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संविधान दिवस पर अनोखा आयोजन: राजस्थान में दो युवा जजों ने कोर्ट में सादगीपूर्ण विवाह कर पेश की मिसाल

The Hill India News
Last updated: November 28, 2025 2:51 am
The Hill India News
Published: November 28, 2025
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जयपुर/कोटपूतली-बहरोड़: राजस्थान के कोटपूतली-बहरोड़ जिले में संविधान दिवस के अवसर पर जिला कलेक्टर कार्यालय एक प्रेरणादायक और सामाजिक रूप से सार्थक घटना का साक्षी बना। यहां दो युवा न्यायिक अधिकारियों—बानसूर के गूंता शाहपुर निवासी हेमंत मेहरा और हनुमानगढ़ जिले की करीना काला—ने दहेज, फिजूलखर्ची और सामाजिक दिखावे से दूर रहते हुए एक सरल, गरिमामय और आदर्श विवाह समारोह सम्पन्न किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस विवाह में भारतीय संविधान को साक्षी बनाया गया, जो दोनों अधिकारियों की न्यायिक सेवा के प्रति निष्ठा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति आस्था को दर्शाता है।

Contents
संविधान दिवस को चुना—एक प्रतीकात्मक और प्रेरक निर्णयकोई दहेज नहीं, कोई भव्य आयोजन नहीं—सादगी में भी है गरिमाडीएम, एडीएम और प्रशासनिक अधिकारियों ने दी शुभकामनाएँदो युवा जजों का संदेश—समाज बदल सकता है, यदि हम बदलना चाहेंसमाज में सकारात्मक प्रभाव—स्थानीय लोग भी हुए प्रेरितसमापन: संविधान दिवस पर सामाजिक सुधार की मिसाल

यह विवाह न केवल एक व्यक्तिगत समारोह था बल्कि सामाजिक संदेश का वाहक भी, जिसने सरकारी अधिकारियों से लेकर आम नागरिकों तक सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। संविधान दिवस पर हुए इस अनूठे आयोजन का उद्देश्य यह बताना था कि अगर समाज बदलाव चाहता है, तो शुरुआत स्वयं से ही करनी होती है।


संविधान दिवस को चुना—एक प्रतीकात्मक और प्रेरक निर्णय

हेमंत मेहरा वर्तमान में सिविल न्यायाधीश के पद पर चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर) में नियुक्त हैं, जबकि करीना काला प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में सेवाएं दे रही हैं। दोनों ने बताया कि संविधान दिवस को शादी के लिए चुनना उनका सोचा-समझा निर्णय था क्योंकि वे न्यायिक सेवा में रहते हुए संविधान को सबसे ऊपर मानते हैं।

दोनों के अनुसार, “हमारी पहचान न्यायिक सेवा से है और हम संविधान की शपथ लेकर अपने करियर की शुरुआत करते हैं। इसलिए हमने ठाना कि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन को भी संविधान से जोड़ें, ताकि संदेश जाए कि हमारे लिए संविधान सिर्फ किताब नहीं बल्कि जीवन का मार्गदर्शक है।”

संविधान दिवस हर वर्ष 26 नवंबर को मनाया जाता है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने भारतीय संविधान को अपनाया था। ऐसे महत्वपूर्ण दिन पर विवाह का आयोजन कर नवदंपति ने संवैधानिक मूल्यों—समानता, गरिमा, न्याय और सरलता—को जीवन में उतारने का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।


कोई दहेज नहीं, कोई भव्य आयोजन नहीं—सादगी में भी है गरिमा

समाज में जहां आज भी दहेज प्रथा जड़ें जमाए बैठी है और शादियों में करोड़ों रुपये की फिजूलखर्ची हो रही है, वहीं दो युवा न्यायिक अधिकारियों ने ‘सादगी और सम्मान’ को प्राथमिकता देते हुए दहेज से पूरी तरह परहेज करने का फैसला किया। विवाह में न तो कोई भारी-भरकम सजावट थी और न ही कोई बड़े स्तर का भोज। परिवार, कुछ अधिकारी और कुछ सहयोगियों की छोटी-सी उपस्थिति में एक सौम्य और गरिमापूर्ण वातावरण में यह विवाह सम्पन्न हुआ।

