केंद्रीकरण कुछ खास हाथों में कर दिया है।

  • संस्थानों में भागीदारी: राहुल ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि आज न्यायपालिका, कॉर्पोरेट्स और ब्यूरोक्रेसी में 85% समाज (दलित, पिछड़ा, आदिवासी) की भागीदारी न के बराबर है।


विचारधारा और संविधान की रक्षा का संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लेते हुए राहुल गांधी ने कहा कि पीएम संविधान की मूल विचारधारा में विश्वास नहीं रखते। उन्होंने आंबेडकर और कांशीराम की तुलना करते हुए कहा कि इन महापुरुषों ने वंचितों के हक के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया, लेकिन कभी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया। राहुल ने प्रतिबद्धता दोहराई कि कांग्रेस हर कीमत पर संविधान की रक्षा करेगी, क्योंकि यही वह शक्ति है जिसने देशवासियों को समानता और सम्मान का अधिकार दिया है।

डेटा और ऊर्जा सुरक्षा पर उठाए सवाल

राहुल गांधी ने अपने संबोधन का विस्तार करते हुए प्रधानमंत्री पर देश की ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ और ‘डेटा’ अमेरिका को सौंपने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारत के बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोलकर सरकार ने स्थानीय किसानों और व्यापारियों के हितों को दांव पर लगा दिया है। राहुल के अनुसार, यदि विदेशी सामान भारतीय बाजारों पर कब्जा कर लेगा, तो देश के मध्यम और निम्न वर्ग की आर्थिक स्थिति और बदतर हो जाएगी।


निष्कर्ष: 2027 की तैयारी या विचारधारा का विस्तार?

लखनऊ में राहुल गांधी का यह अंदाज बताता है कि कांग्रेस अब सॉफ्ट हिंदुत्व के बजाय ‘सामाजिक न्याय’ और ‘जातिगत जनगणना’ के अपने कोर एजेंडे पर मजबूती से खड़ी है। कांशीराम को नेहरू के साथ जोड़कर राहुल ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस अब दलित और पिछड़े नेतृत्व को स्वीकार करने और उन्हें सर्वोच्च पद देने के लिए मानसिक रूप से तैयार है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह ‘नैरेटिव’ आने वाले विधानसभा चुनावों में निर्णायक साबित हो सकता है।

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