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ST टैक्स छूट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: करोड़ों कमाने वाले आदिवासियों पर क्रीमी लेयर लागू करने की मांग खारिज

The Hill India News
Last updated: June 16, 2026 7:53 am
The Hill India News
Published: June 16, 2026
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नई दिल्ली। अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय को मिलने वाली आयकर छूट और अन्य विशेष लाभों को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला सीधे तौर पर विधायी नीति से जुड़ा हुआ है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायपालिका का काम नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी मांग संसद की संबंधित समिति या सरकार के समक्ष रखने की सलाह दी।

Contents
सुनवाई के दौरान क्या हुई बहस?CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?क्या है पूरा विवाद?कोर्ट का रुख क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला उस समय चर्चा में आया जब याचिकाकर्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने मांग की कि अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली आयकर छूट और अन्य विशेष लाभों में भी “क्रीमी लेयर” व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। उनका तर्क था कि आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध हो चुके लोगों को भी लगातार आरक्षण और टैक्स छूट का लाभ मिलना समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।

सुनवाई के दौरान क्या हुई बहस?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष दावा किया कि पूर्वोत्तर भारत के कई आदिवासी समुदायों के लोग धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन चुके हैं और उनके पास बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थान, व्यावसायिक प्रतिष्ठान तथा अन्य संपत्तियां हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की वार्षिक आय करोड़ों रुपये में है, फिर भी वे अनुसूचित जनजाति के नाम पर आयकर छूट और अन्य विशेष सुविधाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कुछ लोगों की संपत्ति 500 करोड़ से 1000 करोड़ रुपये तक की है। उनके कॉलेज, कोल्ड स्टोरेज और बड़े व्यवसाय हैं, लेकिन इसके बावजूद वे आयकर से छूट का लाभ उठाते हैं। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 तथा अनुच्छेद 27 की भावना के विपरीत है।

उन्होंने मांग की कि आर्थिक रूप से सक्षम और संपन्न आदिवासियों को विशेष लाभों से बाहर किया जाए और केवल गरीब तथा जरूरतमंद जनजातीय परिवारों को ही इन सुविधाओं का लाभ मिले। याचिका में यह भी कहा गया कि जो लोग अब पारंपरिक जनजातीय जीवनशैली या संस्कृति का पालन नहीं करते और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत हो चुके हैं, उन्हें भी समान रूप से छूट मिलना न्यायसंगत नहीं है।

CJI सूर्यकांत ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी प्रावधान का कुछ लोगों द्वारा कथित दुरुपयोग किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे समुदाय को संदेह की दृष्टि से देखा जाए।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “केवल इसलिए कि किसी ने किसी प्रावधान का दुरुपयोग किया है, इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लोगों पर संदेह किया जाए।”

उन्होंने आगे कहा कि यह विषय मूल रूप से कानून बनाने और नीति तय करने से संबंधित है, जो संसद और सरकार का क्षेत्राधिकार है। अदालत किसी नीति को बदलने या नई व्यवस्था लागू करने के लिए उचित मंच नहीं है।

CJI ने यह भी कहा कि संसद में विभिन्न स्थायी समितियां और याचिका समितियां होती हैं, जहां कोई भी नागरिक कानून में बदलाव या सुधार के लिए अपनी बात रख सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि इस तरह के मुद्दों से अवगत होंगे और उचित मंच पर इन पर विचार किया जा सकता है।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद का केंद्र पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले उन लोगों को मिलने वाली आयकर छूट है, जिन्हें संविधान और आयकर कानूनों के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। याचिकाकर्ता का कहना था कि समय के साथ इन समुदायों के कुछ लोग अत्यधिक समृद्ध हो गए हैं, लेकिन फिर भी वे उन्हीं सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं जो मूल रूप से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की सहायता के लिए बनाई गई थीं।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि बड़ी संख्या में आदिवासी धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, लेकिन वे अब भी जनजातीय दर्जे के आधार पर मिलने वाली कर छूट का लाभ उठा रहे हैं। हालांकि इस दावे पर अदालत ने कोई टिप्पणी नहीं की और केवल कानूनी पहलुओं तक ही अपने विचार सीमित रखे।

कोर्ट का रुख क्यों महत्वपूर्ण है?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि आरक्षण, कर छूट और सामाजिक कल्याण योजनाओं से जुड़ी नीतियों में बदलाव का अधिकार मुख्य रूप से संसद और सरकार के पास है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नीति निर्माण से जुड़े मामलों में न्यायपालिका सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में अनुसूचित जनजातियों के लिए क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था लागू करने पर कोई गंभीर चर्चा होती है, तो उसका निर्णय संसद में व्यापक बहस और विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही लिया जाएगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को सरकार और संसद की संबंधित समितियों के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दे दी है। इसके साथ ही यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि क्या आर्थिक रूप से संपन्न हो चुके लाभार्थियों को आरक्षण और विशेष कर छूट जैसी सुविधाओं का लाभ मिलता रहना चाहिए या फिर इनके लिए भी आय आधारित सीमाएं तय की जानी चाहिए।

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