By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
The Hill IndiaThe Hill IndiaThe Hill India
Notification Show More
Font ResizerAa
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Reading: देश में दूध का उत्पादन 248 मिलियन टन, फिर भी क्यों उठ रहे मिलावट के सवाल? मांग, खपत और नकली डेयरी उत्पादों का पूरा गणित
Share
Font ResizerAa
The Hill IndiaThe Hill India
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Search
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Have an existing account? Sign In
Follow US
The Hill India > Blog > देश > देश में दूध का उत्पादन 248 मिलियन टन, फिर भी क्यों उठ रहे मिलावट के सवाल? मांग, खपत और नकली डेयरी उत्पादों का पूरा गणित
देशफीचर्ड

देश में दूध का उत्पादन 248 मिलियन टन, फिर भी क्यों उठ रहे मिलावट के सवाल? मांग, खपत और नकली डेयरी उत्पादों का पूरा गणित

The Hill India News
Last updated: August 17, 2026 9:32 am
The Hill India News
Published: August 17, 2026
Share
SHARE

भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। देश में दूध का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और 2024-25 में यह करीब 247.87 मिलियन टन तक पहुंच गया। इसके बावजूद बाजार में दूध, पनीर, घी और दूसरे डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कहीं नकली दूध की शिकायत सामने आती है, तो कहीं सिंथेटिक पनीर और मिलावटी घी के मामले पकड़े जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में दूध उत्पादन के बावजूद मिलावट का कारोबार क्यों फल-फूल रहा है? क्या वास्तव में देश में दूध की मांग और आपूर्ति के बीच कोई बड़ा अंतर है, या फिर समस्या उत्पादन से ज्यादा सप्लाई चेन, गुणवत्ता नियंत्रण और मिलावटखोरी की है?

Contents
1950 में 17 मिलियन टन से 2025 में 248 मिलियन टन तक पहुंचा उत्पादनक्या देश में दूध की खपत उत्पादन से ज्यादा है?पांच राज्यों के पास देश के आधे से ज्यादा दूध उत्पादन की ताकतपंजाब में सबसे ज्यादा दूध की खपत, उत्तराखंड भी आगेअसली चिंता दूध से ज्यादा पनीर और घी की बढ़ती मांगनकली पनीर का खेल कितना खतरनाक?घी का कारोबार भी क्यों बना मिलावटखोरों के निशाने पर?सिंथेटिक दूध आखिर क्यों बनाया जाता है?मिलावट का सबसे बड़ा नुकसान आम उपभोक्ता कोक्या दूध की कमी ही मिलावट की मुख्य वजह है?भारत सिर्फ दूध और डेयरी उत्पादों का उपभोक्ता नहीं, निर्यातक भी हैआगे क्या होना चाहिए?

भारत में दूध सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की रोजमर्रा की जरूरत है। सुबह की चाय से लेकर बच्चों के नाश्ते, मिठाइयों, दही, पनीर, घी और तमाम खाद्य उत्पादों तक दूध की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि देश में दूध की मांग लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे शहरों का विस्तार हो रहा है, होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई की दुकानें, चाय की दुकानें और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे डेयरी उत्पादों की खपत भी बढ़ रही है।

1950 में 17 मिलियन टन से 2025 में 248 मिलियन टन तक पहुंचा उत्पादन

भारत के डेयरी सेक्टर की तस्वीर पिछले सात दशकों में पूरी तरह बदल गई है। 1950 में देश में दूध का उत्पादन करीब 17 मिलियन टन था। इसके बाद श्वेत क्रांति और डेयरी क्षेत्र में हुए बड़े बदलावों ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना दिया।

2023-24 में देश में दूध का उत्पादन करीब 239.30 मिलियन टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 247.87 मिलियन टन हो गया। यानी एक साल में उत्पादन में लगभग 3.58 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता भी बढ़कर करीब 485 ग्राम प्रतिदिन तक पहुंच गई।

पहली नजर में ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में दूध की कमी नहीं होनी चाहिए। लेकिन असली तस्वीर समझने के लिए केवल कुल उत्पादन का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है। दूध का इस्तेमाल सिर्फ सीधे पीने के लिए नहीं होता। इसका बड़ा हिस्सा दही, पनीर, घी, मक्खन, मिल्क पाउडर, मिठाई और दूसरे डेयरी उत्पादों में चला जाता है। इसके अलावा होटल, रेस्टोरेंट, चाय की दुकानों और फूड प्रोसेसिंग उद्योग में भी बड़ी मात्रा में दूध की जरूरत होती है।

यहीं से दूध की उपलब्धता और उसकी वास्तविक मांग का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्या देश में दूध की खपत उत्पादन से ज्यादा है?

