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पोस्टर-बैनर लगाने पर सख्ती: साइन बोर्ड ढकने पर जेल तक की चेतावनी, उत्तराखंड सरकार को सुप्रीम कोर्ट समिति का निर्देश

देहरादून: उत्तराखंड में सड़कों पर लगने वाले राजनीतिक पोस्टर और बैनर अब कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। अब तक नेताओं के जन्मदिन, स्वागत, पदोन्नति या अन्य अवसरों पर जगह-जगह पोस्टर लगाने की परंपरा आम बात रही है, लेकिन अब इस पर सख्त कार्रवाई की तैयारी है। सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा से जुड़ी समिति ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सड़कों पर लगे ट्रैफिक साइन बोर्ड को ढकने वाले पोस्टर और बैनरों के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएं।

समिति का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां न केवल कानून का उल्लंघन हैं, बल्कि आम जनता की जान के लिए भी खतरा बनती जा रही हैं। अक्सर देखा गया है कि राजनीतिक पोस्टर और बड़े-बड़े होर्डिंग्स ट्रैफिक संकेतकों के ऊपर या उनके सामने लगा दिए जाते हैं, जिससे उनकी दृश्यता प्रभावित होती है। इससे वाहन चालकों को समय पर जरूरी संकेत नहीं मिल पाते और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रैफिक साइन बोर्ड किसी भी सड़क व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। ये संकेतक ड्राइवरों को गति सीमा, मोड़, खतरे, दिशा और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं। खासकर पहाड़ी राज्यों जैसे उत्तराखंड में, जहां सड़कें संकरी और घुमावदार होती हैं, वहां इन संकेतकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में यदि इन संकेतों को पोस्टर या बैनर से ढक दिया जाए, तो यह सीधे तौर पर दुर्घटनाओं को न्योता देने जैसा है।

सुप्रीम कोर्ट समिति के अध्यक्ष जस्टिस अभय मनोहर ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि यह मोटर व्हीकल एक्ट 1988 का उल्लंघन है। कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति सड़क संकेतकों को बाधित करता है या उन्हें ढकता है, तो उसके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसमें छह महीने तक की जेल और आर्थिक जुर्माने का प्रावधान भी शामिल है। यह चेतावनी उन सभी लोगों के लिए है जो सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति पोस्टर और बैनर लगाते हैं।

समिति ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया है कि इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई न बरती जाए। मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को स्पष्ट निर्देश जारी करने के लिए कहा गया है ताकि इस नियम का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके। इसका सीधा मतलब है कि अब प्रशासन इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करेगा और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई तय है।

उत्तराखंड में सड़क हादसों के बढ़ते आंकड़े भी इस फैसले की एक बड़ी वजह हैं। साल 2026 की शुरुआत से अब तक राज्य में 68 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 234 लोग घायल हुए हैं और 4 लोग लापता बताए गए हैं। देहरादून, पिथौरागढ़, टिहरी और नैनीताल जैसे जिलों में दुर्घटनाओं की संख्या ज्यादा है, जो चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क सुरक्षा से जुड़े छोटे-छोटे नियमों की अनदेखी भी बड़े हादसों का कारण बन सकती है।

अक्सर यह देखा गया है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के चलते कार्यकर्ता अधिक से अधिक पोस्टर लगाने की होड़ में लगे रहते हैं। कई बार बिना किसी योजना या अनुमति के ये पोस्टर लगाए जाते हैं, जिससे न केवल शहर की सुंदरता प्रभावित होती है, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था भी बाधित होती है। खासतौर पर ट्रैफिक सिग्नल, रोड साइन और सार्वजनिक सूचना बोर्डों को ढक देना एक गंभीर लापरवाही मानी जा रही है।

सरकार और प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन निर्देशों को जमीन पर कैसे लागू किया जाए। यदि सख्ती से नियम लागू किए जाते हैं, तो निश्चित रूप से इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके लिए स्थानीय निकायों, पुलिस और ट्रैफिक विभाग के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत होगी।

इसके साथ ही आम नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे नियमों का पालन करें। किसी भी नेता के प्रति समर्थन जताने का तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे दूसरों की जान जोखिम में पड़े। सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करते समय कानून और व्यवस्था का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

यह मामला भले ही पोस्टर और बैनर से जुड़ा हुआ दिखता हो, लेकिन इसका सीधा संबंध लोगों की सुरक्षा से है। सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति सुरक्षित रहे, यह सुनिश्चित करना सरकार के साथ-साथ समाज की भी जिम्मेदारी है। ऐसे में जरूरी है कि सभी लोग मिलकर इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएं और नियमों का पालन करें, ताकि सड़क हादसों को कम किया जा सके।

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