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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > जंगल से घास-लकड़ी लाकर पिता ने पढ़ाया, बेटी बनीं वैज्ञानिक तो बेटे ने भी रचा इतिहास; अब मनीष बने डिप्टी जेलर
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जंगल से घास-लकड़ी लाकर पिता ने पढ़ाया, बेटी बनीं वैज्ञानिक तो बेटे ने भी रचा इतिहास; अब मनीष बने डिप्टी जेलर

The Hill India News
Last updated: September 26, 2026 5:52 am
The Hill India News
Published: September 26, 2026
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गैरसैंण के डुंगरी गांव के सिरसवाल परिवार की संघर्ष और सफलता की कहानी, 14 किलोमीटर पैदल चलकर पढ़े पिता की मेहनत रंग लाई

गैरसैंण: सफलता की कहानी हमेशा सुविधाओं और संसाधनों से नहीं लिखी जाती। कई बार अभावों के बीच पसीना बहाने वाले माता-पिता की मेहनत, बच्चों की लगन और सपनों को पूरा करने का जुनून ऐसी मिसाल कायम करता है, जिसे वर्षों तक याद किया जाता है। उत्तराखंड के चमोली जिले के गैरसैंण क्षेत्र के डुंगरी गांव के सिरसवाल परिवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। परिवार ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा को अपनी ताकत बनाया और आज इसी संघर्ष की बदौलत परिवार की नई पीढ़ी लगातार सफलता के नए मुकाम हासिल कर रही है।

Contents
गैरसैंण के डुंगरी गांव के सिरसवाल परिवार की संघर्ष और सफलता की कहानी, 14 किलोमीटर पैदल चलकर पढ़े पिता की मेहनत रंग लाईपिता के संघर्ष ने रखी सफलता की नींवबचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहे मनीषबहन भी हैं भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में वरिष्ठ वैज्ञानिकमनीष की सफलता से गांव में खुशी का माहौलपिता बोले- बेटे की सफलता से पूरी हुई वर्षों की तपस्याजनप्रतिनिधियों ने दी मनीष को बधाईयुवाओं के लिए प्रेरणा बनी सिरसवाल परिवार की कहानी

डुंगरी गांव निवासी मनीष सिरसवाल ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की लोअर पीसीएस परीक्षा में सफलता हासिल कर डिप्टी जेलर के पद पर चयनित होकर पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है। मनीष की इस उपलब्धि से उनके गांव और गैरसैंण क्षेत्र में खुशी का माहौल है। परिवार, रिश्तेदारों, शिक्षकों, जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रवासियों ने उन्हें बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।

पिता के संघर्ष ने रखी सफलता की नींव

मनीष की सफलता के पीछे उनके पिता भोला दत्त सिरसवाल के संघर्ष की लंबी कहानी है। भोला दत्त सिरसवाल पेशे से शिक्षक हैं, जबकि उनकी पत्नी दमयंती गृहिणी हैं। बताया जाता है कि भोला दत्त ने खुद बेहद कठिन परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की थी।

पिता का साया कम उम्र में सिर से उठ गया था और परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। ऐसे हालात में पढ़ाई जारी रखना उनके लिए आसान नहीं था। घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्हें खेती-किसानी का काम करना पड़ता था। जंगल से घास और लकड़ी लाना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई को नहीं छोड़ा।

भोला दत्त गांव से गैरसैंण इंटर कॉलेज तक करीब 14 किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने जाया करते थे। एक तरफ घर और खेती की जिम्मेदारियां थीं, तो दूसरी तरफ शिक्षा हासिल करने का जुनून। उन्होंने कठिन मेहनत के दम पर अपनी पढ़ाई पूरी की और आगे चलकर शिक्षक बने।

आज जब उनका बेटा मनीष लोअर पीसीएस परीक्षा पास कर डिप्टी जेलर के पद के लिए चयनित हुआ है, तो पिता के वर्षों पुराने संघर्ष को भी जैसे एक नई पहचान मिल गई है। बेटे की सफलता पर भोला दत्त बेहद उत्साहित हैं। उनका कहना है कि मनीष शुरू से ही मेहनती और मेधावी रहा है।

बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रहे मनीष

मनीष सिरसवाल की शैक्षणिक उपलब्धियां भी उनकी मेहनत और प्रतिभा की गवाही देती हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर गैरसैंण से हुई। इसके बाद कक्षा 6 से 12वीं तक उन्होंने सरस्वती विद्या मंदिर गैरसैंण में पढ़ाई की।

मनीष ने हाईस्कूल की परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल किए और बोर्ड में 18वीं रैंक प्राप्त की। इसके बाद इंटरमीडिएट में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए 90 प्रतिशत अंक हासिल किए।

