उत्तराखंड: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के युवा संवाद कार्यक्रम में 12वीं की छात्रा और ताइक्वांडो खिलाड़ी शायरा की ओर से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने के लिए 1.5 लाख रुपये मांगे जाने की बात कहे जाने के बाद सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई। वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने अलग रूप ले लिया और सरकारी सोशल मीडिया हैंडल से वीडियो हटाए जाने तथा शायरा के नए वीडियो के सामने आने के बाद कई सवाल उठने लगे। अब शायरा ने पूरे मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि उसकी बात ठीक तरह से सामने नहीं आ पाई थी। उसने किसी सरकारी अधिकारी या स्कूल की ओर से रिश्वत मांगे जाने का आरोप नहीं लगाया था। उसके मुताबिक, असल समस्या परिवार की आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए जरूरी खर्च का इंतजाम न हो पाना थी।
उत्तराखंड की इस होनहार खिलाड़ी की कहानी अब केवल 1.5 लाख रुपये के सवाल तक सीमित नहीं रह गई है। इसके पीछे एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसने सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद खेल की दुनिया में आगे बढ़ने का सपना देखा, जम्मू में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता, अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए चयनित हुई, लेकिन पैसों और जरूरी दस्तावेजों की समस्या के कारण विदेश जाकर खेलने का मौका गंवा बैठी।
शायरा का कहना है कि उसका सपना अभी खत्म नहीं हुआ है। वह दोबारा मेहनत करेगी, मेडल जीतेगी और भविष्य में ओलंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती है।
CM धामी के सामने क्या कहा था शायरा ने?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के युवा संवाद कार्यक्रम का एक वीडियो सामने आने के बाद शायरा चर्चा में आई। वीडियो में वह मुख्यमंत्री को अपनी खेल उपलब्धियों के बारे में बताते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने से जुड़ी आर्थिक परेशानी का जिक्र करती दिखाई दी थी। इसमें 1.5 लाख रुपये की जरूरत या मांग की बात सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यह चर्चा शुरू हो गई कि आखिर एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए इतनी बड़ी रकम की जरूरत क्यों पड़ी।
वीडियो के वायरल होने के बाद मामले ने राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का रूप ले लिया। लोगों ने यह सवाल उठाना शुरू कर दिया कि अगर कोई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए चयनित होती है, तो क्या आर्थिक समस्या के कारण उसका सपना रुक जाना चाहिए?
हालांकि, बाद में शायरा का एक और वीडियो सामने आया, जिसमें उसने अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश की। उसने कहा कि वह कार्यक्रम के दौरान अपनी पूरी बात नहीं बता पाई थी। इसके बाद उसने मीडिया से बातचीत में भी पूरे घटनाक्रम को विस्तार से बताया।
शायरा ने सरकार को दी क्लीन चिट
शायरा ने स्पष्ट किया कि मामला रिश्वत मांगने का नहीं था। उसने बताया कि वह ताइक्वांडो और कुआनकीडो जैसे खेलों में प्रशिक्षण लेती है और इन खेलों की ट्रेनिंग उसने एक निजी संस्था से ली है।
उसके मुताबिक, जम्मू में जिस प्रतियोगिता में उसने हिस्सा लिया था, वह निजी संस्था के माध्यम से आयोजित खेल से जुड़ी थी। इसी संस्था की तरफ से उसे आगे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने का अवसर मिला।
शायरा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए जरूरी खर्च की व्यवस्था समय पर नहीं हो पाई। उस समय उसके पास पासपोर्ट भी नहीं था। इन सभी कारणों से वह प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकी।
यानी जिस मामले को सोशल मीडिया पर शुरुआत में अलग तरह से समझा गया, शायरा की सफाई के बाद उसकी तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। उसके अनुसार, समस्या सरकारी स्तर पर पैसे मांगे जाने की नहीं, बल्कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति और निजी संस्था से जुड़े खेल खर्च को पूरा करने की थी।
