उत्तराखंड राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड की अल्मोड़ा शाखा में सामने आए करीब 7 करोड़ रुपये के विवादित ऋण प्रकरण ने प्रदेश के बैंकिंग तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बैंक की आंतरिक जांच, विधिक परीक्षण (लीगल ऑडिट) और उच्चस्तरीय रिपोर्ट में कई ऐसी अनियमितताओं का खुलासा हुआ है, जिनके बाद बैंक प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन प्रबंध निदेशक (एमडी) सहित छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। इस पूरे मामले की जांच अब पुलिस ने शुरू कर दी है और आने वाले दिनों में कई अहम खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मामला उत्तराखंड राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड की खत्याड़ी स्थित अल्मोड़ा शाखा से जुड़ा है। बैंक के वर्तमान शाखा प्रबंधक समीर भटनागर द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने तत्कालीन प्रबंध निदेशक दीपक कुमार, महाप्रबंधक धर्मवीर सिंह, सहायक महाप्रबंधक कर्ण सिंह बिष्ट, तत्कालीन शाखा प्रबंधक मनोज राणा तथा मैसर्स मां नंदा बिल्डकॉम प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक आनंद सिंह चौहान और सुनीता चौहान के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
2 करोड़ की मंजूरी, लेकिन 7 करोड़ का ऋण कर दिया स्वीकृत
शिकायत के अनुसार, 3 मई 2017 को आयोजित बैंक प्रबंधन समिति की बैठक में मैसर्स मां नंदा बिल्डकॉम प्राइवेट लिमिटेड की 2 करोड़ रुपये की कैश-क्रेडिट ऋण सीमा के नवीनीकरण को स्वीकृति दी गई थी। लेकिन आरोप है कि समिति के निर्णय के विपरीत ऋण स्वीकृति पत्र जारी कर इस सीमा को सीधे 2 करोड़ से बढ़ाकर 7 करोड़ रुपये कर दिया गया।
यही नहीं, इस पूरी प्रक्रिया में बैंक की निर्धारित स्वीकृति व्यवस्था और वित्तीय नियमों का कथित रूप से उल्लंघन किया गया। आरोप है कि बिना वैधानिक अनुमति के इतनी बड़ी राशि का ऋण स्वीकृत कर दिया गया, जिससे बैंक को भारी वित्तीय जोखिम का सामना करना पड़ा।
जांच में सामने आईं कई गंभीर अनियमितताएं
बैंक प्रबंधन द्वारा कराई गई विस्तृत जांच, लीगल ओपिनियन, लीगल ऑडिट और उच्चस्तरीय जांच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच में पाया गया कि ऋण के बदले बैंक के पास रखी गई इक्विटेबल मॉर्टगेज संपत्ति निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी। यानी जिस संपत्ति को बैंक ने सुरक्षा के रूप में स्वीकार किया, उसकी वैधता और मूल्यांकन नियमों के अनुरूप नहीं पाया गया।
इसके अलावा कोलेटरल सिक्योरिटी, ऋण से जुड़े दस्तावेजों के प्रलेखन और अन्य अभिलेखों में भी कथित तौर पर कूटरचना, फर्जीवाड़ा और हेराफेरी के संकेत मिले हैं। इन तथ्यों के सामने आने के बाद बैंक ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों और फर्म के निदेशकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की।
पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा, जांच शुरू
बैंक की ओर से जारी पत्र के आधार पर पुलिस ने सभी छह नामजद आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है। अब जांच एजेंसियां ऋण स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया, बैंक अधिकारियों की भूमिका, दस्तावेजों की सत्यता और वित्तीय लेनदेन से जुड़े सभी पहलुओं की बारीकी से जांच करेंगी।
अल्मोड़ा के कोतवाल योगेश चंद्र उपाध्याय ने कहा कि मामले की जांच पूरी निष्पक्षता से की जा रही है और जांच के दौरान जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
बैंकिंग व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
यह मामला केवल एक ऋण स्वीकृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह स्पष्ट होगा कि बैंक के उच्च स्तर पर नियमों की अनदेखी करते हुए करोड़ों रुपये के ऋण को मंजूरी दी गई। इससे न केवल बैंक की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है, बल्कि आम जमाकर्ताओं के विश्वास पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सहकारी बैंकों में ऋण स्वीकृति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी तथा तकनीकी निगरानी के दायरे में लाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं को रोका जा सके। फिलहाल पूरे प्रदेश की निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य आरोपियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है। यह मामला उत्तराखंड के सहकारी बैंकिंग इतिहास के सबसे चर्चित वित्तीय विवादों में से एक बनता जा रहा है।
