
इंदौर | देश का सबसे स्वच्छ शहर, मिनी मुंबई, और स्वच्छता में सात बार का नेशनल चैंपियन—इंदौर आज एक ऐसी त्रासदी के मलबे के नीचे दबा है, जिसने पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी (Contaminated Water) पीने से अब तक 11 मासूम लोगों की जान जा चुकी है और 1400 से अधिक लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।
शुरुआत में इसे प्रशासन द्वारा एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण संयोग’ करार देने की कोशिश की गई, लेकिन जैसे-जैसे जांच की परतें खुल रही हैं, यह साफ हो गया है कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, ठेके की राजनीति और सरकारी फाइलों की सुस्ती से हुई ‘सामूहिक हत्या’ है।
ग्राउंड रिपोर्ट: कहाँ से मिला पानी में ‘जहर’?
जांच एजेंसियों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने जो खुलासा किया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। भागीरथपुरा पुलिस चौकी के ठीक पास बने एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से पेयजल की मुख्य पाइपलाइन गुजर रही थी।
इन्वेस्टिगेशन की मुख्य बातें:
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लीकेज और संक्रमण: मुख्य पाइपलाइन में भीषण लीकेज था। सीवेज लाइन और पेयजल लाइन के समानांतर होने के कारण, शौचालय का गंदा पानी रिसकर पीने के पानी में मिल गया।
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लैब रिपोर्ट का खुलासा: एमजीएम (MGM) मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट ने पुष्टि कर दी है कि पानी में घातक बैक्टीरिया और सीवेज के अंश थे। सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने स्पष्ट किया है कि मौतें दूषित जल के कारण फैले संक्रमण (Waterborne Disease) से ही हुई हैं।
फाइलों में कैद मौत का खेल: अगस्त में पता था, फिर क्यों नहीं किया काम?
सबसे चौंकाने वाला खुलासा ‘भागीरथपुरा पाइपलाइन टेंडर’ को लेकर हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, विभाग को इलाके में बदबूदार पानी की समस्या का ज्ञान अगस्त 2025 से ही था।
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₹2.40 करोड़ का बजट: पुरानी और जर्जर पाइपलाइन को बदलने के लिए अगस्त में ही ढाई करोड़ का टेंडर जारी किया गया था।
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शिकायतों का अंबार: इस टेंडर फाइल में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि इलाके के लोगों को गंदा और सीवेज मिश्रित पानी मिल रहा है।
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अपराधिक चुप्पी: टेंडर जारी होने के बावजूद न तो टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई, न ही आपातकालीन मरम्मत (Emergency Repair) के लिए कोई टीम भेजी गई।
जब 11 चिताएं जल गईं, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी और आनन-फानन में फाइलों से टेंडर बाहर निकाला गया।
AMRUT 2.0 का बजट और सिस्टम की नाकामी
इंदौर को AMRUT 2.0 योजना के तहत लगभग ₹1700 करोड़ का फंड मिला है। लेकिन इस भारी-भरकम बजट के बावजूद जमीनी हकीकत कुछ और ही है। विभाग के भीतर चल रही खींचतान ने आम आदमी की जान को दांव पर लगा दिया है।
परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति:
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पैकेज-1 (₹579 करोड़): इंटेक वेल और WTP का काम SPML कंपनी को दिया गया, लेकिन निगरानी के अभाव में काम की गति कछुआ चाल रही।
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पैकेज-2 (₹424 करोड़): ग्रेविटी मेन और ट्रंक लाइन के काम अब भी टेंडर की प्रक्रियाओं में उलझे हैं।
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पैकेज-3 और 4 (₹800 करोड़): वितरण नेटवर्क (Distribution Network) का काम कागजों पर चल रहा है।
जल संसाधन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया, “यह तकनीकी नाकामी नहीं, शुद्ध लापरवाही है। पुराने इलाकों में सीवेज और वाटर लाइनें सालों पुरानी हैं। नई पाइपलाइन बिछाने में देरी और कमजोर सुपरविजन का नतीजा आज इंदौर भुगत रहा है।”
‘साहब, हमने तो पहले ही बताया था…’ – जनता का दर्द
भागीरथपुरा की गलियों में आज मातम के साथ-साथ आक्रोश है। स्थानीय निवासी प्रीति शर्मा का कहना है, “हमने दर्जनों बार पार्षद और नगर निगम के अधिकारियों को बदबूदार पानी दिखाया। हर बार आश्वासन मिला, लेकिन समाधान नहीं।”
वहीं, ओमप्रकाश नामक निवासी ने गंदे पानी का सैंपल दिखाते हुए कहा, “अधिकारी और ठेका कंपनियां अपने कमीशन और कागजों के लिए लड़ती रहीं और हमारे नलों में पानी की जगह सीवेज बहता रहा। मेरे परिवार के तीन सदस्य आज अस्पताल में भर्ती हैं।”
मुख्यमंत्री का कड़ा रुख: क्या गिरेगी गाज?
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सख्त लहजे में कहा है कि ऐसी घोर लापरवाही को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी अधिकारियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज करने के संकेत दिए हैं।
इंदौर के प्रशासनिक गलियारों में अब हड़कंप मचा है। कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त की टीमें अब रात-दिन भागीरथपुरा में डेरा डाले हुए हैं, लेकिन सवाल वही है कि क्या ये सतर्कता 11 लोगों की जान जाने से पहले नहीं दिखाई जा सकती थी?
स्वच्छता के तमगे से आगे की चुनौती
इंदौर ने स्वच्छता के क्षेत्र में पूरी दुनिया में नाम कमाया है, लेकिन ‘भागीरथपुरा कांड’ ने यह साबित कर दिया है कि केवल सड़कों की सफाई और कचरा प्रबंधन ही पर्याप्त नहीं है। भूमिगत पाइपलाइनों का जाल और पेयजल की सुरक्षा किसी भी शहर की बुनियादी जरूरत है। अगर 1700 करोड़ का बजट होने के बाद भी जनता को सीवेज वाला पानी पीना पड़ रहा है, तो यह ‘स्मार्ट सिटी’ के संकल्प पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
जरूरी सुझाव और बचाव (एडवाइजरी):
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पानी को उबालकर या क्लोरीन की गोली डालकर ही पिएं।
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नलों में गंदा पानी दिखने पर तुरंत टोल-फ्री हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करें।
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पुराने इलाकों में पुराने कनेक्शनों की जांच के लिए निगम की टीम से संपर्क करें।



