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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘मेरिट’ के आगे जाति की दीवार ढही, आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार अब सामान्य सीटों के भी हकदार

The Hill India News
Last updated: January 5, 2026 1:25 pm
The Hill India News
Published: January 5, 2026
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Image Source : फाइल
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नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत ने आरक्षण और मेरिट को लेकर एक ऐसा युगांतकारी फैसला सुनाया है, जो आने वाले समय में देश की भर्ती प्रक्रियाओं की दिशा बदल देगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) का कोई उम्मीदवार मेरिट के आधार पर ‘कट-ऑफ’ से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे सामान्य (General/Unreserved) कैटेगरी में चयनित होने से रोका नहीं जा सकता।

Contents
राजस्थान हाई कोर्ट की याचिका खारिज, संवैधानिक मूल्यों की जीत‘अनारक्षित’ पद किसी के लिए सुरक्षित नहीं (Open Category is for All)‘दोहरे लाभ’ की दलील को बताया भ्रामकविशेषज्ञों की राय: 1990 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव?CISF मामले का संदर्भ: शारीरिक छूट के बाद भी सामान्य सीट संभवपारदर्शिता और योग्यता को बढ़ावा

अदालत ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि ‘अनारक्षित’ पद किसी भी वर्ग या पृष्ठभूमि के उम्मीदवार के लिए खुले हैं, बशर्ते वह योग्यता (Merit) की कसौटी पर खरा उतरता हो।

राजस्थान हाई कोर्ट की याचिका खारिज, संवैधानिक मूल्यों की जीत

यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने राजस्थान हाई कोर्ट प्रशासन की एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट प्रशासन ने अपने ही 2023 के एक आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और ग्रेड-II क्लर्क भर्ती में आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों को सामान्य सूची से बाहर रखा गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट प्रशासन की अपील को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “हाई कोर्ट ने अपनी गलती सुधारकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की है। अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता का अधिकार सर्वोपरि है।”

‘अनारक्षित’ पद किसी के लिए सुरक्षित नहीं (Open Category is for All)

अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अक्सर यह गलतफहमी होती है कि ‘जनरल’ कैटेगरी केवल सवर्णों या गैर-आरक्षित वर्ग के लिए है। बेंच ने साफ किया:

“ओपन, जनरल या अनारक्षित श्रेणी के पद किसी विशेष जाति, वर्ग या लिंग के लिए आरक्षित नहीं होते। ये सभी के लिए खुले होते हैं। यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार आवेदन करते समय अपना कोटा चुनता है, तो इसका उद्देश्य केवल नौकरी की संभावना सुरक्षित करना होता है, इसका मतलब यह कतई नहीं कि उसकी व्यक्तिगत मेरिट को नजरअंदाज कर दिया जाए।”

‘दोहरे लाभ’ की दलील को बताया भ्रामक

भर्ती परीक्षाओं में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार अगर सामान्य सीट लेते हैं, तो उन्हें ‘दोहरा लाभ’ मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह सोच न केवल गलत है बल्कि भ्रामक भी है।

अदालत के अनुसार, अगर इस ‘दोहरे लाभ’ वाली सोच को मान लिया जाए, तो आरक्षित वर्ग के सबसे प्रतिभाशाली और योग्य छात्र भी सिर्फ कोटे की सीटों तक ही सिमट कर रह जाएंगे। यह सामाजिक न्याय और मेरिटोक्रेसी (योग्यतावाद) के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

विशेषज्ञों की राय: 1990 के बाद का सबसे बड़ा बदलाव?

गोरखपुर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर रामनरेश चौधरी इस फैसले को एक बड़े सुधार के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार:

  • 1990 से पहले: सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को आर्टिकल 14 का अभिन्न हिस्सा मानता था।

  • 1990 के बाद: कोर्ट का रुख कुछ हद तक बदला और आरक्षण को ‘इनेबलिंग प्रोविजन’ (सक्षम प्रावधान) कहा जाने लगा, न कि मौलिक अधिकार।

  • वर्तमान फैसला: प्रोफेसर चौधरी मानते हैं कि इस रुलिंग से उन बाधाओं पर रोक लगेगी जो आरक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों को ओपन कैटेगरी में जाने से रोकती थीं।

CISF मामले का संदर्भ: शारीरिक छूट के बाद भी सामान्य सीट संभव

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल (9 सितंबर) के उस आदेश की ही अगली कड़ी है, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सीआईएसएफ (CISF) भर्ती मामले में फैसला सुनाया था। उस मामले में कोर्ट ने कहा था कि यदि भर्ती नियमों में स्पष्ट मनाही न हो, तो शारीरिक मानकों (Physical Standards) में छूट लेने के बावजूद मेधावी छात्र सामान्य सीट पर नियुक्त हो सकता है।

केस स्टडी: 2017 की एक भर्ती में एक एसटी उम्मीदवार को 366 अंक मिले थे, जबकि सामान्य वर्ग का कट-ऑफ 364 था। सामान्य वर्ग के एक अभ्यर्थी ने इसे चुनौती दी थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

पारदर्शिता और योग्यता को बढ़ावा

सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से देश भर की भर्ती एजेंसियों (UPSC, SSC, State PSCs) को अब अपनी चयन प्रक्रियाओं में और अधिक पारदर्शिता लानी होगी। यह फैसला संदेश देता है कि आरक्षण का उद्देश्य पिछड़ों को सहारा देना है, न कि प्रतिभावान छात्रों के लिए सामान्य अवसरों के दरवाजे बंद करना।

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