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उत्तराखंडफीचर्ड

NCRB रिपोर्ट: उत्तराखंड में ‘डिजिटल अरेस्ट’ और साइबर ठगी का आतंक, 468 करोड़ की चपत; स्मार्ट पुलिसिंग में राज्य अव्वल

The Hill India News
Last updated: May 11, 2026 1:42 pm
The Hill India News
Published: May 11, 2026
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देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड की शांत वादियों में अब अपराध का स्वरूप बदल रहा है। जहां पारंपरिक अपराधों जैसे हत्या, लूट और डकैती में गिरावट दर्ज की गई है, वहीं अदृश्य साइबर अपराधियों ने राज्य की आर्थिक सुरक्षा में सेंध लगा दी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा वार्षिक रिपोर्ट ने उत्तराखंड पुलिस और आम जनता के लिए खतरे की एक नई घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में साइबर अपराध के मामलों में 17 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसमें ‘डिजिटल अरेस्ट’ सबसे घातक हथियार बनकर उभरा है।

Contents
साइबर ठगी का मायाजाल: 5 साल में 468 करोड़ स्वाहा‘डिजिटल अरेस्ट’: मनोवैज्ञानिक युद्ध और करोड़ों की लूटस्मार्ट होते अपराधी और ठगी के नए पैंतरेस्मार्ट पुलिसिंग: तकनीक से अपराधियों पर वारमहिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी: एक सकारात्मक संकेतसतर्कता ही सुरक्षा का एकमात्र मंत्र

साइबर ठगी का मायाजाल: 5 साल में 468 करोड़ स्वाहा

NCRB के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड में साइबर ठगी ने विकराल रूप धारण कर लिया है। पिछले पांच वर्षों में लगभग 90 हजार लोग इन जालसाजों का शिकार हुए हैं। इस अवधि में प्रदेशवासियों को करीब 468 करोड़ रुपये की चपत लगी है।

आंकड़ों का विश्लेषण करें तो केवल वर्ष 2024 में ही ठगों ने 133 करोड़ रुपये प्रदेश की जनता की जेब से उड़ा लिए। इसका डराने वाला पहलू यह है कि उत्तराखंड में औसतन हर दिन 46 लाख रुपये की ऑनलाइन ठगी हो रही है। वित्तीय धोखाधड़ी के मामले कुल साइबर अपराधों का 70 फीसदी हिस्सा हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अपराधी अब सीधे लोगों की मेहनत की कमाई पर निशाना साध रहे हैं।

‘डिजिटल अरेस्ट’: मनोवैज्ञानिक युद्ध और करोड़ों की लूट

वर्तमान में ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराधियों का सबसे प्रभावी और खतरनाक टूल बन गया है। उत्तराखंड एसटीएफ के एसएसपी अजय सिंह के मुताबिक, अपराधी खुद को CBI, ED, पुलिस या कस्टम अधिकारी बताकर वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालते हैं और उसे यह विश्वास दिला देते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस गया है।

गिरफ्तारी का डर दिखाकर पीड़ितों को घंटों वीडियो कॉल पर ‘डिजिटल कस्टडी’ में रखा जाता है और इसी दौरान उनसे मोटी रकम ट्रांसफर करा ली जाती है। पिछले तीन वर्षों में उत्तराखंड में ऐसे 43 मामले दर्ज हुए, जिनमें 30 करोड़ रुपये की ठगी की गई। इस जाल में सबसे ज्यादा बुजुर्ग, सेवानिवृत्त कर्मचारी और कारोबारी फंस रहे हैं।

स्मार्ट होते अपराधी और ठगी के नए पैंतरे

डिजिटल लेनदेन की बढ़ती सुलभता ने अपराधियों के लिए भी नए द्वार खोल दिए हैं। ऑनलाइन निवेश, ट्रेडिंग फ्रॉड, फर्जी लोन ऐप्स और KYC अपडेट के नाम पर होने वाली ठगी अब आम हो चुकी है। ठग सोशल मीडिया के जरिए लोगों का डेटा जुटाते हैं और फिर उन्हें ‘हाई रिटर्न’ या ‘जीरो परसेंट इंटरेस्ट लोन’ का लालच देकर अपना शिकार बनाते हैं। OLX पर खरीद-बिक्री के नाम पर होने वाले फ्रॉड और फर्जी कस्टमर केयर कॉल्स भी पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए हैं।

स्मार्ट पुलिसिंग: तकनीक से अपराधियों पर वार

चुनौतियों के बीच उत्तराखंड के लिए एक गौरवशाली खबर भी है। स्मार्ट पुलिसिंग और डिजिटल डेटा मैनेजमेंट में उत्तराखंड ने देश के बड़े राज्यों को पछाड़ते हुए शीर्ष स्थान हासिल किया है। ‘वन डेटा वन एंट्री सिस्टम’ और CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) के प्रभावी क्रियान्वयन में राज्य ने 93.46 का स्कोर प्राप्त किया है।

आज उत्तराखंड में एफआईआर से लेकर चार्जशीट तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल हो चुकी है। अपराधियों का रिकॉर्ड ऑनलाइन होने से पुलिस को जांच में गति मिली है। इंटर ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के माध्यम से जांच एजेंसियां आपस में रियल-टाइम डेटा साझा कर रही हैं, जिससे जांच की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी: एक सकारात्मक संकेत

NCRB की रिपोर्ट में राहत की बात यह है कि उत्तराखंड में गंभीर अपराधों के ग्राफ में गिरावट आई है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में 1.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। पुलिस मुख्यालय का मानना है कि प्रदेश के हर थाने में स्थापित ‘महिला हेल्प डेस्क’ और त्वरित कार्रवाई के चलते यह संभव हो पाया है। इसके अतिरिक्त, हत्या और लूट जैसे जघन्य अपराधों में भी 2.4 प्रतिशत की कमी आई है, जो प्रभावी गश्त और पुलिस की सक्रियता का परिणाम है।

सतर्कता ही सुरक्षा का एकमात्र मंत्र

साइबर अपराध अब केवल आर्थिक क्षति नहीं, बल्कि पीड़ितों के लिए मानसिक प्रताड़ना का कारण बन रहे हैं। पुलिस प्रशासन लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है, लेकिन बदलती तकनीक के साथ आम नागरिक का अपडेट रहना अनिवार्य है।

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