इस सवाल का जवाब सीधे-सीधे ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना सही नहीं होगा। सरकार कुल दूध उत्पादन का आंकड़ा जारी करती है, लेकिन कुल घरेलू खपत के लिए हर साल उसी तरह का एकल आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं होता। Household Consumption Expenditure Survey के आंकड़ों से घरेलू स्तर पर दूध की खपत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति औसत मासिक दूध खपत करीब 5.085 लीटर और शहरी क्षेत्रों में करीब 5.686 लीटर थी। यानी घरेलू स्तर पर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति दूध की औसत खपत लगभग 170 से 190 मिलीलीटर के आसपास बैठती है।

लेकिन इस आंकड़े में होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई की दुकान, चाय की दुकान, डेयरी उद्योग और फूड प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाले दूध को सीधे जोड़ना आसान नहीं है। इसलिए केवल घरेलू खपत और कुल उत्पादन की तुलना करके यह निष्कर्ष निकालना कि देश में दूध की भारी कमी है और उसी वजह से मिलावट हो रही है, पूरी तस्वीर नहीं बताता।

असल चुनौती यह है कि दूध और डेयरी उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है और बाजार में हर जगह समान गुणवत्ता वाला असली उत्पाद पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

पांच राज्यों के पास देश के आधे से ज्यादा दूध उत्पादन की ताकत

भारत में दूध उत्पादन का वितरण भी समान नहीं है। कुछ राज्य देश के कुल उत्पादन में बहुत बड़ा योगदान देते हैं।

उत्तर प्रदेश करीब 15.6 फीसदी हिस्सेदारी के साथ देश में सबसे बड़ा दूध उत्पादक राज्य है। इसके बाद राजस्थान की करीब 14.8 फीसदी, मध्य प्रदेश की 9.1 फीसदी, गुजरात की 7.7 फीसदी और महाराष्ट्र की करीब 6.7 फीसदी हिस्सेदारी बताई जाती है।

इन पांच राज्यों को मिलाकर देश के कुल दूध उत्पादन में आधे से ज्यादा योगदान आता है। इसका मतलब यह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में दूध की उपलब्धता और सप्लाई का स्वरूप अलग हो सकता है। जहां उत्पादन अधिक है, वहां से दूध दूसरे राज्यों और बड़े शहरों तक पहुंचता है। इस लंबी सप्लाई चेन में कलेक्शन, परिवहन, ठंडा रखने, प्रोसेसिंग और पैकेजिंग जैसी कई प्रक्रियाएं शामिल होती हैं।

यही सप्लाई चेन अगर कमजोर हो, तो दूध की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

पंजाब में सबसे ज्यादा दूध की खपत, उत्तराखंड भी आगे

राज्यवार प्रति व्यक्ति दूध खपत के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब सबसे ऊपर दिखाई देता है। यहां प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसत दूध खपत करीब 1245 ग्राम बताई गई है। राजस्थान में यह आंकड़ा करीब 1171 ग्राम और हरियाणा में करीब 1105 ग्राम है।

इसके बाद आंध्र प्रदेश में करीब 719 ग्राम, गुजरात में 700 ग्राम, मध्य प्रदेश में 673 ग्राम और हिमाचल प्रदेश में 640 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की खपत बताई गई है।

जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा करीब 577 ग्राम, कर्नाटक में 543 ग्राम और उत्तर प्रदेश में 450 ग्राम है। उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की औसत खपत करीब 446 ग्राम बताई गई है।

इससे साफ है कि भारत में दूध की खपत राज्यों के हिसाब से काफी अलग है। कुछ राज्यों में दूध दैनिक आहार का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है, जबकि कुछ राज्यों में इसकी औसत खपत तुलनात्मक रूप से कम है।

