अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में आई तेज गिरावट ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह 90 डॉलर प्रति बैरल के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे फिसलकर लगभग 87 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी तेज गिरावट के साथ कारोबार करता दिखाई दिया। वैश्विक बाजार में आई इस नरमी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिलेगी या उपभोक्ताओं को अभी और इंतजार करना होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ रहे सैन्य तनाव का कम होना है। पिछले कुछ सप्ताहों से दोनों देशों के बीच तनाव के कारण मध्य-पूर्व में अस्थिरता बनी हुई थी, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर देखने को मिला। इस दौरान तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के चलते ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था। हालांकि अब हालात में सुधार के संकेत मिलने लगे हैं। सप्ताहांत के दौरान दोनों देशों द्वारा एक-दूसरे पर हमले रोकने और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत शुरू करने की खबरों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया, जिसके बाद तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली।
जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है तो मध्य-पूर्व में तनाव और कम हो सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ वैश्विक तेल आपूर्ति को मिलेगा। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है, वहां जहाजों की आवाजाही सामान्य होने की संभावना बढ़ गई है। यदि इस मार्ग पर किसी प्रकार की बाधा नहीं आती तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव बना रहेगा।
इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार चीन के समर्थन से अमेरिका और ईरान के बीच राजनयिक वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है और उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल आयात पर निर्भर करती है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होना चीन सहित कई बड़े देशों के हित में है। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर शांति स्थापित करने की पहल को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आई गिरावट का असर भारत में तुरंत दिखाई नहीं देगा। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत में तेल कंपनियां पहले से आयात किए गए कच्चे तेल और उसकी लागत के आधार पर मूल्य निर्धारण करती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव कुछ समय बाद देखने को मिलता है। इसलिए केवल एक-दो दिन की गिरावट से पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत कम होने की संभावना नहीं होती।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होना देश के लिए राहत भरी खबर मानी जाती है। इससे भारत का आयात बिल कम हो सकता है, विदेशी मुद्रा पर दबाव घट सकता है और महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है। यदि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे बनी रहती हैं तो तेल विपणन कंपनियां भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती पर विचार कर सकती हैं।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों से तय नहीं होतीं। इसमें केंद्र सरकार द्वारा लगाए जाने वाले उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी), राज्य सरकारों का वैट, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, डीलर कमीशन तथा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए यदि कच्चा तेल सस्ता भी हो जाए, तब भी जरूरी नहीं कि उसी अनुपात में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो जाएं।
फिलहाल 27 जुलाई को देश के प्रमुख शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल ₹102.12 प्रति लीटर और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर बिक रहा है। मुंबई में पेट्रोल ₹111.12 और डीजल ₹97.78 प्रति लीटर है। कोलकाता में पेट्रोल ₹113.43 तथा डीजल ₹99.78 प्रति लीटर दर्ज किया गया है। वहीं चेन्नई में पेट्रोल ₹107.75 और डीजल ₹99.57 प्रति लीटर मिल रहा है। हैदराबाद में पेट्रोल ₹115.69 और डीजल ₹103.82 प्रति लीटर है, जबकि बेंगलुरु में पेट्रोल ₹110.93 और डीजल ₹98.79 प्रति लीटर की दर से उपलब्ध है।
ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव दोबारा नहीं बढ़ता और तेल की आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो आने वाले सप्ताहों में कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है। इसका लाभ भारत जैसे आयातक देशों को मिलेगा। इससे न केवल ईंधन की कीमतों में राहत मिलने की संभावना बनेगी बल्कि परिवहन लागत कम होने से कई उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल आम उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता जरूर हुआ है, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में तत्काल राहत की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। यदि वैश्विक बाजार में यह गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है और अन्य आर्थिक परिस्थितियां भी अनुकूल रहती हैं, तभी घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में कमी देखने को मिल सकती है। इसलिए आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की दिशा और सरकार तथा तेल कंपनियों के फैसलों पर सभी की नजर बनी रहेगी।