स्कूली शिक्षा के बाद भी उनका पढ़ाई के प्रति जुनून कम नहीं हुआ। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीएससी ऑनर्स फिजिक्स की पढ़ाई की और करीब 75 प्रतिशत अंक हासिल किए। इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया, जहां उन्होंने 90 प्रतिशत अंक प्राप्त किए।

शैक्षणिक जीवन में लगातार बेहतर प्रदर्शन करने वाले मनीष ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को भी पूरी गंभीरता से लिया। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की लोअर पीसीएस परीक्षा में उनका चयन डिप्टी जेलर के पद पर हो गया।

बहन भी हैं भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में वरिष्ठ वैज्ञानिक

सिरसवाल परिवार की उपलब्धियां सिर्फ मनीष तक सीमित नहीं हैं। इससे पहले उनके परिवार की बेटी निधि सिरसवाल भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। निधि का चयन भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर हुआ था। वर्तमान में वह वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं।

इस तरह एक ही परिवार में एक ओर बेटी का देश के प्रतिष्ठित परमाणु अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक के रूप में सेवाएं देना और दूसरी ओर बेटे का लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर डिप्टी जेलर बनना, क्षेत्र के लिए गर्व की बात है।

सिरसवाल परिवार की कहानी यह भी दिखाती है कि यदि परिवार शिक्षा को प्राथमिकता दे और बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर मिले, तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

मनीष की सफलता से गांव में खुशी का माहौल

मनीष के डिप्टी जेलर बनने की खबर जैसे ही क्षेत्र में पहुंची, बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया। ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों ने इसे पूरे गैरसैंण के लिए गौरव का क्षण बताया। लोगों का कहना है कि मनीष की उपलब्धि क्षेत्र के उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

मनीष की सफलता इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने अपनी शैक्षणिक यात्रा में लगातार मेहनत और अनुशासन को बनाए रखा। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और फिर प्रतियोगी परीक्षा तक उन्होंने अपने प्रदर्शन को बेहतर किया।

पिता बोले- बेटे की सफलता से पूरी हुई वर्षों की तपस्या

मनीष के चयन के बाद उनके पिता भोला दत्त सिरसवाल भावुक भी हैं और गौरवान्वित भी। जिन परिस्थितियों में उन्होंने खुद शिक्षा हासिल की, उन्हीं परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए अपने बच्चों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। जंगल से घास और लकड़ी लाने से लेकर खेती-किसानी और घर के काम तक जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने शिक्षा का महत्व समझा और अपने बच्चों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

आज जब बेटी वैज्ञानिक और बेटा डिप्टी जेलर बन चुका है, तो उनके वर्षों के संघर्ष को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

जनप्रतिनिधियों ने दी मनीष को बधाई

मनीष सिरसवाल की सफलता पर कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र के विधायक अनिल नौटियाल, पूर्व राज्य मंत्री सुरेश कुमार बिष्ट, नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी, ब्लॉक प्रमुख दुर्गा रावत, भाजयुमो जिला अध्यक्ष पंकज गैड़ी, वरिष्ठ पत्रकार प्रेम संगेला, मनीष के भाई एवं वरिष्ठ शिक्षक जगदीश प्रसाद ढौंडियाल सहित कई जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों और क्षेत्रवासियों ने उन्हें बधाई दी है।

सभी ने मनीष की इस उपलब्धि को गैरसैंण और पूरे चमोली क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बताते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

युवाओं के लिए प्रेरणा बनी सिरसवाल परिवार की कहानी

मनीष सिरसवाल की सफलता केवल एक सरकारी पद हासिल करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक पिता ने अभावों के बावजूद शिक्षा का दामन नहीं छोड़ा और अपने बच्चों को आगे बढ़ाया। एक ओर पिता का संघर्ष, दूसरी ओर बच्चों की मेहनत और लगन—इन दोनों ने मिलकर सिरसवाल परिवार को सफलता की नई ऊंचाई तक पहुंचाया है।

गैरसैंण के छोटे से गांव डुंगरी से निकलकर मनीष का डिप्टी जेलर के पद तक पहुंचना उन युवाओं के लिए खास संदेश है, जो संसाधनों की कमी को अपनी मंजिल की राह में सबसे बड़ी बाधा मानते हैं। मनीष की कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, लगातार मेहनत, अनुशासन, शिक्षा और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

आज सिरसवाल परिवार की यह कहानी गैरसैंण से लेकर पूरे चमोली क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। पिता की मेहनत, बेटी की वैज्ञानिक उपलब्धि और बेटे की प्रशासनिक सेवा में सफलता ने परिवार को एक ऐसी पहचान दी है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।

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