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18 साल की लड़की ने पति से मांगा तलाक तो तालिबान की अदालत में क्या हुआ? फैसले से ज्यादा चौंकाने वाली थी महिलाओं पर टिप्पणी

The Hill India News
Last updated: August 25, 2026 5:30 am
The Hill India News
Published: August 25, 2026
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अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान महिलाओं के अधिकारों और न्याय तक उनकी पहुंच को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट में 18 साल की एक युवती के मामले का जिक्र किया गया है, जिसने अपने पति पर महीनों तक मारपीट और दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की। मामला उत्तरी अफगानिस्तान में तालिबान के एक गवर्नर और पूर्व कमांडर अब्दुल्ला सरहदी के सामने पहुंचा। युवती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसने अपना फैसला कर लिया है, लेकिन अदालत में उसकी मांग को जिस तरह संभाला गया, उसने अफगानिस्तान में महिलाओं की न्याय व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए।

Contents
पति पर मारपीट और दुर्व्यवहार का आरोपतलाक की मांग के साथ जुड़ी आर्थिक शर्तअधिकारी ने दिया अलग कमरे का सुझावपति की सहमति के बिना तलाक कितना मुश्किल?तालिबान शासन में महिलाओं की स्थिति पर फिर सवालसिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक जीवन और आवाजाही पर लगातार कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं। छठी कक्षा से आगे लड़कियों की शिक्षा पर रोक, महिलाओं की उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी को सीमित किए जाने के कारण देश में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे माहौल में किसी 18 वर्षीय महिला का अदालत के सामने खड़े होकर अपने विवाह से बाहर निकलने की मांग करना अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण मामला बन जाता है।

पति पर मारपीट और दुर्व्यवहार का आरोप

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, युवती ने तालिबान के अधिकारी के सामने अपने पति के साथ रहने से इनकार करते हुए तलाक की मांग रखी। उसने आरोप लगाया कि उसके पति ने कई महीनों तक उसके साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की। युवती का कहना था कि अगर उसके लिए वैवाहिक जीवन सहने योग्य होता, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटाने यहां नहीं आती।

रिपोर्ट के अनुसार, युवती ने अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने के दौरान यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपना निर्णय ले चुकी है। हालांकि, उसकी बात सुनकर तुरंत तलाक देने के बजाय अधिकारी ने उसे विवाह खत्म न करने के लिए समझाने की कोशिश की।

मामला उस समय और चर्चा में आ गया जब अदालत में मौजूद तालिबान अधिकारी ने महिलाओं को लेकर कथित तौर पर ऐसी टिप्पणी की, जिसे महिलाओं के प्रति बेहद अपमानजनक माना जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी ने महिलाओं को नासमझ और कम अक्ल बताया। वहां मौजूद कुछ पुरुष अधिकारियों, सुरक्षाकर्मियों और बुजुर्गों के हंसने का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है।

तलाक की मांग के साथ जुड़ी आर्थिक शर्त

अफगानिस्तान में विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में धार्मिक और पारंपरिक नियमों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में यदि महिला विवाह खत्म करना चाहती है तो उसे शादी के समय पति या उसके परिवार की ओर से दी गई रकम या अन्य आर्थिक लाभ वापस करने की शर्त का सामना करना पड़ सकता है।

इस मामले में भी आर्थिक विवाद सामने आया। युवती के पति ने कथित तौर पर उस रकम से कई गुना अधिक राशि की मांग की, जिसे लड़की के परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इससे तलाक का मामला केवल पति-पत्नी के बीच विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्थिक शर्तों के कारण भी उलझ गया।

युवती के परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता यह थी कि यदि लड़की पति के साथ वापस जाती है तो उसकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। परिवार ने कथित तौर पर इस बात पर भी सवाल उठाया कि केवल पति को चेतावनी देने से क्या घरेलू हिंसा की समस्या वास्तव में खत्म हो जाएगी।

अधिकारी ने दिया अलग कमरे का सुझाव

रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी ने समाधान के तौर पर कहा कि युवती को पति से अलग अपना कमरा दिया जाना चाहिए। साथ ही पति को चेतावनी देने की बात कही गई कि यदि वह महिला के साथ दोबारा मारपीट करता है तो उसे जेल भेजा जा सकता है।

लेकिन युवती और उसके परिवार की समस्या केवल अलग कमरा मिलने तक सीमित नहीं थी। उनका उद्देश्य विवाह से बाहर निकलना था। परिवार इस बात को लेकर भी असंतुष्ट बताया गया कि युवती की तलाक की मांग पर तत्काल कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हुआ।

बाद में युवती के पिता ने बीबीसी को बताया कि परिवार अदालत के माध्यम से तलाक की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा। इसका अर्थ है कि इस मामले में अंतिम समाधान अभी बाकी था और परिवार को आगे भी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।

पति की सहमति के बिना तलाक कितना मुश्किल?

