
देहरादून: भारत के न्यायिक इतिहास में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक ऐसी नजीर पेश की गई है, जिसकी गूंज आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों में भी सुनाई देगी। उत्तराखंड सूचना आयोग ने एक युगांतरकारी निर्णय लेते हुए अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों और न्यायाधीशों के विरुद्ध दर्ज शिकायतों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश दिया है। मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) राधा रतूड़ी की अध्यक्षता में पारित यह आदेश न केवल न्यायिक व्यवस्था की गोपनीयता के पारंपरिक पर्दें को हटाता है, बल्कि जनता के ‘जानने के अधिकार’ को नई ऊंचाइयों पर ले जाता है।
क्या है पूरा मामला?
यह ऐतिहासिक घटनाक्रम भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारी और प्रसिद्ध आरटीआई कार्यकर्ता संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर एक अपील (संख्या 43293/2025-26) से उपजा है। संजीव चतुर्वेदी ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 19(3) के तहत राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया था।
मई 2025 में दायर अपनी मूल आरटीआई में चतुर्वेदी ने अधीनस्थ न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और उनके विरुद्ध होने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को लेकर चार महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता मांगी थी। उन्होंने जानना चाहा था कि उत्तराखंड में न्यायाधीशों पर कौन से सेवा और आचरण नियम लागू होते हैं और उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच का तंत्र क्या है।
गोपनीयता बनाम पारदर्शिता: आयोग में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान नैनीताल हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने कड़ा रुख अपनाते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था। विभाग का तर्क था कि जजों के खिलाफ शिकायतें ‘गोपनीय प्रकृति’ की होती हैं और यह ‘तीसरे पक्ष’ (Third Party) की व्यक्तिगत जानकारी के दायरे में आती हैं। विभागीय अधिकारियों का यह भी कहना था कि ऐसी संवेदनशील जानकारी साझा करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
हालांकि, उत्तराखंड सूचना आयोग ने इन तर्कों को अपर्याप्त माना। आयोग ने स्पष्ट किया कि “गोपनीयता” का लेबल लगाकर जनहित से जुड़ी सूचनाओं को अनंत काल तक दबाया नहीं जा सकता। आयोग के अनुसार, न्यायपालिका में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, ताकि संस्था की साख बनी रहे।
फैसले की मुख्य बातें: नाम नहीं, पर आंकड़े होंगे सार्वजनिक
मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने संतुलन साधते हुए एक व्यावहारिक आदेश पारित किया है। आयोग के निर्देशानुसार:
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सांख्यिकीय विवरण: 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच जजों के खिलाफ प्राप्त कुल शिकायतों की संख्या बतानी होगी।
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कार्रवाई का विवरण: कितनी शिकायतों पर अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई, इसका स्पष्ट डेटा देना होगा।
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पहचान की सुरक्षा: किसी भी न्यायाधीश या अधिकारी की व्यक्तिगत पहचान, नाम या विशिष्ट विवरण को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, ताकि उनकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा को आंच न आए।
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अनुमति की प्रक्रिया: लोक सूचना अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वे एक माह के भीतर सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति प्राप्त कर अपीलकर्ता को प्रमाणित दस्तावेज उपलब्ध कराएं।
न्यायिक सुधारों की दिशा में एक ‘नजीर’
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक पारदर्शिता के लिहाज से यह फैसला देश में पहली बार किसी राज्य सूचना आयोग द्वारा लिया गया इतना बड़ा कदम है। अक्सर उच्च न्यायपालिका और अधीनस्थ न्यायपालिका की प्रशासनिक प्रक्रियाएं आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की कोशिश की जाती रही हैं। लेकिन संजीव चतुर्वेदी की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में कोई भी संस्थान जांच और संतुलन (Checks and Balances) से ऊपर नहीं है।
इस आदेश से यह स्पष्ट होगा कि उत्तराखंड की निचली अदालतों में भ्रष्टाचार या कदाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का कितना पालन हो रहा है। यह निर्णय उन हजारों वादियों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो न्यायिक तंत्र में सुधार की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भविष्य का रोडमैप
सूचना आयोग ने लोक सूचना अधिकारी को एक महीने की समय-सीमा दी है। यदि इस अवधि में जानकारी साझा की जाती है, तो यह आरटीआई के इतिहास में एक नया अध्याय होगा। यह आदेश न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरे भारत की न्यायपालिका के लिए एक संदेश है कि पारदर्शिता से संस्था की गरिमा घटती नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत होती है।
उत्तराखंड सूचना आयोग का यह फैसला राज्य में सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की दिशा में एक साहसिक मील का पत्थर है। राधा रतूड़ी के नेतृत्व में आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य केवल कागजी जानकारी देना नहीं, बल्कि सत्ता और संस्थाओं को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है।



