
नैनीताल: भारत का संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपना जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार देता है। इसी अधिकार को बहाल रखते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड में एक अंतरधार्मिक प्रेमी जोड़े की सुरक्षा को लेकर बड़ा आदेश दिया है। अवकाश कालीन न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उधम सिंह नगर के एसएसपी और रुद्रपुर एसएचओ को तत्काल प्रभाव से जोड़े की जान-माल की रक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक उत्तरदायित्व है।
मामला क्या है? प्यार, धर्म और कानूनी चुनौती
यह मामला उधम सिंह नगर जिले का है, जहाँ मुस्लिम समुदाय की एक युवती और सिख समुदाय के एक युवक ने समाज और परिवार के कड़े विरोध के बीच एक-दूसरे का हाथ थामने का फैसला किया है।
याचिका के मुख्य बिंदु:
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लंबे समय का परिचय: याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वे एक-दूसरे को काफी समय से जानते हैं और परिपक्व निर्णय लेने में सक्षम हैं।
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स्पेशल मैरिज एक्ट (Special Marriage Act): जोड़ा धर्म परिवर्तन के बिना, ‘विशेष विवाह अधिनियम’ के तहत कानूनी रूप से विवाह बंधन में बंधना चाहता है।
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पारिवारिक विरोध और धमकियां: युवती के परिजनों ने इस रिश्ते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद जोड़े को अपनी जान का खतरा महसूस हो रहा है।
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पुलिस की उदासीनता: याचिका में आरोप लगाया गया कि सुरक्षा के लिए एसएसपी मणिकांत मिश्रा को प्रार्थना पत्र देने के बावजूद उन्हें सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई थी, जिसके बाद उन्हें उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
हाईकोर्ट की सुनवाई: “जान-माल की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता”
गुरुवार, 5 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट का रुख स्पष्ट और सुरक्षात्मक रहा। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि किसी भी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध डराया या धमकाया नहीं जा सकता।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश:
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पुलिस को आदेश: कोर्ट ने एसएसपी उधम सिंह नगर और एसएचओ रुद्रपुर को आदेश दिया कि वे तुरंत जोड़े को सुरक्षा प्रदान करें ताकि उन्हें किसी भी प्रकार की शारीरिक क्षति न पहुँचाई जा सके।
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सरकार को नोटिस: कोर्ट ने राज्य सरकार और मामले से जुड़े अन्य विपक्षी पक्षों को नोटिस जारी किया है। उनसे चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब माँगा गया है।
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अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च की तिथि निर्धारित की गई है।
राज्य सरकार का रुख: “बालिग होने पर कोई आपत्ति नहीं”
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने भी अपना पक्ष रखा। सरकार की ओर से कहा गया कि चूँकि प्रेमी जोड़ा बालिग है और कानून के दायरे में रहकर विवाह करना चाहता है, इसलिए राज्य को उनके विवाह करने या साथ रहने पर कोई कानूनी आपत्ति नहीं है। यह रुख दर्शाता है कि बालिग व्यक्तियों की पसंद को लेकर कानूनी प्रक्रियाएं लचीली हैं, बशर्ते वे निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हों।
उत्तराखंड में बढ़ते मामले: हरिद्वार का पिछला उदाहरण
गौरतलब है कि उत्तराखंड में अपनी पसंद के साथी के साथ रहने के लिए सुरक्षा मांगने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले हरिद्वार जिले के भी एक प्रेमी जोड़े ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि उस मामले में दोनों पक्ष एक ही धर्म के थे, लेकिन परिवार के विरोध के कारण उन्हें भी जान का खतरा था। नैनीताल हाईकोर्ट ने उस मामले में भी ‘जीवन के अधिकार’ (अनुच्छेद 21) को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षा के आदेश जारी किए थे।
कानूनी विशेषज्ञों की राय: अनुच्छेद 21 की मजबूती
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आदेश समाज में एक सकारात्मक संदेश देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ’ जैसे कई ऐतिहासिक फैसलों में यह व्यवस्था दी है कि बालिग जोड़ों को अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार है और किसी भी ‘खाप’ या ‘परिवार’ को हिंसा करने का हक नहीं है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक परंपराएं
नैनीताल हाईकोर्ट का यह फैसला एक बार फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक रूढ़ियों के बीच के संघर्ष को सामने लाता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून की नजर में दो बालिगों की आपसी सहमति सर्वोपरि है। उधम सिंह नगर पुलिस के लिए अब यह चुनौती होगी कि वे इस संवेदनशील मामले में कोर्ट के आदेशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करें।



