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15 नवंबर: जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को दी गई थी फांसी — आज़ादी के बाद स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा न्यायिक फैसला

The Hill India News
Last updated: November 15, 2025 6:49 am
The Hill India News
Published: November 15, 2025
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नई दिल्ली, 15 नवंबर। भारतीय इतिहास में 15 नवंबर का दिन एक ऐसे अध्याय से जुड़ा है जिसने देश की न्यायिक, राजनीतिक और नैतिक दिशा को लंबे समय तक प्रभावित किया। इसी दिन वर्ष 1949 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम विनायक गोडसे को फांसी दी गई थी। यह वही घटना थी जिसने नवस्वतंत्र भारत को न्याय, अपराध और राष्ट्रवाद की नई परिभाषाएँ दीं।

Contents
गोडसे— जो कभी गांधी के अनुयायी थे, बाद में विरोधी कैसे बने?30 जनवरी 1948— जब तीन गोलियों ने दुनिया को हिला दियाहत्या के बाद देश में हलचल, गिरफ्तारी और मुकदमागोडसे का बयान — विवादों की आग आज भी जलाता हैसजा का फैसला — स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका का साहसिक निर्णयफांसी के बाद भी नहीं रुका विवाद— आज भी जारी है बहसमहात्मा गांधी का विचार — गोडसे के निर्णय से बड़ा15 नवंबर — एक याद, एक चेतावनी और एक सीख

महात्मा गांधी — जिनके सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति के सिद्धांतों ने न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाई बल्कि दुनिया भर के आंदोलनों को दिशा दी — उनकी हत्या स्वयं स्वतंत्र भारत की सबसे त्रासदीपूर्ण घटनाओं में से एक रही है। भारत भले ही 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त हो गया था, लेकिन स्वतंत्रता का यह उल्लास महज पाँच महीनों में एक गहरे शोक में बदल गया, जब 30 जनवरी 1948 की शाम, नई दिल्ली स्थित बिरला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान तीन गोलियों ने भारत के “राष्ट्रपिता” की सांसें हमेशा के लिए थाम दीं।


गोडसे— जो कभी गांधी के अनुयायी थे, बाद में विरोधी कैसे बने?

नाथूराम गोडसे, पुणे के एक आम परिवार से आने वाले युवक, आरंभिक दिनों में गांधी के विचारों से प्रभावित माने जाते थे। किंतु जैसे-जैसे स्वतंत्रता आंदोलन आगे बढ़ा, गोडसे और उनके साथियों ने गांधी की नीतियों — विशेष रूप से हिंदू–मुस्लिम एकता और पाकिस्तान को स्वीकृति— को राष्ट्र के हितों के विरुद्ध मानना शुरू कर दिया।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, गोडसे को यह लगता था कि गांधी “अत्यधिक उदारता” दिखा रहे हैं और यह उदारता देश को कमजोर कर देगी। विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों ने उनके भीतर आक्रोश को और गहरा किया। यह आक्रोश आखिरकार उस हिंसक निर्णय में बदल गया जिसने भारत की नियति और राजनीति दोनों को बदल दिया।


30 जनवरी 1948— जब तीन गोलियों ने दुनिया को हिला दिया

शाम के लगभग 5 बजकर 17 मिनट।
महात्मा गांधी रोज़ की तरह प्रार्थना सभा के लिए निकले। उनके साथ मनु गांधी और आभा गांधी थीं। तभी भीड़ में छुपकर खड़े गोडसे ने आगे बढ़कर गांधी के सामने झुकने का अभिनय किया और फिर बेहद नजदीक से तीन गोलियाँ दाग दीं।

“हे राम!” — यही गांधी के अंतिम शब्द माने जाते हैं।

यह घटना विश्वभर के लिए एक राजनीतिक भूचाल साबित हुई। नेहरू ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा —
“आज देश के दिल से एक रोशनी चली गई।”


हत्या के बाद देश में हलचल, गिरफ्तारी और मुकदमा

हमले के तुरंत बाद भीड़ ने गोडसे को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। जल्द ही एक बड़ा षड्यंत्र उजागर हुआ, जिसमें नाथूराम गोडसे के साथ—