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तालिबान के शासन में महिलाओं के लिए स्वतंत्र रूप से तलाक हासिल करना आसान नहीं माना जाता। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में पति की सहमति के बिना महिला के लिए विवाह समाप्त कराना मुश्किल हो सकता है।

यही वह बिंदु है जहां इस 18 वर्षीय युवती की कहानी व्यापक सवाल खड़े करती है। यदि कोई महिला अपने पति पर मारपीट और दुर्व्यवहार का आरोप लगाती है और वह विवाह समाप्त करना चाहती है, तो क्या उसे अपनी सुरक्षा और भविष्य को लेकर स्वतंत्र निर्णय लेने का पर्याप्त अधिकार मिलता है?

मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने लंबे समय से अफगानिस्तान में महिलाओं की कानूनी और सामाजिक स्थिति को लेकर चिंता जताई है। शिक्षा और रोजगार से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर आवाजाही तक कई क्षेत्रों में लगाए गए प्रतिबंधों ने महिलाओं के लिए स्वतंत्र जीवन जीना कठिन बना दिया है।

तालिबान शासन में महिलाओं की स्थिति पर फिर सवाल

तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की स्थिति तेजी से बदली है। लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा पर रोक और महिलाओं की उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध ने लाखों छात्राओं के भविष्य को प्रभावित किया। इसके अलावा महिलाओं की नौकरी और सार्वजनिक गतिविधियों में भागीदारी पर भी कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए हैं।

महिलाओं की आवाजाही पर पुरुष अभिभावक से जुड़े नियमों ने भी उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। ऐसे वातावरण में विवाह, घरेलू हिंसा और तलाक जैसे निजी मामलों में महिलाओं के लिए अपनी बात मजबूती से रखना और स्वतंत्र कानूनी सहायता हासिल करना बड़ी चुनौती बन सकता है।

18 साल की इस युवती का मामला इसी व्यापक परिस्थिति की एक झलक पेश करता है। उसने अदालत के सामने खड़े होकर अपने साथ हुए कथित दुर्व्यवहार की बात कही और साफ तौर पर तलाक की इच्छा जाहिर की। लेकिन उसके मामले में तत्काल तलाक का रास्ता नहीं खुला।

सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं

इस मामले को केवल एक परिवार के वैवाहिक विवाद के रूप में देखना आसान होगा, लेकिन इसके पीछे अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों का बड़ा सवाल छिपा है। एक युवा महिला अपने जीवन के बारे में फैसला लेना चाहती है, अपने पति पर हिंसा का आरोप लगाती है और न्याय की उम्मीद में अदालत पहुंचती है। इसके बाद उसे किस तरह का कानूनी संरक्षण मिलता है, यही किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होती है।

इस मामले में सामने आई घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं के लिए सुरक्षा और न्याय की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। यदि महिला विवाह खत्म करना चाहती है, तो क्या उसे बिना दबाव के अपनी बात रखने का अवसर मिलता है? क्या उसके आरोपों की स्वतंत्र जांच होती है? और क्या उसे ऐसा कानूनी रास्ता उपलब्ध है, जिसमें उसकी सुरक्षा और इच्छा को प्राथमिकता दी जाए?

इन सवालों का जवाब इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिखाई देता।

18 साल की इस युवती ने अदालत में खड़े होकर अपने विवाह से बाहर निकलने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उसके लिए न्याय की राह आसान नहीं रही। बीबीसी की रिपोर्ट में सामने आया यह मामला अफगानिस्तान में महिलाओं की कानूनी स्थिति और घरेलू हिंसा से सुरक्षा के सवाल को एक बार फिर सामने लाता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कोई महिला अपने साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाकर अदालत तक पहुंचती है, तो क्या न्याय व्यवस्था उसकी आवाज को उतनी ही गंभीरता से सुनती है, जितनी गंभीरता से उसे सुना जाना चाहिए?

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