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The Hill India > Blog > देश > ‘बहनें नहीं होतीं परिवार की सदस्य’, कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा- भाई की जगह नहीं मिल सकती नौकरी
देशफीचर्ड

‘बहनें नहीं होतीं परिवार की सदस्य’, कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा- भाई की जगह नहीं मिल सकती नौकरी

The Hill India News
Last updated: September 14, 2023 7:16 am
The Hill India News
Published: September 14, 2023
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Image Source: FILE
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कर्नाटक: “बहनें परिवार की सदस्य नहीं होतीं.” यह बात Karnataka High Court कोर्ट ने कही है. एक सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद उसकी बहन ने नौकरी पर दावा किया था. नियमों में अगर किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी के दरमियान मौत होती है तो उसके परिवार के किसी सदस्य को बदले में नौकरी दिए जाने का प्रावधान है. इन्हीं नियमों के तहत बहन ने अपने भाई की मौत के बाद कंपनी से नौकरी की मांग की. कंपनी ने इससे इनकार कर दिया. बहन सेशन कोर्ट गईं लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. बाद में उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया, जहां दो जजों चीफ जस्टिस प्रसन्ना बी वराले और जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित की बेंच ने कहा कि ‘एक बहन अपने भाई के परिवार के डेफिनेशन में शामिल नहीं हैं.’ बेंच ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि ‘ वह बहन है, उसे मृतक के परिवार का हिस्सा नहीं माना जा सकता.’

कोर्ट ने इसके लिए कंपनीज एक्ट 1956 और कंपनीज एक्ट 2013 का हवाला दिया. कंपनी ने बहन को इन्हीं कानूनों के तहत नौकरी देने से इनकार किया था. मामला कर्नाटक के तुमकारु का है, जहां बेंगलुरु इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी लिमिटेड BESCOM के एक कर्मचारी की ड्यूटी के दौरान मौत हो गई. उसकी बहन पल्लवी ने अनुकंपा के आधार पर कंपनी से नौकरी मांगी. कंपनी ने इनकार किया तो वह सेशन कोर्ट पहुंच गईं, जहां एकल जज ने याचिका खारिज कर दी. सेशन कोर्ट के आदेशों को चुनौती देते हुए पल्लवी ने हाई कोर्ट का रुख किया. चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि कोर्ट (परिवार की) परिभाषा की रूपरेखा का विस्तार नहीं कर सकती, जहां नियम बनाने वालों ने पहले से ही अलग-अलग शब्दों में व्यक्तियों को परिवार के सदस्य के रूप में परिभाषित कर रखा है. इस हालात में कोर्ट परिभाषा में एक को जोड़ या हटा नहीं सकती. बेंच ने कहा कि अगर बहन द्वारा दिए गए तर्क को स्वीकार भी किया जाता है तो यह नियमों को फिर से लिखने जैसा होगा.. इसलिए तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

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