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AIMIM के दिल्ली अध्यक्ष शोएब जमाई का ‘वंदे मातरम’ पर विवादित बोल कहा- ये न संविधान का हिस्सा और न ही राष्ट्रिय गान, सियासी गलियारों में उबाल

The Hill India News
Last updated: February 12, 2026 2:44 am
The Hill India News
Published: February 12, 2026
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नई दिल्ली: देश की राजनीति में अपनी आक्रामक बयानबाजी के लिए पहचानी जाने वाली पार्टी ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ (AIMIM) एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष डॉ. शोएब जमाई द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर दिए गए ताजा बयान ने एक नया संवैधानिक और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। पिछले कुछ हफ्तों में एआईएमआईएम के कई दिग्गजों ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है, उससे न केवल सत्तापक्ष हमलावर है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।

Contents
शोएब जमाई का ‘वंदे मातरम’ पर विवादित रुखशौकत अली का विवादित नारा: “हम दो, हमारे दो दर्जन”अकबरुद्दीन ओवैसी की सीएम योगी को सीधी चुनौतीविवादों की राजनीति: पब्लिसिटी स्टंट या सोची-समझी रणनीति?संवैधानिक मर्यादा और राष्ट्रीय एकता पर असरसमाज का माहौल खराब करने वाली जुबानी जंग

शोएब जमाई का ‘वंदे मातरम’ पर विवादित रुख

डॉ. शोएब जमाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक अत्यंत आक्रामक पोस्ट साझा की है। उन्होंने लिखा, “वंदे मातरम न तो राष्ट्रीय गान (National Anthem) है और न ही संविधान का हिस्सा।” जमाई ने आगे तर्क दिया कि ऐतिहासिक रूप से लोग इसे अपनी मर्जी और आस्था के अनुसार गाते थे, लेकिन भाजपा और आरएसएस ने अब इसे एक राजनीतिक ‘प्रोपेगेंडा’ बना दिया है। उन्होंने तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा, “वे हम पर इसे जबरन थोपना चाहते हैं। तो फिर सुन लो, हमारी गर्दन पर छुरी भी रख दोगे, तब भी हम वंदे मातरम नहीं गाएंगे।” इस बयान के बाद संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को लेकर बहस छिड़ गई है।


शौकत अली का विवादित नारा: “हम दो, हमारे दो दर्जन”

विवादित बयानों की इस कड़ी में केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली भी पीछे नहीं हैं। मुरादाबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए शौकत अली ने जनसंख्या नियंत्रण की नीति पर तंज कसते हुए मुसलमानों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील की।

उन्होंने मंच से कहा, “अल्लाह दे रहे हैं तो ले लीजिए। जिनके बच्चे नहीं होते, वे हर चौखट पर माथा टेकते हैं। अल्लाह जब तक दे रहा है, तब तक लेते रहिए।” शौकत अली ने चीन का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि अधिक आबादी देश को मजबूत बनाती है। उनके “हम दो, हमारे दो दर्जन” वाले बयान की व्यापक निंदा हो रही है, क्योंकि इसे केंद्र सरकार की जनसंख्या नीति के सीधे विरोध और एक विशेष नैरेटिव सेट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।


अकबरुद्दीन ओवैसी की सीएम योगी को सीधी चुनौती

हैदराबाद से विधायक और असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी चुनावी तपिश के बीच माहौल को गरमा दिया है। तेलंगाना के निजामाबाद में एक जनसभा के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधे तौर पर ललकारा।

ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में पार्टी के विस्तार का ऐलान करते हुए कहा, “मिस्टर योगी, तैयार हो जाओ, हम यूपी आ रहे हैं। वहां हम अपनी ताकत दिखाएंगे और अपना झंडा गाड़ेंगे।” जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयान ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देते हैं, जिससे आने वाले चुनावों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका रहती है।


विवादों की राजनीति: पब्लिसिटी स्टंट या सोची-समझी रणनीति?

बीते कुछ समय से AIMIM के शीर्ष नेतृत्व और क्षेत्रीय नेताओं की तरफ से जिस तरह के बयान आ रहे हैं, उसके पीछे राजनीतिक विश्लेषक दो बड़े कारण देखते हैं:

  1. वोट बैंक का ध्रुवीकरण: इस तरह के बयानों से पार्टी खुद को मुस्लिम समुदाय के ‘इकलौते’ मसीहा के रूप में पेश करने की कोशिश करती है।

  2. मीडिया अटेंशन: ‘वंदे मातरम’ या ‘योगी आदित्यनाथ’ जैसे संवेदनशील विषयों पर टिप्पणी करने से पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर तत्काल पब्लिसिटी मिल जाती है।

विशेषज्ञों की राय: राष्ट्रीय स्तर के मीडिया हाउसों का मानना है कि भले ही इन बयानों का मकसद अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाशना हो, लेकिन इस तरह की बयानबाजी से आम जनता की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचती है। इससे समाज में सौहार्द बिगड़ने का खतरा हमेशा बना रहता है।


संवैधानिक मर्यादा और राष्ट्रीय एकता पर असर

संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है और इसे लेकर इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी करना संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी AIMIM नेताओं के इन बयानों की कड़ी निंदा की है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि यह “तुष्टीकरण की पराकाष्ठा” है, जबकि विपक्षी दलों का एक धड़ा इसे भाजपा को फायदा पहुँचाने वाला ‘बी-टीम’ एक्ट बता रहा है।

समाज का माहौल खराब करने वाली जुबानी जंग

राजनीति में विचारों का मतभेद लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन जब यह मतभेद ‘गर्दन पर छुरी’ और ‘दो दर्जन बच्चों’ जैसे विवादित मुहावरों तक पहुँच जाए, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। AIMIM नेताओं के ये बयान केवल राजनीतिक विरोधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये एक बड़े वर्ग की आस्था और राष्ट्रीय गौरव को भी चुनौती दे रहे हैं।

आगामी चुनावों से पहले इस तरह की बयानबाजी पर लगाम लगाना न केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है, बल्कि राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है कि वे विकास की राजनीति करना चाहते हैं या नफरत के बोल के सहारे सत्ता की सीढ़ी चढ़ना चाहते हैं।

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