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I-PAC केस में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ED की रेड के दौरान सीएम ममता बनर्जी के दखल पर उठे गंभीर सवाल

The Hill India News
Last updated: April 22, 2026 10:33 am
The Hill India News
Published: April 22, 2026
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पश्चिम बंगाल से जुड़े चर्चित I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का इस तरह हस्तक्षेप करना पूरे सिस्टम और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

Contents
कोर्ट की टिप्पणी: “सिस्टम को खतरे में डाल दिया गया”“यह केंद्र बनाम राज्य का मामला नहीं”ED का आरोप: सबूतों के साथ छेड़छाड़I-PAC ने रोके अपने ऑपरेशनचुनाव से पहले बड़ा झटकाराजनीतिक और संवैधानिक बहस तेजआगे क्या?

यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) से जुड़े ठिकानों पर की गई छापेमारी से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.के. मिश्रा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह केंद्र और राज्य के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन और संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।

कोर्ट की टिप्पणी: “सिस्टम को खतरे में डाल दिया गया”

सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि देश में ऐसा समय भी आएगा जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री उस स्थान पर पहुंच जाएगा, जहां एक जांच एजेंसी अपना काम कर रही हो। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “आपने पूरे सिस्टम को खतरे में डाल दिया है।” कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इस तरह का हस्तक्षेप न केवल जांच प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।

“यह केंद्र बनाम राज्य का मामला नहीं”

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने यह तर्क दिया कि यह केंद्र और राज्य के अधिकारों से जुड़ा मामला है और ED को सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं है। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यहां किसी राज्य के अधिकार का सवाल ही नहीं उठता। जस्टिस मिश्रा ने पूछा कि जब एक जांच चल रही थी, तब मुख्यमंत्री वहां क्यों पहुंचीं और इससे क्या संदेश जाता है?

ED का आरोप: सबूतों के साथ छेड़छाड़

ED की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण सबूतों को प्रभावित किया गया। उन्होंने कहा कि इस तरह के हस्तक्षेप से जांच एजेंसी के काम में बाधा आती है और निष्पक्ष जांच संभव नहीं रह जाती।

I-PAC ने रोके अपने ऑपरेशन

इसी बीच, इस पूरे विवाद के बीच I-PAC ने पश्चिम बंगाल में अपने सभी ऑपरेशन अस्थायी रूप से रोक दिए हैं। I-PAC की HR टीम द्वारा जारी एक इंटरनल मेल में बताया गया कि कुछ कानूनी कारणों के चलते मैनेजमेंट ने 20 दिनों के लिए काम बंद करने का फैसला लिया है। संगठन ने यह भी कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया में पूरा सहयोग कर रहा है और उसे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है।

चुनाव से पहले बड़ा झटका

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। ऐसे में I-PAC का अपने ऑपरेशन रोकना राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यही कंपनी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनाव प्रचार अभियान को संभाल रही थी।

राजनीतिक और संवैधानिक बहस तेज

इस पूरे मामले ने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है—क्या किसी मुख्यमंत्री को जांच एजेंसी की कार्रवाई के दौरान हस्तक्षेप करना चाहिए? विपक्षी दलों ने इसे कानून के शासन के खिलाफ बताया है, जबकि TMC इसे राजनीतिक साजिश करार दे रही है।

आगे क्या?

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या इस तरह का हस्तक्षेप संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है और क्या इससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हुई है। साथ ही, यह मामला भविष्य में केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों की सीमाओं को भी स्पष्ट कर सकता है।

कुल मिलाकर, I-PAC केस ने न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि पूरे देश में संस्थाओं की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की मजबूती को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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