16 जनवरी 2026 को जम्मू में जीता था गोल्ड मेडल
शायरा ने अपनी खेल यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि 16 जनवरी 2026 को उसने जम्मू में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। यह प्रतियोगिता कुआनकीडो से संबंधित थी और इसमें उसने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
गोल्ड मेडल जीतने के बाद उसका चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ। जाहिर है, एक युवा खिलाड़ी के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड जीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना उसके सामने था।
लेकिन यहीं से उसकी सबसे बड़ी चुनौती शुरू हुई।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए यात्रा, दस्तावेज, पंजीकरण और अन्य खर्चों की जरूरत थी। शायरा के मुताबिक, निजी संस्था की तरफ से उसे बताया गया कि इस पूरे सफर के लिए आर्थिक सहयोग की जरूरत होगी।
बताया गया कि उसे करीब 1.5 लाख रुपये की स्कॉलरशिप दी गई और बाकी खर्च के लिए पैसे जमा करने को कहा गया। लेकिन शायरा के परिवार के लिए इतनी रकम का इंतजाम करना आसान नहीं था।
पिता प्लंबर हैं, परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं
शायरा ने अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में बताते हुए कहा कि उसके पिता प्लंबर का काम करते हैं। परिवार की आमदनी बहुत ज्यादा नहीं है। ऊपर से कुछ समय पहले उसके पिता का एक्सीडेंट हो गया था, जिसके कारण वह काम पर भी नहीं जा पा रहे थे।
ऐसे में परिवार के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ही चुनौती थी। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए बड़ी रकम जुटाना उनके लिए मुश्किल हो गया।
शायरा के सामने एक और समस्या थी—पासपोर्ट।
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए पासपोर्ट जरूरी था, लेकिन समय पर उसका पासपोर्ट नहीं बन पाया। शायरा ने बताया कि उस समय उसकी उम्र 18 वर्ष पूरी होने में करीब 15 दिन बाकी थी। ऐसे में उसे बताया गया कि परिवार के किसी सदस्य के पासपोर्ट के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, लेकिन उसके घर में किसी के पास भी पासपोर्ट नहीं था।
इस तरह आर्थिक परेशानी के साथ दस्तावेजों की समस्या भी उसके रास्ते में आ गई।
पैसे नहीं जुटा पाई तो टूट गया इंटरनेशनल खेलने का सपना
एक खिलाड़ी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका बेहद खास होता है। शायरा के लिए भी यह मौका उसके सपने की दिशा में बड़ा कदम था।
लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ने उसके सामने मुश्किल खड़ी कर दी। वह जरूरी पैसे नहीं जुटा सकी और समय पर जरूरी दस्तावेज भी तैयार नहीं हो सके। आखिरकार उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अवसर छोड़ना पड़ा।
यहां शायरा की कहानी एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है—देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन कई बार आर्थिक स्थिति और संसाधनों की कमी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।
कई खिलाड़ी अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच जाते हैं, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की बारी आती है तो यात्रा, उपकरण, प्रशिक्षण, पंजीकरण और दस्तावेजों से जुड़े खर्च उनके लिए चुनौती बन जाते हैं।
‘सपना टूटा है, हौसला नहीं’
शायरा की कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू यह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में नहीं खेल पाने के बावजूद उसने अपना हौसला नहीं छोड़ा।
उसने साफ कहा कि वह दोबारा तैयारी करेगी और आगे मेडल जीतेगी। उसका लक्ष्य सिर्फ राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना नहीं है, बल्कि वह ओलंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती है।
