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नैनीताल हाईकोर्ट से बड़ा फैसला: बिजली उत्पादन पर ‘वॉटर टैक्स’ को बताया केंद्र का अधिकार क्षेत्र

नैनीताल: उत्तराखंड की नदियों से बिजली पैदा कर रही जल विद्युत परियोजनाओं और राज्य सरकार के बीच लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार जल विद्युत उत्पादन (Generation of Electricity) पर किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं लगा सकती है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यह विषय राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इस पर कर लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास सुरक्षित है।

न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ का निर्णायक मत

सोमवार (27 अप्रैल, 2026) को न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ ने इस मामले में रिफरेंस आदेश पर सुनवाई करते हुए हाइड्रो पावर कंपनियों के पक्ष में अपना फैसला दिया। गौरतलब है कि इस मामले में पूर्व मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की खंडपीठ ने अलग-अलग मत दिए थे, जिसके बाद कानूनी स्पष्टता के लिए इसे न्यायमूर्ति वर्मा की अदालत में भेजा गया था।

अदालत ने अपने फैसले में संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि बिजली उत्पादन पर कर लगाने की शक्ति राज्य विधायिका के पास नहीं है। नैनीताल हाईकोर्ट जल विद्युत टैक्स फैसला आने के बाद अब राज्य की उन उम्मीदों को बड़ा धक्का लगा है, जो राजस्व बढ़ाने के लिए इस अधिनियम पर टिकी थीं।

क्या था विवाद का मुख्य आधार?

मामले की जड़ें साल 2012 में छिपी हैं। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद, नदियों के जल संसाधन का दोहन करने के लिए सरकार ने कई निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आमंत्रित किया था। इन परियोजनाओं के लिए उत्तराखंड सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और बिजली कंपनियों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था।

करार के अनुसार:

  • कुल बिजली उत्पादन का 12 फीसदी हिस्सा उत्तराखंड को ‘रॉयल्टी’ के रूप में मुफ्त मिलना तय हुआ।

  • बाकी बिजली उत्तर प्रदेश को बेची जानी थी।

हालांकि, साल 2012 में उत्तराखंड सरकार ने राजस्व वृद्धि के उद्देश्य से ‘उत्तराखंड विद्युत उत्पादन पर जल कर अधिनियम 2012’ लागू कर दिया। इस कानून के तहत सरकार ने बिजली पैदा करने वाले पानी की मात्रा और वायर की क्षमता के अनुसार 2 से 10 पैसा प्रति यूनिट तक टैक्स वसूलना शुरू कर दिया।

दिग्गज कंपनियों ने दी थी चुनौती

सरकार के इस फैसले के खिलाफ देश की बड़ी हाइड्रो पावर कंपनियों ने मोर्चा खोल दिया। इनमें अलकनंदा पावर प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड, टीएचडीसी (THDC), एनएचपीसी (NHPC), स्वाति पावर प्रोजेक्ट, भिलंगना हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और जयप्रकाश पावर वेंचर्स लिमिटेड (JPVL) जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल थीं। इन कंपनियों का तर्क था कि चूंकि वे पहले से ही 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली दे रहे हैं, इसलिए उन पर अतिरिक्त वॉटर टैक्स लगाना असंवैधानिक और दोहरी मार है।

शुरुआती दौर में हाईकोर्ट की एक एकलपीठ ने कंपनियों की याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि सरकार को ऐसा कानून बनाने का अधिकार है और यह टैक्स पानी के उपयोग पर नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन की प्रक्रिया पर है। इसी आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी गई थी, जहां से मामला आज के ऐतिहासिक निर्णय तक पहुँचा।

संवैधानिक प्रावधान और राज्य का अधिकार क्षेत्र

अदालत में सुनवाई के दौरान मुख्य बहस इस बात पर थी कि क्या राज्य सरकार को ‘उत्पादन’ पर कर लगाने का विधायी अधिकार है? भारतीय संविधान की अनुसूचियों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा ने स्पष्ट किया कि ‘विद्युत उत्पादन’ से जुड़ा विषय केंद्रीय सूची का हिस्सा है।

अदालत ने माना कि:

  1. राज्य सरकार पानी की आपूर्ति या सिंचाई पर उपकर (Cess) तो लगा सकती है, लेकिन जब बात बिजली उत्पादन की प्रक्रिया की आती है, तो वह राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाता है।

  2. इस प्रकार का टैक्स लगाना संघीय ढांचे के खिलाफ है।

नैनीताल हाईकोर्ट जल विद्युत टैक्स फैसला आने के बाद अब उन करोड़ों रुपयों की वसूली पर भी सवालिया निशान लग गया है, जो राज्य सरकार ने इस अधिनियम के माध्यम से कंपनियों से वसूलने की योजना बनाई थी।

कंपनियों और राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

यह निर्णय जल विद्युत क्षेत्र की कंपनियों के लिए एक बड़ी संजीवनी माना जा रहा है। पिछले कई वर्षों से ये परियोजनाएं वित्तीय दबाव और कानूनी अनिश्चितता का सामना कर रही थीं। बिजली कंपनियों का कहना था कि अतिरिक्त टैक्स के कारण बिजली की दरें बढ़ जाती हैं, जिससे अंततः उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ता है।

दूसरी ओर, उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए, जो राजस्व के लिए अपने प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, यह फैसला एक बड़ा वित्तीय नुकसान हो सकता है। अब राज्य सरकार के पास इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने का विकल्प शेष है।

नैनीताल हाईकोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि राज्य सरकारों को कानून बनाते समय अपनी संवैधानिक सीमाओं का विशेष ध्यान रखना होगा। नैनीताल हाईकोर्ट जल विद्युत टैक्स फैसला न केवल उत्तराखंड बल्कि अन्य उन राज्यों के लिए भी एक नजीर साबित होगा, जहाँ नदियाँ राजस्व का मुख्य स्रोत हैं और जहाँ राज्य सरकारें बिजली उत्पादन पर उपकर लगाने का प्रयास कर रही हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है—क्या वह इस फैसले को स्वीकार कर नई नीति बनाएगी या देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाएगी?

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