इस्लामाबाद: पाकिस्तान की राजनीति में उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फज़ल) यानी JUI-F के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर सीधा हमला बोल दिया। पाकिस्तान जैसे देश में सेना को सबसे ताकतवर संस्था माना जाता है और आमतौर पर कोई भी बड़ा नेता खुले मंच से सेना प्रमुख को चुनौती देने से बचता है। ऐसे माहौल में मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि आसिम मुनीर को राजनीति करने का इतना ही शौक है तो उन्हें पहले अपनी सैन्य वर्दी उतारकर चुनाव लड़ना चाहिए और जनता के बीच जाकर अपनी लोकप्रियता साबित करनी चाहिए। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीति और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच बढ़ते तनाव को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
मौलाना फजलुर रहमान पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में गिने जाते हैं। वे दिवंगत देवबंदी इस्लामी विद्वान और पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती महमूद के पुत्र हैं। पिता के निधन के बाद उन्होंने 1980 के दशक में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की कमान संभाली। बाद में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई और उनके नेतृत्व वाले धड़े को JUI-F के नाम से पहचान मिली। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के पश्तून बहुल इलाकों में उनकी पार्टी का मजबूत जनाधार है। इसके अलावा, देशभर में मदरसों के बड़े नेटवर्क पर भी उनका प्रभाव माना जाता है। फजलुर रहमान सात बार पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के सदस्य रह चुके हैं और लंबे समय से पाकिस्तान की सत्ता की राजनीति में अहम भूमिका निभाते आए हैं।
मौलाना फजलुर रहमान को कट्टरपंथी धार्मिक विचारों का समर्थक माना जाता है। वे पाकिस्तान में इस्लामी शरिया कानून लागू करने के पक्षधर रहे हैं। हालांकि, वे सार्वजनिक रूप से यह भी कहते रहे हैं कि शरिया लागू करने के लिए हिंसा या हथियार उठाना उचित नहीं है। उनकी पार्टी पर लंबे समय से अफगान तालिबान के प्रति वैचारिक समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि तालिबान के अनेक वरिष्ठ नेताओं ने पाकिस्तान में उन्हीं मदरसों से धार्मिक शिक्षा प्राप्त की, जिनका संबंध JUI-F से रहा है। वर्ष 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद मौलाना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तालिबान सरकार को मान्यता देने की अपील भी की थी। इसके अलावा, उनकी तालिबान नेतृत्व के साथ कई मुलाकातें भी चर्चा का विषय रही हैं।
दिलचस्प बात यह है कि आज जिस आसिम मुनीर के खिलाफ मौलाना फजलुर रहमान खुलकर बोल रहे हैं, कभी उनकी नियुक्ति का रास्ता आसान बनाने वाली राजनीतिक परिस्थितियों में भी वे अहम भूमिका निभा चुके हैं। वर्ष 2022 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) नामक विपक्षी गठबंधन बनाया गया था। इस गठबंधन के सर्वसम्मति से अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान ही चुने गए थे। इमरान खान की सरकार गिरने के बाद शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बने और उसी दौरान आसिम मुनीर को पाकिस्तान का सेना प्रमुख नियुक्त किया गया। उस समय मौलाना भी शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा थे।
समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते गए। शहबाज सरकार और मौलाना फजलुर रहमान के बीच कई मुद्दों पर मतभेद सामने आए, जिसके बाद उन्होंने गठबंधन से दूरी बना ली और स्वतंत्र विपक्ष की भूमिका निभानी शुरू कर दी। दूसरी ओर, आसिम मुनीर का प्रभाव लगातार बढ़ता गया। उनका कार्यकाल वर्ष 2027 तक बढ़ाया गया और उन्हें फील्ड मार्शल के पद पर भी पदोन्नत किया गया। इसके बाद पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका को लेकर बहस और तेज हो गई।
हाल ही में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना पर राजनीति में अत्यधिक हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सेना का काम देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा करना है, लेकिन वह राजनीतिक मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल दे रही है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि सेना प्रमुख राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं तो उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए चुनाव लड़ना चाहिए। उनका कहना था कि जनता ही तय करेगी कि किसे समर्थन मिलना चाहिए।
मौलाना ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि बलूचिस्तान में सरकार की पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही है और कई इलाकों में प्रशासन का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। उनके अनुसार, वहां सुरक्षा और शासन व्यवस्था गंभीर संकट का सामना कर रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और सेना सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी समाधान निकालने में विफल रही हैं। साथ ही उन्होंने अफगानिस्तान के भीतर सैन्य कार्रवाई की नीति की भी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे कदम क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकते हैं।
पाकिस्तान में सेना को दशकों से सबसे शक्तिशाली संस्था माना जाता रहा है। देश के राजनीतिक इतिहास में कई बार सैन्य शासन लागू हुआ और लोकतांत्रिक सरकारों पर भी सेना के प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में किसी प्रमुख राजनीतिक या धार्मिक नेता द्वारा सेना प्रमुख पर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी करना बेहद असामान्य माना जाता है। यही कारण है कि मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौलाना के इस बयान के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। एक ओर वे सेना की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाकर विपक्षी राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपने समर्थकों के बीच यह संदेश देना चाहते हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए सेना और राजनीति के बीच स्पष्ट दूरी जरूरी है। हालांकि, उनके आलोचक यह भी याद दिलाते हैं कि अतीत में वे स्वयं उन राजनीतिक गठबंधनों का हिस्सा रहे हैं जिनमें सेना की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे।
फिलहाल पाकिस्तान की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर दिखाई दे रही है। एक समय सत्ता परिवर्तन की रणनीति में साथ दिखाई देने वाले मौलाना फजलुर रहमान और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अब आमने-सामने हैं। आने वाले दिनों में यह टकराव किस दिशा में जाएगा और इसका पाकिस्तान की राजनीति तथा नागरिक-सैन्य संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर पूरे क्षेत्र की नजर बनी हुई है। मौलाना के ताजा बयान ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान में सेना की भूमिका और लोकतांत्रिक राजनीति के बीच चल रही बहस अभी खत्म होने वाली नहीं है।