  • उनके भाई गोपाल गोडसे,
  • नारायण आप्टे,
  • दिगंबर बड़गे सहित कई अन्य लोग शामिल पाए गए।

इस ऐतिहासिक मुकदमे को चर्चित “गांधी हत्या केस” कहा गया, जिसकी सुनवाई विशेष न्यायाधीश अटल बिहारी की अदालत में चली। अभियोजन पक्ष ने गोडसे की योजना, हथियार, गवाहों के बयान और घटनाओं के क्रम से यह साबित किया कि हत्या पूर्वनियोजित थी।


गोडसे का बयान — विवादों की आग आज भी जलाता है

नाथूराम गोडसे ने अदालत में अपने बचाव में एक 90 से अधिक पन्नों का लंबा बयान पढ़ा, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्होंने “देशहित में” यह कदम उठाया। इस बयान को अदालत ने रिकॉर्ड पर तो लिया, लेकिन व्यापक प्रसार पर प्रतिबंध लगा दिया गया ताकि देश में सांप्रदायिक तनाव न बढ़े।

कई इतिहासकारों का मानना है कि गोडसे का बयान एक राजनीतिक और विचारधारात्मक दस्तावेज़ था, जबकि अन्य इसे एक अपराधी की आत्म-औचित्य सिद्ध करने की कोशिश बताते हैं।


सजा का फैसला — स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका का साहसिक निर्णय

8 नवंबर 1949 को अदालत ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई।

अन्य आरोपियों को अलग-अलग अवधि की कैद हुई, जबकि कुछ को बरी कर दिया गया।

सरकार पर भी उस समय दबाव था— कई संगठनों ने फांसी रोकने की मांग की, लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू, गृह मंत्री वल्लभभाई पटेल और कैबिनेट ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के अनुसार अपराध की सजा हर हाल में दी जाएगी।

अंततः 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में सुबह 7:30 बजे गोडसे और आप्टे को फांसी दे दी गई।


फांसी के बाद भी नहीं रुका विवाद— आज भी जारी है बहस

गांधी की हत्या और गोडसे की फांसी के 75 वर्ष बाद भी यह विषय भारतीय राजनीति और समाज में गहरी बहस का कारण बना हुआ है।

  • कुछ समूह गोडसे को राष्ट्रवादी बताने की कोशिश करते हैं।
  • जबकि बड़ी जनसंख्या और अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन्हें गांधी के आदर्शों का विनाशक, सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देने वाला और लोकतंत्र का दुश्मन मानता है।

इतिहासकारों के अनुसार, गांधी की हत्या महज एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि यह भारत के नैतिक मार्गदर्शन पर हमला था। यह इस बात का प्रतीक था कि घृणा और उग्रवाद किस हद तक किसी समाज को नुकसान पहुंचा सकते हैं।


महात्मा गांधी का विचार — गोडसे के निर्णय से बड़ा

समय बीतने के साथ इतिहास ने यह सिद्ध किया कि—

  • हत्या विचारों को नहीं मार सकती,
  • गोलियाँ दर्शन को नहीं रोक सकतीं,
  • और नफरत महान नेताओं को भुला नहीं पाती।

आज दुनिया के कोने-कोने में गांधी की मूर्तियाँ, उनके संदेश और उनकी कार्यशैली हर आंदोलन, हर संघर्ष और हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रेरित करती है।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यदि गांधी जीवित होते, तो शायद वे अपने हत्यारे के लिए भी क्षमा का संदेश देते।


15 नवंबर — एक याद, एक चेतावनी और एक सीख

हर वर्ष 15 नवंबर हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में—

  • असहमति स्वीकार्य है,
  • आलोचना वैध है,
  • लेकिन राजनीतिक हिंसा और हत्या किसी विचारधारा का समाधान नहीं।

महात्मा गांधी की हत्या और गोडसे को मिली फांसी वह अध्याय है जिससे भारत आज भी सीख लेता है —
कि राष्ट्र का निर्माण प्रेम, संवाद और सहनशीलता से होता है, न कि हिंसा से।

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