क्वानू में महापंचायत और चक्का जाम से गरमाया माहौल, ग्रामीणों ने कहा- बांध से विरोध नहीं, प्रस्तावित स्थल और ऊंचाई पर आपत्ति; मीनस की ओर परियोजना स्थल शिफ्ट करने की मांग
विकासनगर/देहरादून: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर अब स्थानीय ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। दशकों से चर्चा में रही इस परियोजना को लेकर हाल में छह राज्यों के बीच समझौता होने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है। देहरादून जिले के सीमांत क्षेत्र क्वानू में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के प्रभावित गांवों के ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्र हुए और परियोजना के प्रस्तावित स्थल को लेकर विरोध दर्ज कराया। ग्रामीणों ने महापंचायत के साथ प्रदर्शन और चक्का जाम किया तथा प्रशासन के माध्यम से सरकार को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखीं।
ग्रामीणों का कहना है कि उनका विरोध विकास या बांध निर्माण की अवधारणा से नहीं है। उनकी मुख्य आपत्ति किशाऊ बांध के मौजूदा प्रस्तावित स्थल और उसकी ऊंचाई को लेकर है। उनका दावा है कि क्वानू क्षेत्र की उपजाऊ कृषि भूमि, पुश्तैनी जमीन और स्थानीय विरासत इस परियोजना से प्रभावित हो सकती है। ग्रामीणों की मांग है कि सरकार परियोजना स्थल का दोबारा सर्वे कराए और बांध को मौजूदा प्रस्तावित स्थान से आगे मीनस की ओर शिफ्ट करने के विकल्प पर गंभीरता से विचार करे।
‘बांध बनाओ, लेकिन हमारी जमीन की कीमत पर नहीं’
किशाऊ बांध प्रभावित संरक्षक समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने प्रदर्शन के दौरान साफ कहा कि वे परियोजना के पूरी तरह विरोध में नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर बांध राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हित में जरूरी है तो सरकार वैकल्पिक स्थान और तकनीकी विकल्पों पर विचार करे, ताकि स्थानीय आबादी और कृषि भूमि पर कम से कम असर पड़े।
किशाऊ बांध प्रभावित संरक्षक समिति के संरक्षक मुन्ना राणा ने कहा कि ग्रामीणों की मांग सीधी है। उनके मुताबिक, प्रस्तावित क्षेत्र की भौगोलिक और भूगर्भीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने दावा किया कि क्षेत्र में कई जगह जमीन धंसने की स्थिति दिखाई देती है और पहले सुरंग निर्माण से संबंधित प्रयासों में मशीनों के फंसने की घटनाएं भी हुई हैं। उनका आरोप है कि इन परिस्थितियों के बावजूद सरकार को क्षेत्र की वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी नहीं दी गई।
मुन्ना राणा के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्र में करीब 20 गांवों के लोग इस मुद्दे से जुड़े हुए हैं और ग्रामीण चाहते हैं कि सरकार उनकी आपत्तियों को सुने तथा तकनीकी रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे।
ग्रामीणों का सवाल- दशकों से परियोजना, लेकिन हमसे संवाद क्यों नहीं?
प्रभावित संघर्ष समिति के अध्यक्ष सूर्य प्रताप सिंह चौहान ने कहा कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के प्रभावित गांवों के लोग अपनी थाती और माटी को बचाने के लिए एकजुट हुए हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2023 में भी प्रशासन के सामने ग्रामीणों ने अपनी आपत्तियां रखी थीं। उस समय कालसी तहसील में बैठक हुई थी, जिसमें प्रशासन और संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद थे, लेकिन इसके बाद ग्रामीणों के साथ पर्याप्त संवाद नहीं हुआ।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर परियोजना को लेकर प्रभावित परिवारों के साथ शुरुआत से ही नियमित बैठकें की जातीं, सर्वे के नतीजे साझा किए जाते और पुनर्वास तथा मुआवजे की नीति पर पहले चर्चा होती, तो शायद आज इस स्तर का विरोध सामने नहीं आता।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि परियोजना कई दशकों से प्रस्तावित है तो प्रभावित ग्रामीणों को समय रहते पूरी जानकारी क्यों नहीं दी गई। उनके अनुसार, अब जब परियोजना को लेकर सरकारों के बीच समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, तब स्थानीय लोगों को अपनी जमीन और भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी है।
किशाऊ परियोजना आखिर है क्या?
