
तमिलनाडु की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हालिया चुनाव परिणामों ने पूरे राजनीतिक समीकरण को हिला कर रख दिया है। राज्य में नई सरकार के गठन को लेकर अनिश्चितता और खींचतान लगातार बढ़ती जा रही है। सबसे बड़ी राजनीतिक सरप्राइज अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK का प्रदर्शन रहा, जिसने 108 सीटों पर जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया है। हालांकि यह आंकड़ा प्रभावशाली जरूर है, लेकिन स्पष्ट बहुमत से अभी भी दूर है, जिसके कारण सरकार गठन की तस्वीर धुंधली बनी हुई है।
शुरुआत में राजनीतिक हलकों में यह अनुमान लगाया जा रहा था कि TVK कांग्रेस के सशर्त समर्थन के सहारे सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है। इसी दिशा में पार्टी प्रमुख विजय ने राज्यपाल से दो बार मुलाकात भी की, ताकि सरकार गठन का दावा पेश किया जा सके। लेकिन राज्यपाल ने इस बात पर स्पष्ट रूप से संतोष नहीं जताया कि TVK के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है। इसी वजह से सरकार गठन की प्रक्रिया अभी भी अटकी हुई है और किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा।
इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि तमिलनाडु की दो सबसे बड़ी और ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी पार्टियां—DMK और AIADMK—एक साथ आकर सरकार बनाने पर विचार कर सकती हैं। यह वही दो दल हैं जिन्होंने पिछले लगभग 50 वर्षों से एक-दूसरे के खिलाफ कड़ा राजनीतिक संघर्ष किया है और एक-दूसरे की नीतियों, विचारधारा और नेतृत्व का लगातार विरोध किया है। लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TVK की मजबूत एंट्री ने दोनों पारंपरिक दलों के वोट बैंक और सीटों पर बड़ा असर डाला है। ऐसे में सत्ता से बाहर रहने का खतरा दोनों ही पार्टियों के सामने है। इसी कारण यह संभावना जताई जा रही है कि DMK और AIADMK अपने पुराने मतभेदों को किनारे रखकर एक अस्थायी राजनीतिक समझौता कर सकते हैं, ताकि TVK को सत्ता से दूर रखा जा सके।
यदि ऐसा गठबंधन वास्तव में बनता है, तो यह तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व घटना होगी। दशकों की कटुता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक टकराव के बावजूद दोनों दलों का एक साथ आना राजनीतिक मजबूरी के रूप में देखा जाएगा, न कि किसी वैचारिक मेल के रूप में। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह रणनीतिक होगा, जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ सत्ता संतुलन को अपने पक्ष में करना होगा।
राजनीतिक इतिहास में इस तरह के अप्रत्याशित गठबंधनों के उदाहरण पहले भी देखे गए हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1993 में सपा और बसपा का गठबंधन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जब मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए हाथ मिलाया था। हालांकि वह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सका और बाद में दोनों दलों के बीच गहरी राजनीतिक दरार पैदा हो गई।
इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी सपा और बसपा ने एक बार फिर साथ आने की कोशिश की थी, लेकिन अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद वह गठबंधन भी टूट गया। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति में गठबंधन अक्सर परिस्थितिजन्य होते हैं और स्थायित्व की कमी होती है।
तमिलनाडु में DMK और AIADMK का संभावित गठबंधन भी इसी श्रेणी में देखा जा रहा है। दोनों दलों के बीच वैचारिक दूरी, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और पुरानी राजनीतिक दुश्मनी को देखते हुए यह गठबंधन स्थायी नहीं माना जा रहा, बल्कि एक अल्पकालिक रणनीतिक कदम हो सकता है।
फिलहाल राज्य की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर है। TVK की मजबूत उपस्थिति ने जहां पारंपरिक राजनीतिक ढांचे को चुनौती दी है, वहीं DMK और AIADMK की संभावित नजदीकी ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को और अधिक जटिल बना दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या तमिलनाडु की राजनीति सच में एक ऐतिहासिक गठबंधन की गवाह बनेगी या फिर सत्ता का समीकरण किसी और दिशा में करवट लेगा।



