देहरादून: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में चल रही विश्वप्रसिद्ध चारधाम यात्रा इस वर्ष रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही है, लेकिन इसके साथ ही एक बेहद चिंताजनक और संवेदनशील पहलू भी सामने आया है। आस्था के इस महाकुंभ में स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां न बरतना श्रद्धालुओं पर भारी पड़ रहा है। यात्रा शुरू होने के महज 56 दिनों के भीतर स्वास्थ्य खराब होने के कारण होने वाली मौतों का जो आंकड़ा सामने आया है, उसने प्रशासनिक गलियारों और चिकित्सा जगत को चौंका दिया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, दो महीने पूरे होने से पहले ही अब तक 190 श्रद्धालुओं की असामयिक मृत्यु हो चुकी है।
इस भीषण त्रासदी के पीछे का सबसे प्रमुख कारण यह सामने आया है कि शुगर (मधुमेह), ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) और हाइपरटेंशन जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रसित मरीज भी बिना उचित डॉक्टरी परामर्श और तैयारी के अत्यधिक कठिन माने जाने वाले इस यात्रा मार्ग पर पहुंच रहे हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियां इन मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं। यात्रा के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ने की वजह से चिकित्सा विभाग को युद्धस्तर पर राहत कार्य चलाना पड़ रहा है। अब तक लगभग 89 गंभीर यात्रियों को एयर एम्बुलेंस (हेलीकॉप्टर) के जरिए आपातकालीन परिस्थितियों में रेफर किया जा चुका है, जबकि 753 श्रद्धालुओं को सड़क मार्ग से एम्बुलेंस के माध्यम से हायर सेंटर भेजा गया है। आखिर धरातल पर इस समय क्या स्थिति है और क्यों लगातार बढ़ रहा है चारधाम यात्रा में कोमोरबिडिटी का खतरा? आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं।
श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड सैलाब और मॉनसून की आहट
उत्तराखंड चारधाम की यात्रा वर्तमान में अपने पूरे शबाब पर है। 19 अप्रैल से कपाट खुलने के साथ शुरू हुई इस यात्रा में 13 जून तक कुल 34 लाख 77 हजार 834 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। धामों में उमड़ रही यह भीड़ व्यवस्थापकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों द्वारा आगामी मॉनसून सीजन के जल्द ही दस्तक देने की संभावना व्यक्त की गई है, जिसके चलते पिछले कुछ दिनों से धीरे-धीरे यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में मामूली गिरावट दर्ज की जा रही है। मॉनसून के दौरान पहाड़ों में भूस्खलन और भारी बारिश के खतरे को देखते हुए प्रशासन भी अत्यधिक सतर्क है।
स्क्रीनिंग रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे: रिस्क लेने से नहीं चूक रहे यात्री
स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस वर्ष यात्रा मार्गों पर व्यापक मुस्तैदी दिखाई गई है। 11 जून तक विभाग द्वारा कुल 6 लाख 42 हजार 321 श्रद्धालुओं की अनिवार्य हेल्थ स्क्रीनिंग की जा चुकी है। इस स्क्रीनिंग के जो परिणाम आए हैं, वे बेहद डराने वाले हैं। जांच के दौरान कुल 23 हजार 657 श्रद्धालु किसी न किसी प्रकार की कोमोरबिडिटी (गंभीर सह-रुग्णता) से पीड़ित पाए गए। चिकित्सा अधिकारियों द्वारा इन यात्रियों को यात्रा न करने या कुछ दिन विश्राम करने की सलाह दी गई थी, लेकिन अपनी अटूट आस्था और जिद के आगे उन्होंने इस चिकित्सकीय चेतावनी को दरकिनार कर दिया और अपनी यात्रा को जारी रखने का जोखिम उठाया।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि स्क्रीनिंग में 2,697 यात्री अत्यधिक ‘हाई रिस्क’ (उच्च जोखिम) वाली श्रेणी में पाए गए, जिनकी जान को ऊंचाई पर जाने से सीधा खतरा था। इसके बावजूद, स्वास्थ्य विभाग के समझाने पर मात्र 170 यात्रियों ने ही अपनी यात्रा को स्थगित करने और घर लौटने का समझदारी भरा निर्णय लिया। शेष सभी हाई-रिस्क यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर पहाड़ों पर चढ़ गए, जिससे चारधाम यात्रा में कोमोरबिडिटी का खतरा कई गुना बढ़ गया।
हृदय गति रुकना मौतों की मुख्य वजह: केदारनाथ सबसे संवेदनशील
उत्तराखंड राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से प्राप्त आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, कुल 190 मौतों में से अधिकांश मौतें ‘कार्डियक अरेस्ट’ यानी हृदय गति रुकने के कारण हुई हैं। यदि धाम वार आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो केदारनाथ यात्रा मार्ग सबसे अधिक जानलेवा साबित हुआ है, जहां अब तक सबसे ज्यादा 91 श्रद्धालुओं की मौत हो चुकी है। इसके बाद बदरीनाथ मार्ग पर 57 श्रद्धालुओं, यमुनोत्री मार्ग पर 25 श्रद्धालुओं और गंगोत्री मार्ग पर 17 श्रद्धालुओं ने अपनी जान गंवाई है।