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है। टौंस नदी इस क्षेत्र में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच सीमा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। परियोजना का उद्देश्य सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और बिजली उत्पादन सहित कई जरूरतों को पूरा करना है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित होने और बिजली उत्पादन का भी प्रावधान है।
15 सितंबर 2026 को उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए समझौता हुआ। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने की बात कही है और परियोजना के जल घटक की लागत का करीब 90 प्रतिशत केंद्र द्वारा वहन किए जाने की जानकारी दी गई है।
परियोजना के आधिकारिक विवरण के अनुसार, प्रस्तावित बांध टौंस नदी पर होगा और इससे बड़े पैमाने पर जल भंडारण, सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन का लक्ष्य है। हालांकि, इसी के साथ जमीन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
करीब 2,950 हेक्टेयर भूमि परियोजना के दायरे में
पर्यावरणीय मूल्यांकन से जुड़े दस्तावेजों में परियोजना के लिए लगभग 2,950 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है। इसमें खेती योग्य भूमि के साथ वन भूमि और अन्य श्रेणी की भूमि शामिल है। परियोजना के आधिकारिक विवरण में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कुल 17 गांवों के डूब क्षेत्र में आने तथा हजारों लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है।
यही आंकड़े प्रभावित ग्रामीणों की चिंता का प्रमुख कारण बने हुए हैं। उनका कहना है कि सरकारी कागजों में जमीन केवल एक आंकड़ा हो सकती है, लेकिन उनके लिए यही जमीन पीढ़ियों से आजीविका, संस्कृति और सामाजिक पहचान का आधार रही है।
हिमाचल के ग्रामीण भी आंदोलन में शामिल
किशाऊ परियोजना का प्रभाव केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। टौंस नदी के दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश का सिरमौर क्षेत्र भी परियोजना से प्रभावित होने वाले इलाकों में शामिल है। यही वजह है कि विरोध प्रदर्शन में हिमाचल के प्रभावित ग्रामीणों ने भी भाग लिया।
हिमाचल के प्रभावित ग्रामीण सोहन ठाकुर ने कहा कि विस्थापन के लिए उचित मापदंड तय किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि केवल आर्थिक मुआवजा पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि विस्थापित होने वाले परिवारों की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना होगा। स्थानीय त्योहारों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की मांग भी ग्रामीणों ने उठाई है।
एसडीएम बोले- ग्रामीणों की मांग सरकार तक पहुंचाई जाएगी
मामले को लेकर प्रशासन भी मौके पर पहुंचा। एसडीएम चकराता प्रेम लाल के अनुसार, किशाऊ बांध परियोजना संघर्ष समिति की ओर से प्रदर्शन की सूचना पहले ही दी गई थी। ग्रामीणों ने अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन प्रशासन को सौंपा है।
एसडीएम के अनुसार, क्वानू क्षेत्र बेहद उपजाऊ है और यहां पुरानी विरासत भी जुड़ी हुई है। ग्रामीणों की मुख्य मांग है कि गांव की जमीन और विरासत को परियोजना से नुकसान न हो। उन्होंने बताया कि ग्रामीणों की ओर से बांध स्थल को अटाल की दिशा में करीब 7 से 8 किलोमीटर आगे ले जाने के लिए दोबारा सर्वे कराने की मांग रखी गई है।
आंदोलन और तेज होने की चेतावनी
ग्रामीणों और संघर्ष समिति ने साफ कर दिया है कि यदि उनकी मांगों पर समय रहते गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन को और व्यापक किया जा सकता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन, कृषि भूमि और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए लंबे संघर्ष को तैयार हैं।
क्वानू में हुए प्रदर्शन से यह स्पष्ट है कि किशाऊ परियोजना के सामने अब केवल तकनीकी, वित्तीय और अंतरराज्यीय समझौते की चुनौती नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों की सहमति, पुनर्वास, जमीन और सांस्कृतिक विरासत भी बड़े सवाल बनकर सामने आ गए हैं।
एक तरफ सरकार इस परियोजना को यमुना बेसिन, सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रभावित ग्रामीण अपने गांव और जमीन को बचाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में सरकार और ग्रामीणों के बीच संवाद इस परियोजना की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