असली चिंता दूध से ज्यादा पनीर और घी की बढ़ती मांग

दूध की कहानी सिर्फ एक गिलास दूध तक सीमित नहीं है। आज भारतीय बाजार में पनीर, घी, मक्खन, दही और दूसरे डेयरी उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। खासतौर पर शहरों में पनीर की खपत ने डेयरी बाजार को नया आकार दिया है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े पनीर उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। उपलब्ध बाजार अनुमानों के मुताबिक 2023 में भारत का पनीर बाजार करीब 570 अरब रुपये का था और इसके 2030 तक बढ़कर लगभग 1,848 अरब रुपये होने का अनुमान लगाया गया है।

इतने बड़े और तेजी से बढ़ते बाजार में मुनाफा भी बड़ा है। यही कारण है कि कुछ असामाजिक तत्व कम लागत में ज्यादा उत्पादन करने के लिए दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट का रास्ता अपनाते हैं।

नकली पनीर का खेल कितना खतरनाक?

पनीर बनाने में दूध की जरूरत होती है और अच्छी गुणवत्ता वाले दूध की कीमत भी होती है। दूसरी तरफ बाजार में पनीर की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कुछ मिलावटखोर लागत घटाने के लिए पनीर में स्टार्च जैसे पदार्थ मिलाकर उसका वजन बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

कुछ मामलों में सिंथेटिक दूध या अन्य गैर-मानक सामग्री के इस्तेमाल की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। डिटर्जेंट, कॉस्टिक सोडा और फॉर्मलिन जैसे खतरनाक रसायनों के इस्तेमाल की खबरें भी समय-समय पर सामने आई हैं। हालांकि हर नमूने में ऐसी सामग्री मिलने का दावा करना सही नहीं होगा, लेकिन जहां खाद्य सुरक्षा जांच में असुरक्षित या मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए नमूने सामने आते हैं, वहां चिंता गंभीर हो जाती है।

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में पिछले साल जांचे गए 122 पनीर सैंपल में बड़ी संख्या में नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार करीब 83 फीसदी नमूने मानकों के अनुरूप नहीं थे, जबकि करीब 40 फीसदी नमूने असुरक्षित पाए गए।

कर्नाटक में भी बड़ी संख्या में पनीर सैंपल की जांच के दौरान बेहद खराब तस्वीर सामने आने की रिपोर्ट आई। इसी तरह लखनऊ में जांच किए गए नमूनों में भी बड़ी संख्या में सैंपल असुरक्षित पाए गए थे।

ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि बाजार में बिकने वाला हर पनीर नकली है, लेकिन यह जरूर बताते हैं कि डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता जांच और निगरानी को और मजबूत करने की जरूरत है।

घी का कारोबार भी क्यों बना मिलावटखोरों के निशाने पर?

भारत में घी की मांग सदियों पुरानी है। धार्मिक आयोजनों से लेकर घर के भोजन और मिठाई उद्योग तक घी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। भारत दुनिया में घी उत्पादन का प्रमुख केंद्र है और वैश्विक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

घी का बाजार भी लगातार बढ़ रहा है। उपलब्ध बाजार अनुमानों के मुताबिक 2024 में भारत में घी का कारोबार करीब 3.48 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर था और आने वाले वर्षों में इसके और तेजी से बढ़ने का अनुमान है।

यहीं मिलावटखोरों की नजर भी पड़ती है। असली दूध से बने घी की लागत अधिक होती है, जबकि सस्ते वनस्पति तेल या अन्य वसा का इस्तेमाल करके नकली या मिलावटी घी तैयार करने पर लागत कम की जा सकती है।

FSSAI से जुड़े अनुमानों में समय-समय पर घी में मिलावट को लेकर चिंता जताई गई है। हालांकि किसी एक आंकड़े के आधार पर यह कहना कि देश के कुल घी कारोबार का निश्चित 15 से 20 फीसदी हिस्सा नकली है, सावधानी के साथ ही किया जाना चाहिए। फिर भी नकली घी का कारोबार कितना बड़ा हो सकता है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बड़े बाजार में छोटी प्रतिशत हिस्सेदारी भी हजारों करोड़ रुपये का कारोबार बन जाती है।

सिंथेटिक दूध आखिर क्यों बनाया जाता है?

मिलावटखोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण अक्सर कम लागत और ज्यादा मुनाफा होता है। असली दूध तैयार करने के लिए पशुपालन, चारा, पशु स्वास्थ्य, दूध संग्रहण, ठंडा रखने और परिवहन पर खर्च होता है। वहीं नकली या सिंथेटिक दूध बनाने की कोशिश में कुछ लोग ऐसे पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं जो दूध जैसा रंग, गाढ़ापन या स्वाद देने की कोशिश करते हैं।

ऐसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। खासकर तब, जब उनमें ऐसे रसायन या पदार्थ मौजूद हों जो खाद्य उपयोग के लिए सुरक्षित नहीं हैं।

लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि बाजार में हर कम गुणवत्ता वाला दूध ‘सिंथेटिक दूध’ नहीं होता। कई बार दूध में पानी मिलाना, फैट या अन्य गुणवत्ता मानकों में कमी भी मिलावट या गैर-मानक उत्पाद की श्रेणी में आ सकती है। इसलिए किसी उत्पाद को नकली घोषित करने के लिए वैज्ञानिक लैब जांच जरूरी है।

मिलावट का सबसे बड़ा नुकसान आम उपभोक्ता को

मिलावटखोरी का असर सिर्फ जेब पर नहीं पड़ता, बल्कि स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। दूध और उससे बने उत्पाद बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के लगभग हर सदस्य के भोजन का हिस्सा होते हैं।

अगर किसी उत्पाद में गैर-खाद्य रसायन या असुरक्षित पदार्थ मौजूद हैं, तो उसका सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी सिर्फ छापेमारी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नियमित सैंपलिंग, आधुनिक लैब टेस्टिंग, सप्लाई चेन की निगरानी और दोषी कारोबारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी जरूरी है।

क्या दूध की कमी ही मिलावट की मुख्य वजह है?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह कहना कि भारत में कुल दूध उत्पादन मांग से कम है और इसलिए पूरा बाजार नकली दूध से चल रहा है, वैज्ञानिक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

भारत का दूध उत्पादन दुनिया में सबसे अधिक है और उत्पादन लगातार बढ़ भी रहा है। समस्या यह है कि दूध का इस्तेमाल कई अलग-अलग रूपों में होता है। इसके अलावा उत्पादन और उपभोग का भौगोलिक वितरण भी अलग है। एक राज्य में उत्पादन ज्यादा हो सकता है, लेकिन दूसरे राज्य में मांग ज्यादा हो सकती है।

इसके साथ ही दूध से पनीर, घी, मक्खन, दही और मिल्क पाउडर जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। इसलिए कुल दूध उत्पादन की तुलना केवल तरल दूध की खपत से करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

मिलावट की असली वजहों में बढ़ती मांग, कीमतों का दबाव, कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश, कमजोर निगरानी और कुछ मामलों में आपूर्ति श्रृंखला की खामियां शामिल हो सकती हैं।

भारत सिर्फ दूध और डेयरी उत्पादों का उपभोक्ता नहीं, निर्यातक भी है

भारत की डेयरी कहानी केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है। भारत डेयरी उत्पादों का निर्यात भी करता है। मध्य पूर्व और एशिया के कई देशों में भारतीय डेयरी उत्पादों की मांग है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान जैसे देशों में भारतीय घी और अन्य डेयरी उत्पादों की पहचान है।

बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के साथ भी डेयरी उत्पादों का व्यापार होता है। अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, नाइजीरिया और मिस्र जैसे बाजार भी भारतीय डेयरी उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसका मतलब है कि भारत का डेयरी उद्योग केवल घरेलू जरूरत पूरी करने वाला सेक्टर नहीं, बल्कि बड़ा आर्थिक क्षेत्र भी बन चुका है।

आगे क्या होना चाहिए?

दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि जांच व्यवस्था को और मजबूत किया जाए। हर शहर और जिले में पर्याप्त संख्या में खाद्य नमूनों की जांच होनी चाहिए। मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बाजार से तुरंत सैंपल लेकर प्रारंभिक जांच की जा सके।

इसके अलावा उपभोक्ताओं को भी जागरूक करना जरूरी है। केवल सस्ता उत्पाद देखकर खरीदारी करने के बजाय भरोसेमंद ब्रांड, पैकेजिंग, लाइसेंस और गुणवत्ता संबंधी जानकारी पर ध्यान देना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में दूध की कहानी सिर्फ ‘उत्पादन बनाम मांग’ की कहानी नहीं है। यह उत्पादन, वितरण, प्रोसेसिंग, गुणवत्ता, कीमत और उपभोक्ता सुरक्षा—इन सभी का संयुक्त गणित है।

247.87 मिलियन टन से ज्यादा दूध का उत्पादन करने वाला देश अगर मिलावट की समस्या से जूझ रहा है, तो चुनौती दूध पैदा करने की क्षमता से ज्यादा यह सुनिश्चित करने की है कि खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने वाला हर लीटर दूध और उससे बना हर उत्पाद सुरक्षित और मानकों के अनुरूप हो।

आखिरकार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश में कितना दूध पैदा हो रहा है। असली सवाल यह है कि जो दूध, पनीर और घी हम खरीद रहे हैं, उसमें हमें वास्तव में कितना शुद्ध और सुरक्षित खाद्य मिल रहा है? यही सवाल आने वाले वर्षों में भारत के तेजी से बढ़ते डेयरी बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।

You Might Also Like

Bengaluru: कर्नाटक सरकार में मंत्रिमंडल का विस्तार आज, 24 विधायक मंत्री पद की शपथ लेंगे
गिरफ्तारी के बाद अब क्या है केजरीवाल के पास रास्ता? आज किया जाएगा कोर्ट में पेश
थराली आपदा: बादल फटने से तबाही, सीएम धामी ने जताया दुख – राहत एवं बचाव कार्य जारी
सरकारी भूमि पर अतिक्रमण रोकने को लेकर सीएम धामी सख्त, मजबूत मैकेनिज्म बनाने के निर्देश
उत्तराखण्ड : पीसीएस मुख्य परीक्षा के अभ्यर्थी आज अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी से मिले
TAGGED:Dairy ProductsFake GheeFake Paneerfood safetyFSSAI
Share This Article
Facebook Email Print
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
YoutubeSubscribe
TelegramFollow
Popular News
उत्तराखंडफीचर्ड

हाईवे पर हाथियों का तांडव! शिक्षकों से भरे टेंपो ट्रैवलर को घेरा, वाहन तहस-नहस; ढाई घंटे तक थमा रहा ट्रैफिक

The Hill India News
The Hill India News
August 17, 2026
परवादून कांग्रेस की नई टीम ने संभाली कमान, पहली बैठक में बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने का संकल्प; जनसरोकारों के मुद्दे उठाने पर जोर
उत्तराखंड के तीरथ सिंह रावत को BJP की नई टीम में बड़ी जिम्मेदारी, नितिन नवीन की टीम में मिली अहम जगह
BJP की नई टीम में बड़ा बदलाव: वसुंधरा राजे और राम माधव की वापसी, स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी
E20 पर फिर छिड़ी जंग! 8 करोड़ पुराने वाहनों के लिए E10 की मांग, CEA के सुझाव से गरमाई बहस
देश में दूध का उत्पादन 248 मिलियन टन, फिर भी क्यों उठ रहे मिलावट के सवाल? मांग, खपत और नकली डेयरी उत्पादों का पूरा गणित
आय से अधिक संपत्ति केस में राहुल गांधी को सुप्रीम राहत, इलाहाबाद HC की कार्यवाही पर रोक; SC ने जांच एजेंसियों से पूछा- ‘खुद जांच क्यों नहीं शुरू की?’
उज्जैन महाकाल मंदिर में नाग पंचमी पर उमड़ा आस्था का सैलाब, बैरिकेडिंग में मची अफरा-तफरी; कई श्रद्धालु बेहोश
रांची छात्र आंदोलन पर राहुल गांधी का सीएम सोरेन को पत्र, बोले- ‘युवा देश का भविष्य, उनकी मांगें जायज’, छात्रों से व्यक्तिगत मुलाकात की अपील
यूपी में संविदा कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले! 1 लाख नई भर्तियों की तैयारी, मौजूदा कर्मियों की सैलरी में 15 हजार तक बढ़ोतरी का प्लान
© The Hill India. All Rights Reserved | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?