हैदराबाद/कोलकाता। भारतीय क्रिकेट जगत से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। कोलकाता हाई कोर्ट ने भारतीय क्रिकेटर अभिषेक पोरेल से जुड़े कथित रेप मामले में पुलिस को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी क्रिकेटर की तत्काल गिरफ्तारी सुनिश्चित करने और उसके सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त करने का आदेश दिया है। न्यायालय का मानना है कि मामले से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना निष्पक्ष जांच के लिए अत्यंत आवश्यक है।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने पुलिस को निर्देश दिया कि जांच में किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि आरोपी के मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, हार्ड डिस्क, पेन ड्राइव तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस तत्काल कब्जे में लिए जाएं, ताकि यदि उनमें शिकायतकर्ता से जुड़े कोई फोटो, वीडियो या अन्य डिजिटल सामग्री मौजूद हो तो उनके दुरुपयोग की संभावना पूरी तरह समाप्त की जा सके।
यह मामला तब सामने आया जब एक मेडिकल छात्रा ने हुगली जिले के मोगरा पुलिस थाने में क्रिकेटर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि बाद में आरोपी ने उसके साथ मारपीट की, उसे डराया-धमकाया और निजी तस्वीरों को वायरल करने की धमकी देकर मानसिक दबाव बनाया।
शिकायत के अनुसार जून 2026 में दोनों के बीच विवाद बढ़ने के बाद कथित तौर पर महिला के साथ हिंसक व्यवहार किया गया। पीड़िता का आरोप है कि आरोपी ने उसे लगातार धमकाया और निजी तस्वीरों का इस्तेमाल कर ब्लैकमेल करने की कोशिश की। इन आरोपों के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और संबंधित साक्ष्य एकत्र करने की प्रक्रिया तेज कर दी।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि आरोपी के खिलाफ कुल 19 गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें भारतीय न्याय संहिता की कई ऐसी धाराएं भी शामिल हैं जो गैर-जमानती (Non-Bailable) श्रेणी में आती हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तेज गति से होना आवश्यक है ताकि पीड़िता के अधिकारों की रक्षा की जा सके और सभी डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखे जा सकें।
सरकारी पक्ष की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि पुलिस ने मामले से संबंधित एक पेन ड्राइव पहले ही जब्त कर ली है, जो जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती है। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी के पास मौजूद सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को भी तत्काल जब्त किया जाए, जिससे किसी भी फोटो, वीडियो या अन्य निजी सामग्री के लीक होने की आशंका समाप्त हो सके। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान पीड़िता की निजता और सम्मान की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे पूरे मामले की जांच पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ करें। अदालत ने कहा कि यदि डिजिटल साक्ष्यों को समय रहते सुरक्षित नहीं किया गया तो जांच प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसी भी प्रकार की देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की गई है। तब तक पुलिस को जांच की प्रगति रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। अदालत यह भी देखेगी कि उसके निर्देशों का कितना पालन किया गया और जांच किस चरण तक पहुंची है।
यह मामला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य किसी भी आपराधिक जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरण कई मामलों में अहम सबूत साबित होते हैं। इसी कारण अदालत ने इस मामले में भी सभी संभावित डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर विशेष जोर दिया है।
फिलहाल मामले की जांच जारी है और अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। आरोप गंभीर हैं, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार किसी भी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी सिद्ध किए जाने तक आरोपी माना जाता है, दोषी नहीं। अब सभी की नजर पुलिस जांच और आगामी सुनवाई पर टिकी है, जहां प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर मामले की आगे की दिशा तय होगी।