विवाह में न फूलों की झालरें थीं, न डीजे, न लंबी बारात और न ही कोई शादी का भव्य स्टेज। सिर्फ संविधान, कानून, प्रशासन और परिवार की उपस्थिति—जो यह संदेश देने के लिए काफी था कि विवाह का वास्तविक अर्थ रिश्ते की पवित्रता में है, न कि खर्चे और दिखावे में।


डीएम, एडीएम और प्रशासनिक अधिकारियों ने दी शुभकामनाएँ

इस सादगीपूर्ण विवाह को विशेष रूप से यादगार बनाने में जिला प्रशासन की मौजूदगी ने अहम भूमिका निभाई।
समारोह में उपस्थित थे—

  • जिला कलेक्टर प्रियंका गोस्वामी
  • एडीएम ओमप्रकाश सहारण
  • अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी

जिला कलेक्टर प्रियंका गोस्वामी ने नवविवाहितों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि यह विवाह सामाजिक सुधार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा, “आज के समय में जब शादियों में अत्यधिक खर्च और दहेज सामाजिक बुराइयों को बढ़ाते हैं, ऐसे में दो युवा जजों द्वारा इस तरह का विवाह समाज को नई दिशा देता है। यह एक संदेश है कि परिवर्तन की शुरुआत सरकार या कानून से नहीं, व्यक्ति और परिवार से होती है।”

एडीएम ओमप्रकाश सहारण ने भी कहा कि संविधान दिवस पर संविधान को साक्षी मानकर विवाह रचाना स्वयं में ऐतिहासिक और प्रेरणादायक क्षण है।


दो युवा जजों का संदेश—समाज बदल सकता है, यदि हम बदलना चाहें

विवाह के दौरान हेमंत और करीना ने दहेज विरोध पर जोर देते हुए कहा कि वे न्यायिक सेवा में हैं और रोजाना ऐसे मामलों को देखते हैं जहां दहेज के कारण परिवार टूटते हैं, महिलाएँ प्रताड़ित होती हैं और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचता है। इसलिए उन्होंने अपने विवाह को एक उदाहरण बनाने का फैसला किया।

उनका कहना था—
“अगर हम स्वयं दहेज-मुक्त विवाह नहीं करेंगे, तो समाज से दहेज प्रथा खत्म करने की बात कैसे कर सकते हैं? हमारा विवाह सादगीपूर्ण हो, यही हमारी प्राथमिकता थी।”


समाज में सकारात्मक प्रभाव—स्थानीय लोग भी हुए प्रेरित

इस विवाह ने स्थानीय समाज में सकारात्मक प्रभाव छोड़ा। कई लोग इसे आधुनिक सोच और संवैधानिक मूल्यों का सुंदर संगम बता रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षकों का कहना है कि इस तरह की पहल से न केवल युवाओं को प्रेरणा मिलती है बल्कि दहेज और फिजूलखर्ची के खिलाफ एक ठोस संदेश जाता है।

कुछ लोगों ने यह भी कहा कि जब उच्च अधिकारी और जज इस तरह की मिसाल पेश करते हैं, तो आम नागरिकों के लिए यह संदेश और भी प्रभावकारी हो जाता है।


समापन: संविधान दिवस पर सामाजिक सुधार की मिसाल

हेमंत मेहरा और करीना काला का यह विवाह सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज जैसा है, जो आने वाले समय में अनगिनत युवाओं को प्रेरित करेगा। विवाह को संविधान दिवस से जोड़ना, उसे दहेज-मुक्त रखना और प्रशासन की मौजूदगी में सादगी से सम्पन्न करना—इन सभी तत्वों ने मिलकर इस आयोजन को विशिष्ट और प्रेरणादायक बना दिया है।

आज के समय में जब समाज दोहरी सोच, अंधाधुंध खर्च और कुरीतियों से जूझ रहा है, यह विवाह एक स्पष्ट संदेश देता है— बदलाव कानून से नहीं, व्यक्ति से शुरू होता है; और समाज तब बदलता है, जब उसके जागरूक लोग मार्गदर्शक बनते हैं।

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