
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उधम सिंह नगर जिले के सीमांत क्षेत्र खटीमा से जुड़े एक सनसनीखेज सामूहिक दुष्कर्म मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने मामले के मुख्य आरोपियों में से एक, जतिन को बड़ी राहत प्रदान करते हुए उसकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली है। न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकलपीठ ने बचाव पक्ष और अभियोजन की दलीलों को सुनने के बाद आरोपी की रिहाई के आदेश जारी किए।
न्यायालय ने आरोपी को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के दो स्थानीय प्रतिभूतियों (Sponsors) को पेश करने की शर्त पर जमानत दी है। इस फैसले ने एक बार फिर संगीन अपराधों में गवाहों के पलटने और एफआईआर में देरी जैसे कानूनी पहलुओं पर चर्चा छेड़ दी है।
क्या था पूरा मामला?
इस मामले की शुरुआत उधम सिंह नगर के खटीमा कोतवाली में दर्ज एक शिकायत से हुई थी। पीड़िता की मां ने पुलिस को दी तहरीर में बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। तहरीर के अनुसार, सह-आरोपी नेहा, हिमांशु, संजीत सिंह राणा और जतिन, पीड़िता को बहला-फुसलाकर पास के एक जंगल में ले गए थे।
आरोप लगाया गया था कि वहां नेहा ने सोची-समझी साजिश के तहत पीड़िता को कोल्ड ड्रिंक पिलाई, जिसमें कथित तौर पर नशीला पदार्थ मिला हुआ था। कोल्ड ड्रिंक पीते ही पीड़िता बेहोश हो गई। आरोप था कि बेहोशी की हालत का फायदा उठाकर जतिन, हिमांशु और संजीत सिंह राणा ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म (Gangrape) की वारदात को अंजाम दिया। इस घटना ने उस समय पूरे जिले में आक्रोश पैदा कर दिया था।
अदालत में क्यों कमजोर पड़ा अभियोजन का पक्ष?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने कुछ ऐसे तथ्य पेश किए, जिन्होंने अभियोजन की पूरी कहानी की नींव हिला दी। जमानत मंजूर होने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण रहे:
1. पीड़िता का बयानों से मुकर जाना (Hostile Witness)
सुनवाई के दौरान सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब ट्रायल कोर्ट में गवाही के दौरान पीड़िता अपने पूर्व के बयानों से पूरी तरह पलट गई। पीड़िता ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि वह सह-आरोपी संजीत सिंह राणा से प्रेम करती थी और वह आरोपी जतिन को पहचानती तक नहीं है। कानूनी भाषा में इसे ‘गवाह का होस्टाइल होना’ कहा जाता है, जिससे अभियोजन का पक्ष अत्यंत कमजोर हो जाता है।
2. FIR दर्ज करने में 8 महीने का विलंब
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि कथित घटना और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के बीच 8 महीने का लंबा अंतराल था। कानून के अनुसार, यौन अपराधों के मामलों में देरी की ठोस वजह बतानी आवश्यक होती है। इस मामले में पुलिस या पीड़िता पक्ष इस देरी का कोई तार्किक कारण पेश नहीं कर सका, जिसे अदालत ने संदेह की दृष्टि से देखा।
3. सह-आरोपी को पहले ही मिल चुकी है जमानत
न्यायालय को बताया गया कि इस मामले के मुख्य सह-आरोपी संजीत सिंह राणा को निचली अदालत (Lower Court) पहले ही जमानत दे चुकी है। चूंकि पीड़िता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और जतिन 28 मार्च 2025 से लगातार जेल में बंद था, इसलिए ‘समानता के सिद्धांत’ (Parity) और जेल की अवधि को देखते हुए उसकी जमानत का आधार मजबूत हो गया।
न्यायालय का आदेश और शर्तें
न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों का संज्ञान लेते हुए आरोपी जतिन का कोई पुराना आपराधिक इतिहास (Criminal History) न होने को भी राहत का आधार माना। हालांकि, जमानत देते समय कोर्ट ने कुछ शर्तें भी स्पष्ट की हैं:
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आरोपी को ट्रायल के दौरान प्रत्येक तारीख पर उपस्थित होना होगा।
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वह पीड़िता या उसके परिवार को किसी भी तरह से डराने या प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा।
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साक्ष्यों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ जमानत निरस्त करने का आधार बन सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि सामूहिक दुष्कर्म जैसे जघन्य मामलों में जब मुख्य गवाह (पीड़िता) ही मुकर जाए, तो अदालत के पास आरोपी को हिरासत में रखने का कोई ठोस आधार नहीं रह जाता। नैनीताल हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि जमानत केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों की विश्वसनीयता और गवाहों की स्थिरता पर टिकी होती है।
खटीमा पुलिस के लिए यह मामला एक बड़ी चुनौती बन गया है, क्योंकि आरोपियों के खिलाफ वैज्ञानिक साक्ष्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) जुटाने की जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है।
खटीमा के इस चर्चित केस में जतिन की रिहाई ने स्थानीय पुलिस की जांच और प्रारंभिक काउंसलिंग पर सवाल खड़े किए हैं। अब सबकी नजरें ट्रायल कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि क्या अभियोजन अन्य साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध कर पाएगा या पीड़िता के बयान बदलने से यह मामला पूरी तरह आरोपियों के पक्ष में चला जाएगा।