यह आंकड़ा सीधे तौर पर उन धामों की ऊंचाई और वहां की कठिन चढ़ाई से जुड़ा हुआ है। बताते चलें कि 13 जून तक केदारनाथ धाम में 12,23,074 श्रद्धालु, बदरीनाथ धाम में 10,92,367 श्रद्धालु, गंगोत्री धाम में 5,95,166 श्रद्धालु और यमुनोत्री धाम में 5,56,227 श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। केदारनाथ में अत्यधिक ऊंचाई और कठिन पैदल मार्ग के कारण ऑक्सीजन का स्तर अचानक गिर जाता है, जो कमजोर हृदय वाले रोगियों के लिए घातक बन जाता है।
आयु वर्ग के आधार पर स्वास्थ्य स्क्रीनिंग के आंकड़े
स्वास्थ्य विभाग ने यात्रियों की निगरानी के लिए सात प्रमुख स्थानों—रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी (गंगोत्री व यमुनोत्री), हरिद्वार, पौड़ी और देहरादून में विशेष स्क्रीनिंग पॉइंट्स स्थापित किए हैं। यहाँ 50 वर्ष से अधिक आयु के यात्रियों का अनिवार्य स्वास्थ्य परीक्षण किया जा रहा है।
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50 साल से कम उम्र के यात्रियों की स्थिति: इस श्रेणी में अब तक 3 लाख 89 हजार 478 युवाओं और मध्यम उम्र के यात्रियों का चेकअप किया गया, जिसमें से 6,805 यात्री हाइपरटेंशन, डायबिटीज, कार्डियक डिजीज और अस्थमा जैसी बीमारियों से ग्रसित पाए गए।
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50 साल से अधिक उम्र के यात्रियों की स्थिति: इस आयु वर्ग में 2 लाख 52 हजार 843 यात्रियों की जांच की गई, जिसमें से 16 हजार 852 यात्रियों में कोमोरबिडिटी की पुष्टि हुई। इसी समूह से 2,697 यात्री ‘हाई रिस्क’ जोन में चिह्नित किए गए थे। कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि वृद्ध यात्रियों में चारधाम यात्रा में कोमोरबिडिटी का खतरा सबसे गंभीर स्तर पर है।
स्वास्थ्य केंद्रों पर भारी दबाव, ओपीडी में लाखों का इलाज
यात्रा मार्गों पर स्थापित प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों का भारी दबाव देखा जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, इन केंद्रों की ओपीडी (OPD) में अब तक कुल 2 लाख 39 हजार 427 श्रद्धालुओं का इलाज किया जा चुका है, जिनमें से 6,168 गंभीर रूप से कोमोरबिडिटी के मरीज थे। वहीं, इमरजेंसी वार्ड में 35 हजार 456 श्रद्धालुओं को आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं दी गईं, जिनमें से 3,483 यात्री विभिन्न दुर्घटनाओं या रास्तों में गिरने के कारण चोटिल (Injured) हुए थे।
जिम्मेदार अधिकारियों और मंत्रियों का क्या है कहना?
“पिछले साल की तुलना में इस बार श्रद्धालुओं की आमद बहुत अधिक है, जिससे चारों धामों में अभूतपूर्व भीड़ है। यात्रा मार्गों पर दम तोड़ने वाले अधिकांश श्रद्धालु 50 वर्ष से अधिक आयु के हैं और पहले से ही गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे। हमारी सभी से पुरजोर अपील है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी हेल्थ एडवाइजरी का पूरी तरह पालन करें। श्रद्धालु जल्दबाजी न करें; दो दिन के भीतर यात्रा पूरी करने के प्रयास के बजाय कम से कम एक सप्ताह का समय लेकर धीरे-धीरे यात्रा संपन्न करें। यदि मार्ग में थोड़ा भी असहज महसूस हो, तो तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच कराएं।” — डॉ. सुनीता टम्टा, महानिदेशक, स्वास्थ्य विभाग, उत्तराखंड
“उत्तराखंड सरकार ने श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विस्तृत हेल्थ एडवाइजरी जारी की है। हाइपरटेंशन, डायबिटीज या दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को अपनी पूरी मेडिकल रिपोर्ट और दवाइयां साथ रखनी चाहिए और स्थानीय स्तर पर पूरी जांच के बाद ही पहाड़ों पर चढ़ना चाहिए। 50 से अधिक की उम्र वाले लोगों को हाई एल्टीट्यूड सिकनेस (ऊंचाई पर होने वाली बीमारी) का खतरा बहुत ज्यादा होता है। यदि पैदल चलते समय थकान महसूस हो, तो गैर-जरूरी बहादुरी या ‘पहलवानी’ दिखाने के बजाय बैठ जाएं और आराम करें। यात्रा को सुरक्षित बनाना प्रशासन और जनता दोनों के सामूहिक सहयोग से ही संभव है।” — सुबोध उनियाल, स्वास्थ्य मंत्री, उत्तराखंड
उच्च हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियाँ
चारधाम के चारों पवित्र स्थल अत्यधिक उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनकी समुद्र तल से ऊंचाई 10,000 फीट से लेकर 11,500 फीट से भी अधिक है। इन क्षेत्रों में अचानक अत्यधिक ठंड हो जाना, तीव्र पराबैंगनी विकिरण (UV Rays), अत्यंत कम वायुमंडलीय दबाव और ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में भारी कमी आना बेहद स्वाभाविक है। मैदानी इलाकों से सीधे आने वाले यात्रियों का शरीर इन बदलावों के प्रति तुरंत अनुकूल (Acclimatize) नहीं हो पाता। यही कारण है कि चारधाम यात्रा में कोमोरबिडिटी का खतरा एक अदृश्य दुश्मन की तरह श्रद्धालुओं को अपनी चपेट में ले रहा है। यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे कपूर, ओआरएस (ORS), और अपनी नियमित दवाएं हमेशा साथ रखें और पानी पीते रहें ताकि शरीर में डिहाइड्रेशन न हो।