शायरा का यह सपना उसकी उम्र से कहीं बड़ा है। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद वह खेल को अपना भविष्य बनाना चाहती है। वह आगे चलकर बच्चों को खेलों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना भी चाहती है।
यानी वह केवल खुद सफल खिलाड़ी बनना नहीं चाहती, बल्कि भविष्य में दूसरे बच्चों के लिए भी रास्ता तैयार करना चाहती है।
पढ़ाई में भी होनहार है शायरा
शायरा सिर्फ खेल के मैदान में ही अच्छी नहीं है, बल्कि पढ़ाई में भी उसका प्रदर्शन अच्छा बताया गया है। उसके स्कूल की प्रिंसिपल रेबेका सिंह ने बताया कि शायरा पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में भी सक्रिय है।
वह ताइक्वांडो के अलावा बास्केटबॉल भी अच्छा खेलती है। स्कूल की प्रिंसिपल के मुताबिक, स्कूल को इस बात की जानकारी नहीं थी कि शायरा जिस संस्था के माध्यम से प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रही थी, वहां उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने के लिए आर्थिक मदद की जरूरत है।
प्रिंसिपल ने कहा कि अगर शायरा ने स्कूल को अपनी आर्थिक परेशानी के बारे में बताया होता तो स्कूल की ओर से उसकी मदद करने की कोशिश जरूर की जाती।
टीचर्स ने भी कहा- हमें नहीं पता था कि शायरा को पैसों की जरूरत है
मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के बाद सामने आए घटनाक्रम को लेकर स्कूल के शिक्षकों ने भी अपनी बात रखी। शिक्षकों का कहना है कि शायरा ने पहले कभी स्कूल में इस तरह की आर्थिक समस्या का जिक्र नहीं किया था।
उनके मुताबिक, अगर शायरा स्कूल के स्टाफ या अपने साथ खेलने वाली छात्राओं को भी अपनी परेशानी बताती तो उसकी मदद करने की कोशिश की जाती।
इससे यह भी सामने आता है कि कई बार खिलाड़ी अपनी आर्थिक या व्यक्तिगत परेशानियां अपने आसपास के लोगों को नहीं बता पाते। ऐसे में उनकी प्रतिभा तो सबको दिखाई देती है, लेकिन उन्हें आगे बढ़ने के लिए किन संसाधनों की जरूरत है, यह जानकारी सामने नहीं आ पाती।
वायरल वीडियो ने खड़े किए सवाल, लेकिन शायरा की कहानी ने बदली तस्वीर
शायरा के मामले में वायरल वीडियो ने शुरुआत में एक अलग तरह की चर्चा को जन्म दिया। 1.5 लाख रुपये की बात सामने आने के बाद लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर एक युवा खिलाड़ी से अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जाने के लिए इतनी रकम क्यों मांगी गई।
लेकिन शायरा की बाद की सफाई और मीडिया से बातचीत ने यह स्पष्ट किया कि वह सरकारी रिश्वत या किसी अधिकारी द्वारा पैसे मांगे जाने की बात नहीं कर रही थी। उसकी परेशानी मुख्य रूप से आर्थिक संसाधनों की कमी और निजी संस्था से जुड़े खेल खर्च की व्यवस्था न कर पाने से जुड़ी थी।
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि एक होनहार खिलाड़ी की प्रतिभा आर्थिक मजबूरी के कारण रुक गई। अगर समय रहते उसे उचित आर्थिक सहायता और मार्गदर्शन मिल पाता तो संभव है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही होती।
अब शायरा की नजर अगले मेडल पर
शायरा के लिए यह कहानी किसी अंत की तरह नहीं है। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने का मौका भले ही हाथ से निकल गया हो, लेकिन उसके सपने अभी जिंदा हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीत चुकी शायरा अब और मेहनत करने की तैयारी में है। उसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना और भविष्य में ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है।
उसकी कहानी यह संदेश देती है कि प्रतिभा को केवल मेडल से नहीं, बल्कि संघर्ष से भी पहचाना जाता है। शायरा के पास संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन उसके सपने बड़े हैं।
और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे मजबूत संदेश है—पैसों की कमी ने एक बार शायरा का अंतरराष्ट्रीय सफर रोक दिया, लेकिन उसके हौसले को नहीं रोक पाई। अब उसकी नजर उस मंजिल पर है, जहां वह सिर्फ अपने परिवार और उत्तराखंड का नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन करना चाहती है।
