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Reading: मैथ्स में सिर्फ 51 नंबर, ISRO की नौकरी छोड़ी और रच दिया इतिहास: जानिए भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ के पीछे पवन कुमार चंदना की प्रेरणादायक कहानी
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The Hill India > Blog > देश > मैथ्स में सिर्फ 51 नंबर, ISRO की नौकरी छोड़ी और रच दिया इतिहास: जानिए भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ के पीछे पवन कुमार चंदना की प्रेरणादायक कहानी
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मैथ्स में सिर्फ 51 नंबर, ISRO की नौकरी छोड़ी और रच दिया इतिहास: जानिए भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ के पीछे पवन कुमार चंदना की प्रेरणादायक कहानी

The Hill India News
Last updated: July 18, 2026 4:01 am
The Hill India News
Published: July 18, 2026
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भारत आज अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐसे ऐतिहासिक दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां सरकारी संस्थानों के साथ-साथ निजी कंपनियां भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं। इसी दिशा में भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ का प्रक्षेपण भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक नई शुरुआत माना जा रहा है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के केंद्र में हैं स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) पवन कुमार चंदना, जिनकी सफलता की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। कभी गणित में केवल 51 अंक हासिल करने वाले पवन ने अपनी मेहनत, लगन और तकनीक के प्रति जुनून के दम पर ISRO के वैज्ञानिक से देश की पहली स्पेसटेक यूनिकॉर्न कंपनी के प्रमुख बनने तक का सफर तय किया।

पवन कुमार चंदना का जन्म वर्ष 1991 में हैदराबाद के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही वे किसी टॉपर छात्र की तरह नहीं थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि स्कूल के दिनों में गणित विषय में उनके केवल 51 अंक आए थे। लेकिन उन्होंने कभी इस बात को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। मशीनों, विज्ञान और नई तकनीकों के प्रति उनकी रुचि लगातार बढ़ती रही और यही रुचि आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत बन गई।

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद पवन ने वर्ष 2007 में IIT की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और देश के प्रतिष्ठित IIT खड़गपुर में दाखिला लिया। यहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और बाद में थर्मल इंजीनियरिंग में एमटेक की पढ़ाई पूरी की। IIT में बिताए वर्षों ने उनकी तकनीकी समझ को नई दिशा दी और अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति उनका जुनून और भी मजबूत हो गया।

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 2012 में पवन कुमार चंदना भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, तिरुवनंतपुरम में वैज्ञानिक के रूप में शामिल हुए। यहां उन्होंने भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट GSLV Mk-III के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही रॉकेट बाद में चंद्रयान मिशनों के लिए भी उपयोग में आया। पवन ने GSLV के S-200 सॉलिड बूस्टर के सिस्टम इंजीनियर के रूप में काम किया और स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) परियोजना में डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर की जिम्मेदारी भी संभाली। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2016 में ISRO ने उन्हें दो इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया।

हालांकि ISRO में उनका करियर शानदार था, लेकिन पवन और उनके सहयोगी नागा भरत डाका ने भविष्य की जरूरतों को समय रहते पहचान लिया। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया भर में छोटे उपग्रहों (Small Satellites) की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इनके लिए तेज, सस्ती तथा ऑन-डिमांड लॉन्च सेवाओं की भारी आवश्यकता होगी। इसी सोच ने उन्हें सरकारी नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू करने का साहस दिया।

जून 2018 में दोनों दोस्तों ने हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की। उनका लक्ष्य केवल रॉकेट बनाना नहीं था, बल्कि अंतरिक्ष तक पहुंच को इतना आसान बनाना था कि भविष्य में उपग्रह लॉन्च कराना किसी कैब बुक करने जितना सरल हो जाए। शुरुआत आसान नहीं थी। सीमित संसाधन, नई तकनीक, निवेश जुटाने की चुनौती और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन पवन और उनकी टीम ने लगातार शोध, नवाचार और आत्मविश्वास के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई।

स्काईरूट की पहली बड़ी सफलता 18 नवंबर 2022 को मिली, जब कंपनी ने विक्रम-S नामक भारत का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। इस उपलब्धि के साथ स्काईरूट अंतरिक्ष में रॉकेट भेजने वाली भारत की पहली निजी कंपनी बन गई। इस सफलता ने यह साबित कर दिया कि भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार है।

अब कंपनी का अगला और सबसे महत्वपूर्ण मिशन विक्रम-1 है। यह स्काईरूट का पहला पूर्ण ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है। लगभग 22 मीटर ऊंचे और 1.7 मीटर व्यास वाले इस रॉकेट को आधुनिक कार्बन कंपोजिट संरचना और 3D प्रिंटेड इंजनों की मदद से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित करना है। यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है और इससे भविष्य में निजी स्पेस लॉन्च सेवाओं को नई गति मिलने की उम्मीद है।

स्काईरूट एयरोस्पेस की सफलता ने दुनिया की कई बड़ी निवेश कंपनियों का ध्यान भी आकर्षित किया। ब्लैकरॉक, टेमासेक और GIC जैसी वैश्विक निवेश कंपनियों ने स्काईरूट में निवेश किया। इसके बाद कंपनी का मूल्यांकन एक अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया और स्काईरूट भारत की पहली स्पेसटेक यूनिकॉर्न कंपनी बन गई। यह उपलब्धि भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

पवन कुमार चंदना की उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। उन्हें Forbes 30 Under 30 Asia 2020 की सूची में स्थान मिला। उनकी कंपनी को भारत सरकार की ओर से नेशनल स्टार्टअप अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त हुए। व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उन्होंने वर्ष 2019 में निरुपमा तुंगला से विवाह किया।

पवन कुमार चंदना की कहानी यह साबित करती है कि सफलता केवल परीक्षा के अंकों से तय नहीं होती। यदि किसी व्यक्ति में सीखने की इच्छा, नई सोच, मेहनत और जोखिम उठाने का साहस हो, तो वह असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल कर सकता है। गणित में केवल 51 अंक लाने वाला छात्र आज भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग की सबसे बड़ी उम्मीद बन चुका है।

विक्रम-1 का मिशन केवल एक रॉकेट लॉन्च नहीं है, बल्कि यह भारत की तकनीकी क्षमता, आत्मनिर्भरता और नवाचार की ताकत का प्रतीक है। यदि यह मिशन पूरी तरह सफल होता है, तो भारत वैश्विक स्पेस लॉन्च बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा। साथ ही यह देश के हजारों युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और स्टार्टअप उद्यमियों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा। पवन कुमार चंदना की यह यात्रा इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि सपने देखने वाले ही नहीं, बल्कि उन्हें पूरा करने का साहस रखने वाले लोग इतिहास रचते हैं।

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