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The Hill India > Blog > देहरादून > देहरादून में डीएम सविन बंसल का हंटर: DPRO का वेतन रुकते ही सिस्टम की ‘जंग’ हुई साफ, 2 महीने से अटका प्रमाण पत्र 2 दिन में जारी
देहरादूनफीचर्ड

देहरादून में डीएम सविन बंसल का हंटर: DPRO का वेतन रुकते ही सिस्टम की ‘जंग’ हुई साफ, 2 महीने से अटका प्रमाण पत्र 2 दिन में जारी

The Hill India News
Last updated: February 11, 2026 1:31 pm
The Hill India News
Published: February 11, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी में नौकरशाही की सुस्ती और जन समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता पर जिलाधिकारी सविन बंसल ने कड़ा प्रहार किया है। “जब तक डंडा न चले, तब तक फाइल नहीं हिलती”—इस कहावत को चरितार्थ करते हुए देहरादून जिला प्रशासन ने एक बड़ी नजीर पेश की है। मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में बरती गई लापरवाही के चलते डीएम ने जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) का वेतन क्या रोका, महीनों से धूल फांक रही फाइलें अचानक रफ्तार पकड़ने लगीं।

Contents
इठारना शिविर: जहाँ खुली सिस्टम की पोलनिर्देशों की अनदेखी और बढ़ती लापरवाहीजब डीएम ने चलाया ‘वेतन’ का ब्रह्मास्त्रदेर आए दुरुस्त आए: अब बहाल होगा वेतनबड़ा सवाल: क्या डंडे के बिना काम नहीं करेगा तंत्र?पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर

इठारना शिविर: जहाँ खुली सिस्टम की पोल

मामले की शुरुआत 1 दिसंबर 2025 को विकास खंड डोईवाला के ग्राम इठारना (ऋषिकेश तहसील) में आयोजित एक बहुउद्देशीय शिविर से हुई। जिलाधिकारी सविन बंसल खुद जनता की समस्याएं सुन रहे थे। इसी दौरान ग्राम पंचायत गौहरी माफी निवासी प्रदीप सिंह और बलबीर सिंह रावत ने अपनी व्यथा सुनाई।

प्रदीप सिंह अपने स्वर्गीय पिता भगत सिंह का और बलबीर सिंह अपनी स्वर्गीय माता जयवन्ती देवी का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुके थे। शोक संतप्त परिवारों के लिए यह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके उत्तराधिकार और अन्य विधिक कार्यों के लिए अनिवार्य दस्तावेज था।

निर्देशों की अनदेखी और बढ़ती लापरवाही

डीएम के संज्ञान में मामला आने के बाद 18 दिसंबर 2025 को उपजिलाधिकारी ऋषिकेश ने संबंधित विभाग को कार्यवाही के निर्देश दिए। इसके बाद 29 दिसंबर को सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) डोईवाला को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया गया कि तीन दिनों के भीतर इस प्रकरण का निस्तारण करें।

हैरानी की बात यह है कि जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी के स्पष्ट आदेशों के बावजूद पंचायत राज विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। जनवरी बीत गया और फरवरी की शुरुआत हो गई, लेकिन शोकाकुल परिवार सिस्टम की चौखट पर माथा टेकते रहे। प्रशासन की इस कछुआ चाल ने सरकारी दावों और ‘सरल शासन’ की छवि को गहरा धक्का पहुँचाया।

जब डीएम ने चलाया ‘वेतन’ का ब्रह्मास्त्र

जनता की शिकायतों पर हो रही हिलाहवाली से नाराज जिलाधिकारी सविन बंसल ने सख्त रुख अख्तियार किया। उन्होंने सीधे विभाग के मुखिया यानी जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO), देहरादून के वेतन आहरण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। डीएम का आदेश स्पष्ट था— “जब तक गरीब जनता का काम नहीं होगा, तब तक बड़े अधिकारी का वेतन जारी नहीं होगा।”

वेतन रुकने की खबर विभाग में बिजली की तरह दौड़ी। जो काम पिछले दो महीनों से ‘नियमों की पेचीदगियों’ में फंसा था, वह अचानक 48 घंटों के भीतर पूरा हो गया। 8 फरवरी 2026 को संबंधित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी ने दोनों परिवारों को उनके परिजनों के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिए।

देर आए दुरुस्त आए: अब बहाल होगा वेतन

प्रमाण पत्र जारी होने और कार्य के निस्तारण की रिपोर्ट टेबल पर पहुँचने के बाद, जिला प्रशासन ने अब डीपीआरओ के वेतन आहरण की संस्तुति दी है। हालांकि, यह घटना जिले के अन्य विभागों के लिए एक चेतावनी की तरह है। डीएम सविन बंसल ने कड़े लहजे में कहा है कि जनमानस की शिकायतों के निस्तारण में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

बड़ा सवाल: क्या डंडे के बिना काम नहीं करेगा तंत्र?

यह मामला उत्तराखंड की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

  • क्या आम जनता को एक छोटे से प्रमाण पत्र के लिए जिलाधिकारी के हस्तक्षेप का इंतजार करना होगा?

  • जब काम दो दिन में हो सकता था, तो उसे दो महीने तक क्यों लटकाया गया?

  • निचले स्तर के कर्मचारियों की लापरवाही की जिम्मेदारी केवल उच्च अधिकारियों के वेतन रोकने तक सीमित क्यों रहे?

पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर

जिलाधिकारी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी अधिकारी समयबद्ध और पारदर्शी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करें। सरकारी तंत्र में ‘हिलाहवाली’ का कल्चर अब खत्म होना चाहिए। प्रशासन का लक्ष्य जनता की सेवा करना है, न कि उन्हें दफ्तरों के फेरे लगवाना।

इस कार्रवाई के बाद ऋषिकेश और डोईवाला क्षेत्र की जनता में जिला प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ा है। लोग अब इसे ‘बंसल मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ के रूप में देख रहे हैं, जहाँ जवाबदेही तय करने के लिए कड़े फैसले लेने से भी गुरेज नहीं किया जाता।

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