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उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शिक्षकों के चयन वेतनमान की इंक्रीमेंट कटौती पर लगाई रोक, सरकार से मांगा जवाब

नैनीताल: उत्तराखंड के शिक्षा जगत और राजकीय सेवा के कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य के राजकीय इंटर कॉलेजों में कार्यरत 400 से अधिक प्रवक्ताओं (Lecturers) के चयन वेतनमान (Selection Grade) के पुनर्निर्धारण संबंधी सरकारी आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

न्यायमूर्ति रवींद्र मैथानी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा विवाद? (The Selection Grade Increment Controversy)

यह मामला मुख्य रूप से ‘सरकारी सेवक वेतन नियमावली प्रथम संशोधन 2025’ और वित्त सचिव द्वारा जारी 18 दिसंबर 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसने शिक्षकों के वेतन ढांचे को सीधे प्रभावित किया है।

विवाद की जड़:

  • पुरानी नियमावली (2016): मूल नियमावली के अनुसार, प्रवक्ताओं और सहायक अध्यापक (LT Grade) को चयन वेतनमान और प्रोन्नत वेतनमान (Promotional Pay Scale) मिलने पर एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट (Increment) का लाभ मिलता था।

  • संशोधन 2025: राज्य सरकार ने वेतन नियमावली में संशोधन करते हुए इस एक इंक्रीमेंट के लाभ को समाप्त कर दिया।

  • भूतलक्षी प्रभाव (Retrospective Effect): सबसे विवादित पहलू यह रहा कि सरकार ने इस कटौती को 1 जनवरी 2016 से लागू कर दिया। यानी पिछले 9 वर्षों से मिल रहे लाभ को वापस लेने और वेतन के पुनर्निर्धारण का आदेश दिया गया।

कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के तर्क

सुशील तिवारी, धीरेंद्र मिश्रा, विनोद पैन्यूली और शंकर बोरा सहित 400 से अधिक प्रवक्ताओं ने इस संशोधन को ‘मनमाना’ बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रमुख दलीलें दी गईं:

  1. अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन: याचिका में कहा गया कि सरकार का यह कदम संवैधानिक समानता और रोजगार के अवसरों के अधिकारों का उल्लंघन है।

  2. केवल शिक्षा संवर्ग पर निशाना: शिक्षकों का आरोप है कि सरकार ने यह संशोधन मुख्य रूप से शैक्षणिक संवर्ग के कर्मचारियों पर ही लागू किया है, जो कि भेदभावपूर्ण है।

  3. बैक डेट से वसूली का डर: 2016 से नियम लागू करने का अर्थ है कि शिक्षकों को अब तक मिले अतिरिक्त लाभ की रिकवरी (वसूली) हो सकती है या उनके भविष्य के वेतन में भारी कटौती होगी।

  4. कानूनी मिसाल: याचिकाकर्ताओं के अनुसार, राज्य सरकार स्थापित वेतन नियमों को भूतलक्षी प्रभाव से समाप्त नहीं कर सकती, खासकर जब सुप्रीम कोर्ट के कई आदेश इस तरह की कार्रवाई के खिलाफ हैं।


हाईकोर्ट की खंडपीठ का हस्तक्षेप

मामले की गंभीरता और शिक्षकों के हितों को देखते हुए, न्यायमूर्ति रवींद्र मैथानी व न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने वित्त सचिव के 18 दिसंबर 2025 के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक (Stay) लगा दी है।

“अदालत ने स्पष्ट किया है कि वेतन पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया पर अग्रिम आदेशों तक रोक रहेगी। अब इस मामले की विस्तृत सुनवाई अप्रैल माह में होगी।”


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मुख्य कीवर्ड विवरण
हाईकोर्ट रोक चयन वेतनमान पुनर्निर्धारण आदेश पर रोक।
याचिकाकर्ता 400+ प्रवक्ता (राजकीय इंटर कॉलेज)।
संबंधित नियम सरकारी सेवक वेतन नियमावली प्रथम संशोधन 2025।
प्रभावी तिथि 1 जनवरी 2016 (Retrospective)।
अगली सुनवाई अप्रैल 2026।

शिक्षकों के लिए इसके क्या मायने हैं?

हाईकोर्ट के इस ‘स्टे ऑर्डर’ से उन हजारों शिक्षकों को फौरी राहत मिली है, जिनके वेतन में कटौती का खतरा मंडरा रहा था। वेतन पुनर्निर्धारण (Pay Redetermination) रुकने से फिलहाल उनकी सैलरी और एरियर की स्थिति यथावत बनी रहेगी। हालांकि, अंतिम फैसला अप्रैल में होने वाली सुनवाई और सरकार द्वारा दाखिल किए जाने वाले जवाब पर निर्भर करेगा।

शिक्षा विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस कटौती को सही साबित नहीं कर पाती है, तो यह राजकीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ी जीत होगी।


उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह रुख दर्शाता है कि नीतिगत संशोधनों में ‘भूतलक्षी प्रभाव’ (Back-date implementation) को अदालतें आसानी से स्वीकार नहीं करतीं। राजकीय प्रवक्ताओं की यह लड़ाई अब पूरे प्रदेश के कर्मचारी संगठनों के लिए एक मिसाल बन गई है।

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